EXPLAINER: काॅमन सिविल कोड को लेकर हंगामा क्यों है बरपा? जानें अगर यह संहिता लागू हुई तो क्या होंगे बदलाव

Edited by Rajneesh Anand
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असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की वकालत करके पीएम मोदी मुस्लिमों को निशाना बनाना चाहते हैं और वे यह चाहते हैं कि देश में हिंदू नागरिक संहिता लागू हो.

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काॅमन सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता एक बार फिर चर्चा में है, वजह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मंगलवार को भोपाल में समान नागरिक संहिता की वकालत करना. पीएम मोदी ने कहा कि दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चलेगा? जबकि संविधान में सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार का उल्लेख है.

देश की विविधता को नष्ट करना चाहते हैं पीएम मोदी: ओवैसी

पीएम मोदी के इस बयान के बाद विपक्ष हमलावर है और खुद को मुसलमानों का हितैषी बताने वाले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की वकालत करके पीएम मोदी मुस्लिमों को निशाना बनाना चाहते हैं और वे यह चाहते हैं कि देश में हिंदू नागरिक संहिता लागू हो. ओवैसी ने कहा कि पीएम मोदी और उनकी सरकार देश में काॅमन सिविल कोड लाकर देश के बहुलवाद और विविधता को छीन लेंगे.इस स्थिति में पहला सवाल यह है कि आखिर काॅमन सिविल कोड में एेसी क्या बात है कि विपक्ष पीएम मोदी पर हमलावर है और दूसरा कि संविधान में इसे लेकर क्या बात कही गयी है? तो आइए जानते हैं कि काॅमन सिविल कोड क्या है :-

क्या है काॅमन सिविल कोड

समान नागरिक संहिता का अर्थ है देश के सभी वर्गों के साथ, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, राष्ट्रीय नागरिक संहिता के अनुसार समान व्यवहार किया जायेगा और यह सभी पर समान रूप से लागू होगा. समान नागरिक संहिता की सोच एक देश एक नियम के अनुरूप है, जिसे सभी धार्मिक समुदायों पर लागू किया जाना है. समान नागरिक संहिता शब्द का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग 4, अनुच्छेद 44 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है. यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य यानी कि देश पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा.

समान नागरिक संहिता लागू होने से क्या होंगे बदलाव

संविधान में समान नागरिक संहिता का उल्लेख तो किया गया है लेकिन इसका कोई मसौदा तैयार नहीं किया गया है. अब अगर इसकी प्रक्रिया शुरू होती है तो यह समझने वाली बात है कि इसके तहत विवाह, तलाक, रखरखाव, विरासत, गोद लेने और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे मुद्दे इसके तहत शामिल होंगे. चूंकि भारत में अभी विवाह, तलाक और संपत्ति के अधिकारों में विभिन्नता है और इनमें धार्मिक कानून लागू है इसलिए इस मुद्दे को लेकर विवाद की आशंका है जो नजर भी आ रही है. मसलन हिंदू और क्रिश्चियन में एक ही पत्नी हो सकती है, लेकिन इस्लाम में बहुविवाह की प्रथा है. संपत्ति के अधिकार भी विभिन्न धर्म में अलग-अलग हैं.

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क्या है सुप्रीम कोर्ट की राय

समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि देश में पर्सनल की वजह से कई बार भ्रम के हालात बनते हैं. ऐसी परिस्थितियों से निपटने में समान नागरिक संहिता या काॅमन सिविल कोड मदद कर सकता है. कोर्ट ने कहा था कि अभी तक इसके लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है, लेकिन अगर सरकार यह करना चाहती है तो उसे कर देना चाहिए.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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