Independence Day 2023 : देश की आजादी में इन महिलाओं का भी है अहम योगदान, जानें कैसे अंग्रेजों से लिया था लोहा

Edited by Rajneesh Anand
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प्रीतिलता वादेदार का जन्म 5 मई, 1911 को चटगांव वर्तमान में पाकिस्तान में हुआ था. वे भारत की पहली महिला कही जाती है जिन्होंने हथियार उठाया और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हुईं.

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15 अगस्त 2023 को हम एक बार फिर अपने देश के आजादी का जश्न मनाने के लिए एकत्रित होंगे और एक दूसरे को बधाई देंगे. तिरंगे के आगे शीश झुकायेंगे और एक संपूर्ण संप्रभु राज्य होने पर गर्व करेंगे. लेकिन हमें यह नहीं भूलना नहीं चाहिए कि यह आजादी हमें वर्षों के संघर्ष और बलिदान की वजह से मिली है. आजाद भारत से पहले देश में महिलाओं की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. उन्हें कई अधिकारों से भी वंचित रखा गया था, बावजूद इसके स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपना अमूल्य योगदान दिया. आज हम वैसी ही कुछ महिलाओं को नमन कर रहे हैं.

प्रीतिलता वादेदार ने साइनाइड खाकर देश के लिए दी कुर्बानी

प्रीतिलता वादेदार का जन्म 5 मई, 1911 को चटगांव वर्तमान में पाकिस्तान में हुआ था. वे भारत की पहली महिला कही जाती है जिन्होंने हथियार उठाया और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हुईं. प्रीतिलता दीपाली संघ में शामिल हुईं, जो एक क्रांतिकारी संगठन था जो युवावस्था में महिलाओं को युद्ध का प्रशिक्षण प्रदान करता था. वे सूर्य सेन की भारतीय क्रांतिकारी सेना में शामिल होने के लिए उत्सुक थीं, लेकिन उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि इसमें पुरुषों का वर्चस्व था. इन्होंने कई बार शस्त्र उठाया. 23 सितंबर 1932 की रात को पुरुष की तरह कपड़े पहनकर इन्होंने साहसपूर्वक हमले का नेतृत्व किया. लेकिन अंग्रेजों के साथ युद्ध में इन्हें पैर में गोली लगी, जिसकी वजह से ये भाग नहीं सकीं, लेकिन इन्होंने आत्मसमर्पण की बजाय साइनाइड की गोली खाकर खुद को देश पर कुर्बान कर दिया.

बसंती देवी ने पति की गिरफ्तारी के बाद कमान संभाला

बसंती देवी का जन्म 1880 में हुआ था. इनके पति चितरंजन दास असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिये गये थे, जिसके बाद इन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया. उन्होंने खिलाफत और सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों में भाग लिया. इन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने के लिए एक शैक्षिक केंद्र की स्थापना भी की थी. इन्होंने बंगाल प्रांतीय कांग्रेस का नेतृत्व किया और 1973 में पद्म विभूषण से नवाजी गयी थीं.

मद्रास से चुनाव लड़ीं

कमलादेवी चट्टोपाध्याय का जन्म 1903 में हुआ था. इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के अभियान में शामिल होने और स्वतंत्र भारत में भारतीय हस्तशिल्प, हथकरघा और रंगमंच के पुनरुद्धार के लिए प्रेरणा देने के लिए जाना जाता है. वह मद्रास निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव में खड़ी होने वाली भारत की पहली महिला हैं, हालांकि वह चुनाव हार गईं, लेकिन उन्होंने भारत की अन्य महिलाओं को राह दिखाई.

मातंगिनी हाजरा ने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया

मातंगिनी हाजरा एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थीं. इनको 1942 में ब्रिटिश पुलिस ने गोली मार दी थी. उससे पहले इनके कारनामों से अंग्रेज परेशान थे. उन्हें गांधी बुढ़ी के नाम से भी जाना जाता है. 17 जनवरी, 1933 को ‘करबंदी आंदोलन’ में उन्होंने हिस्सा लिया और ब्रिटिश शासन को काला झंडा दिखाया. उन्हें कई बार जेल में भी रहना पड़ा. भारत छोड़ो आंदोलन में भी इन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

बीना दास पश्चिम बंगाल की महान क्रांतिकारी

बीना दास पश्चिम बंगाल की महान क्रांतिकारी थी, जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई. इनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो स्वतंत्रता की लड़ाई में सक्रिय था. इन्होंने 6 फरवरी, 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन को मारने का प्रयास किया था, जिसकी वजह से उन्हें जेल में रहना पड़ा. 1939 में बीना दास कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं. 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1942 से 1945 तक फिर से जेल में रहीं.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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