हिमाचल विधानसभा में गैस खत्म: लकड़ी पर पक रहा 600 लोगों का खाना, शेफ भी हैरान

Author Govind jee
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सिलेंडर की तस्वीर. इमेज सोर्स- कैनवा.

Himachal Assembly LPG Shortage: हिमाचल प्रदेश में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की भारी किल्लत हो गई है. हालत यह है कि जारी बजट सत्र के दौरान विधायकों, मंत्रियों और स्टाफ के लिए खाना अब लकड़ी के चूल्हों पर तैयार किया जा रहा है. हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम (HPTDC) के कर्मचारी इस पारंपरिक तरीके से 500-600 लोगों का खाना बना रहे हैं.

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Himachal Assembly LPG Shortage: विधानसभा के लिए खाना शिमला के होटल हॉलिडे होम से भेजा जा रहा है. शुक्रवार को सत्र के छठे दिन, एचपीटीडीसी के स्टाफ ने बड़े-बड़े बर्तनों में लकड़ी की भट्ठियों पर खाना तैयार किया. खाना बनने के बाद इसे हॉट केस में पैक करके विधानसभा परिसर तक पहुंचाया जा रहा है. पिछले चार दिनों से यही तरीका अपनाया जा रहा है ताकि खाना समय पर और गर्म डिलीवर हो सके.

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शेफ बोले- करियर में पहली बार देखी ऐसी किल्लत

HPTDC के शेफ हरविंदर सिंह के मुताबिक, उन्होंने अपने पूरे करियर में एलपीजी की ऐसी कमी कभी नहीं देखी. उन्होंने बताया कि हालांकि उन्हें लकड़ी पर खाना बनाने की आदत नहीं है, फिर भी वे इसे मैनेज कर रहे हैं. वहीं, 30 साल से ज्यादा का अनुभव रखने वाले सीनियर शेफ धनी राम ने कहा कि तीन दशकों में पहली बार ऐसे हालात बने हैं. उन्होंने जल्द से जल्द सप्लाई सामान्य होने की उम्मीद जताई है.

पारंपरिक ‘भट्ठी’ का लिया जा रहा सहारा

हिमाचल के ग्रामीण इलाकों जैसे हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी, बिलासपुर और ऊना में सामुदायिक कार्यक्रमों में लकड़ी के चूल्हे (भट्ठी) का इस्तेमाल आम है. पारंपरिक ‘बोटी’ (सामुदायिक रसोइया) परिवार से ताल्लुक रखने वाले शेफ अश्वनी कुमार ने बताया कि वे 500-600 लोगों का खाना रोज बना रहे हैं. हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर बड़े पैमाने पर लकड़ियों का इस्तेमाल हुआ तो इससे पेड़ों की कटाई और पर्यावरण को नुकसान हो सकता है. उन्होंने इसके लिए सूखी लकड़ी इस्तेमाल करने की सलाह दी है.

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विधानसभा में गूंज रहा है एलपीजी का मुद्दा

एक तरफ जहां HPTDC बिना रुके खाने की सप्लाई सुनिश्चित कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ मंत्री और विधायक सदन में एलपीजी की कमी का मुद्दा लगातार उठा रहे हैं. मजबूरी में अपनाई गई यह पारंपरिक तकनीक चर्चा का विषय बनी हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है.

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