ऐ मेरे वतन के लोगों... गाने को लता दीदी ने किया अमर, जानें उसके पीछे के दिलचस्प किस्से

सुर कोकिला 'भारत रत्न' गायिका लता मंगेशकर और कवि प्रदीप का गहरा नाता था. कवि प्रदीप के लिखे 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गीत को जब लता दीदी ने आवाज दी, तो वह अमर हो गया.
प्रवीण तिवारी
Veteran Singer Lata Mangeshkar सुर कोकिला ‘भारत रत्न’ गायिका लता मंगेशकर और कवि प्रदीप का गहरा नाता था. कवि प्रदीप के लिखे ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत को जब लता दीदी ने आवाज दी, तो वह अमर हो गया. आज भी इसे सुनने पर आंखें नम हो जाती हैं और रोंगटे खड़े हो जाते है. 6 फरवरी कवि प्रदीप का जन्मदिन है. उज्जैन के बड़नगर में 1915 ई. को उनका जन्म हुआ था. जबकि, 6 फरवरी की तारीख को ही लता दीदी हमें छोड़कर चली गयी.
लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत को लेकर दिलचस्प बातें बतलायी थीं. कवि प्रदीप को वे पंडित जी कहती थीं. उसने उनकी पहली मुलाकात 1948 में हुई थी. हालांकि, संगीत-निर्देशक अनिल विश्वास बहुत कुछ पहले से ही बताते रहते थे. उस दौर में ‘बॉम्बे टॉकीज’ की बड़ी प्रतिष्ठा थी. कवि प्रदीप वहीं गीत लिखा करते थे. फिल्म ‘गर्ल स्कूल’ का संगीत अनिल विश्वास दे रहे थे. गीत प्रदीप ने लिखा था. जिसके रिकार्डिंग के वक्त ही लता मंगेशकर की पहली मुलाकात कवि प्रदीप से हुई थी.
लता दीदी ने कहा था कि पहली ही मुलाकात में हमारे सुर मिल गए थे और उन्हें पंडित जी बुलाने का हक मुझे मिल गया. लता दीदी मानती थीं कि पंडित जी कवि थे और उनकी सुर ताल की जानकारी उत्तम थी. उन्होंने शास्त्रीय संगीत का अलग से कोई अध्ययन-प्रशिक्षण नहीं लिया था. संगीत उनकी रगों में थी. वे बढ़िया ढूंढने में उस्ताद थे और खूब बढ़िया गाते भी थे. ‘आओ बच्चो, तुम्हें दिखायें’ और ‘देख तेरे संसार की हालत’ गीत उन्होंने खुद गाये थे.
लता दीदी ने कहा, बताया था कि पंडित जी रिकार्डिंग के वक्त खुद मौजूद रहते थे. गायक-गायिकाओं के सुर की ओर वे बड़ी बारीकी से ध्यान देते थे. यदि उनका सुर बिगड़ जाता तो उसे तुरंत रोक देन का आदेश देते थे. संगीत को लेकर गर्म मिजाज थे. कोई गाना अगर ठीक से रंग न जमा पाता, तो वे बगैर किसी लाग-लपेट के गाने वाले की गलती पर उंगली रख देते. हालांकि कवि प्रदीप ने कई भाव के गीत लिखे हैं. किन्तु उनकी पहचान देशभक्ति गीत को लेकर बनी.
इस गीत को लेकर एक कहानी यह बतायी जाती है कि पहली बार कवि प्रदीप ने इसे मुंबई के माहीम बीच पर घूमते हुए सिगरेट के डब्बे पर लिखा था. मौके पर कागज था नहीं तो सिगरेट के डब्बे से अल्युमिनियम फॉयल निकाल कर लिख लिया था. इस गीत के बनने की पूरी कहानी गीत को अमर बनाने वाली लता मंगेशकर ने भी बतलायी है.
