हिंदी सिनेमा के प्रभाव पर मंथन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर वैश्विक संगोष्ठी आयोजित

Published by :Pritish Sahay
Published at :23 Apr 2026 8:45 PM (IST)
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Hindi Cinema

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदी सिनेमा पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

Hindi Cinema: दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदी सिनेमा विषय पर संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने कहा कि सिनेमा का भारतीय मूल्यों पर गहरा प्रभाव पड़ता है. इसे जिम्मेदारी से संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रीय एकता को प्रस्तुत करना चाहिए, न कि केवल बाजार की मांग के आधार पर फिल्मों का निर्माण करना चाहिए.

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Hindi Cinema: भूगोल लोगों को अलग करता है और संस्कृति जोड़ने का काम करती है. भारत की पहचान वैश्विक स्तर पर भूगोल से नहीं संस्कृति से रही है और आगे भी रहेगी. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत की पहचान है और भारत की अवधारणा किसी राष्ट्र की अवधारणा से काफी व्यापक है. भारत का इतिहास 5000 साल पुराना है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मकसद समावेशी समाज का निर्माण करना है. भारत वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा में विश्वास करता है.

कुटुंब की अवधारण पूरी सृष्टि को परिवार मानने का है. दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में गुरुवार को रचयिता फाउंडेशन की ओर से ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदी सिनेमा’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉक्टर सच्चिदानंद जोशी ने यह बात कही. उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति को सिनेमा किस तौर पर पेश करता है यह जानना जरूरी है.

दादा साहेब फाल्के ने भारतीय संस्कृति को फिल्मों के जरिये बेहतरीन तरीके से पेश करने का काम किया. लेकिन समय के साथ लोग रियल लाइफ से रील लाइफ में घुस चुके हैं. सिनेमा का असर लोगों की चेतना पर पड़ता है. सिनेमा लोगों के जीवन को प्रभावित करता है. सिनेमा के कारण दक्षिण भारत में शादियों का तरीका बदल गया है. खान-पान से लेकर बोलचाल और पहनावे का निर्धारण सिनेमा कर रहा है. लेकिन ध्यान देने की जरूरत है कि सिनेमा के कारण जीवन के मूल्य तो प्रभावित नहीं हो रहे हैं. इसके असर के प्रति सचेत रहने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि सिनेमा के जरिये राष्ट्रीय एकता पर चोट पहुंचाने की भी कोशिश हो रही है.

कुछ लोग इसके जरिए एक खास विचार को प्रदर्शित करने का काम कर रहे हैं. ऐसे में नये भारत में जीवन जीने, परिवार के मूल्य क्या होंगे, इसपर मंथन करना जरूरी हो गया है. भारत के मूल तत्व को कैसे सामने लाया जाए, यह काम सिनेमा को करना होगा. सिर्फ बाजार की जरूरत के हिसाब से सिनेमा का निर्माण नहीं होना चाहिए.

इस मौके पर इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक केजी सुरेश ने कहा कि राष्ट्रवाद कोई साम्यवाद या समाजवाद की तरह नहीं है. राष्ट्रवाद अनुभूति है, भावना है. यह लोगों को जोड़ने का काम करता है. राष्ट्रीयता को किसी सीमा के दायरे में नहीं बांधा जा सकता है. यह सोच गलत है कि अंग्रेजों ने भारत बनाने का काम किया है. भारत की बात हमारे वेद और पुराण में है. भले ही सांस्कृतिक अवधारण हर काल खंड में अलग-अलग रही हो, लेकिन हर दौर में संस्कृति के कारण सब एक-दूसरे से जुड़े रहे.

इंडोनेशिया में रामायण का मंचन होता है और सरकारी एयरलाइन का नाम गरुड़ है. यह दिखाता है कि संस्कृति से जुड़ने का आधार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सिनेमा के जरिये दिखाने का काम किया गया है. लेकिन देखा जा रहा है कि सिनेमा के जरिये ही भारतीय संस्कृति को गलत तरीके से पेश करने का भी काम हो रहा है. जबकि भारतीय संस्कृति, इतिहास और विरासत को सामने लाने वाली फिल्मों का निर्माण होना चाहिए.

सिनेमा में अश्लीलता नहीं होनी चाहिए और ऐसी फिल्म बने जो समाज को कुछ सीख दे सके और पूरा परिवार एक साथ बैठकर फिल्म देख सके. इस दौरान हंसराज कॉलेज की प्रिंसिपल डॉक्टर रमा भी मौजूद रहीं. फिल्म समीक्षक प्रदीप सरदाना ने कहा कि सिनेमा का दायरा व्यापक है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लेकर कई फिल्में बनी है और इसका समाज पर असर हुआ है. अब भी ऐसी फिल्में बन रही है. महानायकों, स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल प्रमुख लोगों के योगदान को सिनेमा के जरिये आम लोगों तक पहुंचाने का काम किया गया है.

बाबा साहेब अंबेडकर ने भी कहा था कि सिनेमा का समाज पर अधिक असर होता है और इसके जरिये सामाजिक बदलाव लाने का काम किया जा सकता है. इस मामले में अभिनेता मनोज कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. ऐसे दौर में जब पश्चिमी संस्कृति हावी हो रही है भारतीय संस्कृति पर अच्छी फिल्मों का बनाना जरूरी हो गया है.

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Pritish Sahay

लेखक के बारे में

By Pritish Sahay

12 वर्षों से टीवी पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सेवाएं दे रहा हूं. रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से पढ़ाई की है. राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ विज्ञान और ब्रह्मांड विषयों पर रुचि है. बीते छह वर्षों से प्रभात खबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद डिजिटल जर्नलिज्म का अनुभव काफी अच्छा रहा है.

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