UCC EXPLAINER : क्या पीएम मोदी ने विपक्षी एकता को तोड़ने के लिए काॅमन सिविल कोड का लगाया मास्टरस्ट्रोक ?

Edited by Rajneesh Anand
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी उनके इस बयान की निंदा कर रहे हैं और यह कह रहे हैं कि उन्होंने देश को बांटने के लिए यह दांव खेला है, वे साल 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए बयानबाजी कर रहे हैं.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में यह कहा कि देश को समान नागरिक संहिता की सख्त जरूरत है क्योंकि देश दो कानून से नहीं चल सकता. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि देश के संविधान में इस बात का उल्लेख किया गया है कि देश में एक समान नागरिक संहिता होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान के सामने आते ही विरोधी खेमे में हलचल मच गयी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी उनके इस बयान की निंदा कर रहे हैं और यह कह रहे हैं कि उन्होंने देश को बांटने के लिए यह दांव खेला है, वे साल 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए बयानबाजी कर रहे हैं.

भाजपा को पटखनी देने के लिए विपक्ष हो रहा एकजुट

गौरतलब है कि 23 जून को पटना में 15 से अधिक विपक्षी दलों की महाबैठक हुई, जिसमें यह संकल्प लिया गया है कि बीजेपी को सत्ता से दूर करना है इसलिए साल 2024 का लोकसभा चुनाव ये पार्टियां साथ मिलकर लड़ेगी और भाजपा के खिलाफ साझा उम्मीदवार खड़ा किया जायेगा. हालांकि अभी विपक्ष ने इस योजना का रोडमैप तैयार नहीं किया है, लेकिन संयुक्त प्रेस काॅन्फ्रेंस में नीतीश कुमार, लालू यादव, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, महबूबा मुफ्ती और उद्धव ठाकरे जैसे नेता काफी उत्साह में नजर आये. अगली बैठक 14 जुलाई को होनी है.

विपक्षी एकता में सेंध

अगर यह कहा जाये कि विपक्ष की इस एकता के जवाब में पीएम मोदी ने समान नागरिक संहिता और पसमांदा मुसलमानों के मुद्दे को उठाया है तो गलत नहीं होगा. पीएम के इस दांव के बाद कहीं ना कहीं विपक्ष एकता में सेंध लग गयी है. आम आदमी पार्टी की ओर से 28 जून को यह कहा गया कि वे समान नागरिक संहिता का विरोध नहीं करते हैं, क्योंकि संविधान में इसका उल्लेख है, लेकिन वे यह चाहते हैं कि सभी धर्मों के लोगों के साथ बातचीत करने के बाद ही इसे लागू किया जाये. वहीं शिवसेना ने भी समान नागरिक संहिता का समर्थन किया है. इसकी वजह साफ है क्योंकि शिवसेना जिन मुद्दों पर अपनी राजनीति करती आयी है उनमें से एक काॅमन सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता भी है. वहीं एनसीपी ने इस मुद्दे पर तटस्थ रहने का निर्णय किया है. विपक्षी एकता के दावे चाहे लाख किये जायें, लेकिन यह एक सच्चाई है कि इसकी डोर बहुत ही नाजुक है. प्रधानमंत्री पद को लेकर महत्वाकांक्षी नेताओं की भीड़ विपक्षी खेमे में है. इन हालात में जरा सी चिंगारी उनकी एकता को राख कर सकती है.

काॅमन सिविल कोड चर्चा में कब आया था

भारतीय संविधान के भाग 4,अनुच्छेद 44 में इस बात का उल्लेख किया गया है कि राज्य पूरे देश के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा. हालांकि सच्चाई यह है कि कभी इसका मसौदा तैयार नहीं किया गया. लेकिन 1985 में जब शाहबानो का मामला सामने आया , तो समान नागरिक संहिता की खूब चर्चा हुई. दरअसल शाहबानो एक 62 साल की वृद्ध महिला थी, उसके पांच बच्चे थे और पति ने उसे ट्रिपल तलाक दे दिया था. गुजारा भत्ता के लिए वह सुप्रीम कोर्ट गयी थी, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन तात्कालीन कांग्रेस की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए संसद का सहारा लिया था और कोर्ट के फैसले को बदल दिया गया था. उस वक्त समान नागरिक संहिता की खूब चर्चा हुई थी. सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में यह कहा था कि अनुच्छेद 44 मृतपत्र के समान हो गया है. वहीं 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विभिन्न धर्मों के अलग-अलग कानून होने की वजह से भ्रम की स्थिति होती है, इसलिए अगर सरकार काॅमन सिविल कोड लाना चाहती है, तो उसे ले आना चाहिए.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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