लता मंगेशकर ने यह माना है कि इस गीत का स्थान कवि प्रदीप के कार्यकाल के साथ उनके कार्यकाल के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है. उन्होंने इसको लेकर कहा था कि 1963 के जनवरी महीने का वक्त था. लता दीदी की बहन मीना की शादी तय हो गयी थी. 11 फरवरी को कोल्हापुर में शादी होने वाली थी. वे उसकी तैयारियों में बहुत व्यस्त थीं. फिर ‘आनन्दधन’ नाम से संगीत निर्देशित ‘मोहित्यांची मंजुला’ फिल्म भी रिलीज होने वाली थी. जिसकी जिम्मेदारी भी उन पर थी. वे उन दिनों काफी व्यस्त चल रही थी. अपनी बहन और इस फिल्म के अलावा कुछ भी नहीं सोच पा रही थी.
दूसरी ओर दिल्ली में गणतंत्र दिवस की तैयारी चल रही थी. जिसमें सिनेमा जगत के सभी दिग्गज शिरकत करने वाले थे. राजकपूर, दिलीप कुमार, देवानंद से लेकर संगीत निर्देशक शंकर जयकिशन, मदन मोहन आदि कई बड़े नाम शामिल थे. जो अपना कला-कौशल वहां दिखलाने वाले थे. लता दीदी को भी जाने का मन था. किन्तु अपनी बहन की शादी की तैयारियों को लेकर नहीं जा रही थीं. कुछ उनकी तबियत भी ठीक नहीं थी. जब हेमंत कुमार ने उनसे दिल्ली जाने के बारे में पूछा तो उन्होंने अपनी बहन की शादी की तैयारी को लेकर नहीं जाने की बात बतायी. तब हेमंत कुमार ने उनसे खूब आग्रह किया तो वे जाने के लिए राजी हो गयी. लेकिन, उन्होंने शर्त रखी की वे कोई गाना नहीं गायेंगी. फिर उन्होंने कहा- तो फिर क्या गाओगी? अल्ला तेरे नाम.
इसके दूसरे दिन ही कवि प्रदीप का फोन उनके पास आता है. जिसमें उन्होंने लता दीदी से कहा कि वे तुरंत जाकर सी रामचंद्रन से मिले. जहां उन्हें पहली बार ऐ मेरे वतन के लोगों गीत सुनाई गयी. लता दीदी को पहली बार में ही गाना बहुत अच्छा लगा. किन्तु इसे गाने को लेकर असमर्थता जतायी कि बहन की शादी है. तो सी रामचंद्रन ने कहा कि- इस बार तो तुम मना न ही करो. गीतकार प्रदीप ने भी आग्रह किया. तब लता दीदी गाने को लेकर तैयार हो गईं. चूंकि, गाना लता दीदी को महत्वपूर्ण लगा था इसलिए आशा भोंसले के साथ गाने की बात कही. जिस पर पंडित जी गुस्सा हो गए और कहा कि तुम दोनों नहीं केवल तुम गाओगी. इनकार करने पर कवि प्रदीप ने कहा कि लता नहीं तो गीत भी नहीं चाहिए. बाद में आशा भोंसले ने भी इरादा बदल दिया था. लता दीदी भी गाने को लेकर तैयार हो गयी.
मुंबई में केवल दो बार रिहर्सल हुआ. पूरे गाने को टेप कर के सी रामचंद्रन ने लता मंगेशकर को दे दिया. जिसे उन्होंने मुंबई से दिल्ली जाते हुए सुना. गणतंत्र दिवस के उस कार्यक्रम में नेहरू जी भी उपस्थित थे. लता दीदी ने पहले ‘अल्लाह तेरो नाम’ भजन ‘गाकर ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत को गाया. जिसके बाद यह गाना हमेशा-हमेशा के लिए अमर बन गया. लता मंगेशकर के सभी कार्यक्रमों में इस गीत की खूब मांग हुई. गाने की खूब सराहना हुई. हालांकि, लता दीदी मानती थीं कि सुनने वालों की सराहना मेरे गायन के लिए नहीं, बल्कि पंडित जी के शब्दों की शक्ति की वजह से थी. उनके लिखे शब्द बार-बार आकर्षित करते हैं. वे यह भी मानती थीं कि पंडित जी की कविता की वजह से मेरे गायन-कौशल को प्रतिष्ठा मिली. हमारी स्वर सम्राज्ञी इतनी सहज-सरल स्वभाव की थी.
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