खतरे में है देश के राष्ट्रीय पक्षी मोर का अस्तित्व

Updated at : 01 Jun 2017 8:11 PM (IST)
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खतरे में है देश के राष्ट्रीय पक्षी मोर का अस्तित्व

नयी दिल्ली : राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने राष्ट्रीय पक्षी मोर के बारे में बयान देकर एक नये विवाद को जन्म दे दिया है. उन्होंने कहा है कि मोर कभी सेक्स नहीं करते हैं, बल्कि उसके आंसुओं को चुग कर मोरनी गर्भवती होती है. जस्टिस शर्मा के बयान के बाद हर […]

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नयी दिल्ली : राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने राष्ट्रीय पक्षी मोर के बारे में बयान देकर एक नये विवाद को जन्म दे दिया है. उन्होंने कहा है कि मोर कभी सेक्स नहीं करते हैं, बल्कि उसके आंसुओं को चुग कर मोरनी गर्भवती होती है. जस्टिस शर्मा के बयान के बाद हर जगह मोर को लेकर बहस जारी है. हालांकि, बहस के केंद्र में होते हुए भी देश में मोर की वर्तमान स्थिति को ठीक नहीं कहा जा सकता है. मोर को राष्ट्रीय पक्षी होने के साथ ही ‘संरक्षित प्रजातियों’ में भी शामिल किया जा चुका है. देश में लुप्त होने के कगार पर आ चुके मोर की संख्या कितनी है, इसका कोई आंकड़ा तक उपलब्ध नहीं है.

भारत सरकार ने 26 जनवरी, 1963 को मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया था. इसके बाद केंद्र सरकार ने वन्यजीव संरक्षण कानून में संशोधन कर मोर का शिकार करने पर पाबंदी तो लगा दी, लेकिन मोरों के संरक्षण को लेकर कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाये जा सके हैं. सीमित कर्मचारियों के भरोसे चलनेवाला वन विभाग भी देश में मोर के सही आंकड़े उपलब्ध करा पाने में अक्षम है. एक अनुमान है कि देश में इनकी संख्या एक लाख से अधिक है.

उत्तरी भारत (जोधपुर) के एक अध्ययन के अनुसार, नर मोर की संख्या 170-210 प्रति 100 मादा है. लेकिन, दक्षिणी भारत (इंजर) में बसेरा स्थल पर शाम की गिनती के अनुसार 47 नर मोर के अनुपात में 100 मादाएं पायी गयी हैं.

प्रकृति पर नजर रखनेवाली संस्था वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर ने वर्ष 1991 में भारत में मोरों की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट में कहा था कि स्वतंत्रता के समय भारत में मौजूद कुल मोर की आबादी का केवल 50 फीसदी ही मोर अब अस्तित्व में हैं. वहीं, सरकारी अधिकारियों और पशु कार्यकर्ताओं का मानना है कि 1991 के बाद से उचित देखभाल नहीं किये जाने और शिकार होने के कारण मोरों की संख्या काफी नीचे आ गयी है.

केंद्र सरकार ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 पारित कर स्वाभाविक रूप से मोर के पंखों के व्यापार की अनुमति दे दी. लेकिन, मोर के शिकार पर रोक लगाये रखा. हालांकि, कानून का दुरुपयोग कर देश में मिलनेवाले अत्यधिक आकर्षक मोर पंख के व्यवसाय के लिए पूरे भारत में मोर का शिकार होता रहा. अपर्याप्त कर्मचारियों के कारण वन विभाग के लिए भी मोर के शिकार करने की जांच करना काफी मुश्किल हो गया. कानून में संशोधन कर अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों का शिकार करने पर जिस तरह हत्या के बराबर का अपराध है, उसी दायरे में मोर को भी रखा गया. संशोधित कानून के तहत दो साल तक मोर पंख बेचने या खरीदने के लिए एक व्यक्ति को जेल का प्रावधान किया गया. हालांकि, यह भी माना गया कि नागरिकों द्वारा मोर पंख रखना अपराध नहीं माना जायेगा.

भारत में मोर की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती. पिछले वर्ष फरवरी माह में गोवा सरकार ने राष्ट्रीय पक्षी मोर को ‘हानिकारक’ घोषित करने का प्रस्ताव रखा था. राज्य के तत्कालीन कृषि मंत्री रमेश तावड़ेकर के मुताबिक, यह जीव किसानों के लिए परेशानी पैदा कर रहा है. साथ ही ग्रामीण इलाकों में खेती को भी बरबाद कर रहा है. वहीं, पिछले साल ही दिसंबर माह में राजस्थान के अजमेर जिले के पुष्कर थाने क्षेत्र के भगवानपुरा गांव में 13 मोरनियां मृत पायी थीं. इसके अलावा भी कई अन्य क्षेत्रों से मोर और मोरनियों के मृत पाये जाने की खबरें अक्सर आती रहती हैं, लेकिन उचित कदम नहीं उठाये जाने के कारण देश में मोरों का अस्तित्व ही खतरे में है.

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