अब डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के बिना नहीं खरीद सकेंगे कफ सिरप, शेड्‌यूल K की लिस्ट से सिरप को हटाया गया

Edited by Rajneesh Anand
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कफ सिरप

Cough Syrups : कफ सिरप साल 2025 में काफी विवादों में रहा था. इसकी वजह यह थी कि कफ सिरप पीने से कई बच्चों की मौत हुई थी. जांच में पाया गया था कि सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) मिला हुआ था, जो एक जहरीला इंडस्ट्रियल सॉल्वेंट हैं. उसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कफ सिरप के संबंध में यह फैसला किया है.

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Cough Syrups : अब आप कफ सिरप सहित अन्य सिरप की खरीद बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के नहीं कर सकेंगे. इससे संबंधित एक नोटिफिकेशन केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने जारी किया है. सरकार ने अब सिरप जिसमें कफ सिरप भी शामिल है, उसकी बिक्री ओवर-द-काउंटर किए जाने पर रोक लगा दी है.

कफ सिरप की ओवर द काउंटर बिक्री पर क्यों लगी रोक?

कप सिरप की ओवर द काउंटर बिक्री पर सरकार ने रोक तब लगाई जब 2025 में देश में कई बच्चों की मौत हुई. उस वक्त कोल्ड्रिफ नामक कफ सिरप के पीने से बच्चों की मौत हुई थी. उसके बाद हेल्थ मिनिस्ट्री ने शेड्यूल K दवाओं की अपनी लिस्ट से सिरप शब्द हटाने के बारे में एक गजट नोटिफिकेशन जारी किया है, जिससे फार्मेसी के लिए कफ सिरप सिर्फ एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर के साइन किए हुए वैलिड प्रिस्क्रिप्शन पर ही बेचना जरूरी हो गया है. ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1945 के तहत, शेड्यूल K में उन दवाओं की लिस्ट है जिन्हें बेचने के लिए वैलिड मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन की जरूरत नहीं होती है.

ओवर द काउंटर बिक्री क्या है?

ओवर द काउंटर बिक्री उसे कहते हैं, जिसमें एक व्यक्ति सीधे दवा की दुकान जाकर खरीदारी कर लेता है, इसमें उसे डाॅक्टर की पर्ची या प्रिस्क्रिप्शन की जरूरत नहीं होती है. इस तरह की दवाओं में पारासिटामोल, सर्दी-खांसी की कई दवाएं,एंटासिड और विटामिन की दवाइयां शामिल होती हैं. वहीं कई ऐसी दवाइयां भी हैं, जिन्हें बिना डाॅक्टर के प्रिस्क्रिप्शन ने नहीं दिया जाता है, जैसे एंटीबायोटिक, शुगर की दवाइयां इत्यादि. भारत में बने कफ सिरप की बिक्री हाल के सालों में विवादों में रही है, यह कहा गया कि खराब सिरप भारत के साथ-साथ कई दूसरे देशों में बच्चों की मौत का कारण बने हैं.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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