विश्व भारती के बरखास्त पूर्व कुलपति सुशांत दत्तगुप्ता के खिलाफ सीबीआइ ने दर्ज किया केस

Updated at : 24 Sep 2020 2:11 PM (IST)
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विश्व भारती के बरखास्त पूर्व कुलपति सुशांत दत्तगुप्ता के खिलाफ सीबीआइ ने दर्ज किया केस

कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के द्वारा पश्चिम बंगाल में स्थापित विश्व भारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सुशांत दत्तगुप्ता के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने एक प्राथमिकी दर्ज की है. सुशांत दत्तगुप्ता के खिलाफ उनके कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्ट गतिविधियों की वजह से प्राथमिकी दर्ज की गयी है.

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कोलकाता/नयी दिल्ली : कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के द्वारा पश्चिम बंगाल में स्थापित विश्व भारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सुशांत दत्तगुप्ता के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने एक प्राथमिकी दर्ज की है. सुशांत दत्तगुप्ता के खिलाफ उनके कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्ट गतिविधियों की वजह से प्राथमिकी दर्ज की गयी है.

अधिकारियों ने बताया कि उनके खिलाफ वर्ष 2012 और 2013 के बीच लगाये गये आरोपों के सिलसिले में दो साल तक चली प्रारंभिक जांच के बाद यह कार्रवाई की गयी है. 15 फरवरी, 2016 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की सिफारिश के आधार पर भौतिकीविद श्री दत्तगुप्ता की बर्खास्तगी की मंजूरी दी थी.

यह किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रमुख की बर्खास्तगी की पहली घटना थी. राष्ट्रपति विश्व भारती विश्वविद्यालय के विजिटर होते हैं. पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी. केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) को कथित वित्तीय अनियमितताओं, नियमों के उल्लंघन और पद के दुरुपयोग से जुड़ी श्री दत्तगुप्ता के खिलाफ तीन शिकायतें भेजी थीं.

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अधिकारियों के मुताबिक, सीवीसी ने शिक्षा मंत्रालय की एक समिति की रिपोर्ट भी संलग्न की थी. समिति ने आरोपों की जांच की थी. सीवीसी से मामला भेजे जाने के बाद सीबीआइ ने प्राथमिक जांच की. उससे प्रथम दृष्टया सामने आया कि कुलपति रहने के दौरान श्री दत्तगुप्ता ने यह तथ्य छिपाया कि उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पेंशन भी मिल रही है, इस प्रकार उन्हें 13 लाख रुपये से अधिक का अतिरिक्त भुगतान प्राप्त हुआ.

उन्होंने बताया कि श्री दत्तगुप्ता के खिलाफ यह भी आरोप है कि उन्होंने विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक निजी कानूनी फर्म की सेवा ली, जिसने सरकार द्वारा अनुमोदित वकीलों से अधिक शुल्क लिया. सीबीआइ ने आरोप लगाया कि प्रारंभिक जांच में यह भी पाया गया कि श्री दत्तगुप्ता ने विभागीय जांच करने के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को मानदेय के रूप में पांच लाख रुपये का भुगतान किया, जो नियमों के खिलाफ था.

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शिक्षा मंत्रालय ने तत्कालीन राष्ट्रपति श्री मुखर्जी के पास फाइल भेजी थी और वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोपों को लेकर श्री दत्तगुप्ता की बर्खास्तगी की सिफारिश की थी. श्री मुखर्जी ने दो बार यह कहते हुए फाइल लौटा दी थी कि क्या कुलपति को उनके विरुद्ध लगे आरोपों पर सफाई का मौका नहीं देना कानूनसम्मत है. लेकिन, जब कानून मंत्रालय ने शिक्षा मंत्रालय के दृष्टिकोण का समर्थन किया और फाइल फिर राष्ट्रपति के पास भेजी गयी, तब श्री दत्तगुप्ता की बर्खास्तगी का मार्ग साफ हो गया.

Posted By : Mithilesh Jha

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