इस्लाम अपनाने वाला 'पिछड़ा वर्ग मुस्लिम' का दर्जा नहीं मांग सकता, मद्रास हाई कोर्ट का फैसला
मद्रास हाई कोर्ट. फोटो- एक्स.
Muslim Convert Backward Class Status: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने कहा कि इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल मुस्लिम होता है, उसे पिछड़ा वर्ग मुस्लिम का दर्जा नहीं दिया जा सकता. कोर्ट ने 2024 के तमिलनाडु सरकार के आदेश को भी असंवैधानिक घोषित किया.
Muslim Convert Backward Class Status: धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा है कि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाता है तो वह केवल मुस्लिम कहलाएगा, उसे सीधे तौर पर ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (Backward Class Muslim) का दर्जा नहीं दिया जा सकता. मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने तमिलनाडु सरकार के साल 2024 के उस सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम की श्रेणी में शामिल करने का प्रावधान किया गया था.
यह मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था. याचिकाकर्ता ने 2016 में इस्लामिक रीति रिवाज से महिला के साथ निकाह किया और इस्लाम धर्म अपना लिया. उसने अपना नाम भी बदल कर समीर अहमद कर लिया था.
उसका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था. साल 2015 में कायाथार स्थित सुन्नत जमात की ओर से जारी प्रमाण पत्र में बताया गया था कि उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया है. इसके बाद उसने खुद को ‘मुस्लिम लेब्बई’ समुदाय का बताते हुए सामुदायिक प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया. लेकिन कायाथार तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया. इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
2024 के सरकारी आदेश में क्या था प्रावधान?
मामले के बीच तमिलनाडु सरकार ने साल 2024 में एक सरकारी आदेश जारी किया था. इसमें कहा गया था कि अगर पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति (क्रमशः BC, MBC, DNC और SC) से आने वाला कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म अपनाता है तो उसे आरक्षण का लाभ लेने के लिए पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) माना जा सकता है.
ऐसे व्यक्ति को मुस्लिमों की अधिसूचित सात श्रेणियों में से किसी एक का सामुदायिक प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता है. हालांकि, राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी अगड़ी जाति से इस्लाम अपनाता है तो उसे पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) का दर्जा नहीं मिलेगा. सरकार के अनुसार, जो लोग अपने मूल धर्म में पहले से आरक्षण का लाभ ले रहे थे, धर्म परिवर्तन के बाद भी उनका लाभ खत्म नहीं होगा.
हाईकोर्ट ने रद्द किया तमिलनाडु सरकार का आदेश
अदालत ने कहा कि केवल धर्म परिवर्तन करने वालों को आरक्षण का लाभ जारी रखने के उद्देश्य से यह व्यवस्था बनाई गई, लेकिन इसमें संवैधानिक खामियां हैं. कोर्ट ने कहा, ‘हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सरकार ने केवल अदालत के फैसलों को निष्प्रभावी करने के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई, जो न केवल असंवैधानिक है बल्कि इस्लाम की मूल भावना के भी खिलाफ है.’ इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट की पीठ ने 2024 के सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द किया और याचिका का निपटारा भी कर दिया.
हाईकोर्ट ने पुराने फैसले का दिया हवाला
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने कहा कि साल 1951 में मद्रास हाईकोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है तो वह सिर्फ मुस्लिम बन जाता है. कोर्ट ने जी. माइकल बनाम वेंकेटेश्वरन फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस्लाम स्वीकार करने के बाद व्यक्ति की मुस्लिम समाज में स्थिति उसके पहले वाले धर्म या जाति से तय नहीं होती. इस पुराने फैसले को सुप्रीम कोर्ट भी मंजूरी दे चुका है.
कोर्ट बोला- इस्लाम बराबरी का संदेश देता है, सामाजिक ऊंच-नीच नहीं
कोर्ट ने कहा कि ईसाई मिशनरियों और इस्लामी प्रचारकों ने वर्षों तक यह तर्क दिया कि उनके धर्म सामाजिक समानता पर आधारित हैं और हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था मौजूद है. कोर्ट ने कहा, ‘धर्म परिवर्तन के लिए ऐसा रुख अपनाने के बाद यह दावा करना सही नहीं है कि इस्लाम में भी सामाजिक श्रेणी व्यवस्था है. हमारे सम्मानजनक मत में कुछ मुस्लिम समुदायों को पिछड़ा और बाकी को अगड़ा मानना कुरान की शिक्षाओं के विपरीत है. इस्लाम एक समान समाज स्थापित करने की बात करता है. ईश्वर की नजर में सभी बराबर हैं. कोई सामाजिक ऊंच-नीच नहीं है.’
लेकिन ऐतिहासिक कारणों से मुस्लिम समाज में भी समुदाय बने
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐतिहासिक कारणों से मुस्लिम समाज में भी अलग-अलग समुदाय और समूह बने हैं. पीठ ने कहा, ‘जैसे हिंदू धर्म में जाति जन्म से तय होती है, वैसे ही कोई व्यक्ति जन्म से ही रौदर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है. यह कहना हास्यास्पद है कि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद रौदर मुस्लिम बन सकता है.’
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सरकार अदालत के फैसले को नहीं बदल सकती: कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार अलग-अलग हैं और संविधान में शक्तियों का विभाजन एक मूल सिद्धांत है. पीठ ने कहा, ‘जब कोई अदालत का फैसला लागू है तो उसे केवल सरकारी आदेश जारी करके खत्म नहीं किया जा सकता.’ कोर्ट ने कहा कि सरकार ने 2024 के सरकारी आदेश के जरिए ऐसा ही करने की कोशिश की, जो कानूनन सही नहीं है.
SC और OBC को एक श्रेणी में रखना गलत बताया
अदालत ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश और सरकारी आदेश में BC, MBC, DNC और SC धर्म परिवर्तन करने वालों को एक साथ रखने की बात कही गई थी. कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति समाज की सबसे निचली सामाजिक पायदान पर मानी जाती है, जबकि उसे पिछड़े वर्ग के बराबर नहीं रखा जा सकता. पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि OBC और SC अलग-अलग श्रेणियां हैं.
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By Anant Narayan Shukla
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