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सरस्वती को बचायें!

Updated at : 01 Jul 2015 1:55 PM (IST)
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सरस्वती को बचायें!

– हरिवंश – सरस्वती विद्या की देवी हैं. विवेक, बुद्धि, मनीषा या इनसान के अंदर जो श्रेष्ठ सत्व हैं, उनकी अधिष्ठात्री. आजकल उनकी क्या गत है? सरस्वती पूजा के पहले सड़कों पर आतंक. युवा या किशोरों के झुंड, डंडे लेकर सड़क पर रहते हैं. सिर्फ सरस्वती पूजा में चंदा वसूली के लिए ही नहीं, बल्कि […]

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– हरिवंश –

सरस्वती विद्या की देवी हैं. विवेक, बुद्धि, मनीषा या इनसान के अंदर जो श्रेष्ठ सत्व हैं, उनकी अधिष्ठात्री. आजकल उनकी क्या गत है? सरस्वती पूजा के पहले सड़कों पर आतंक. युवा या किशोरों के झुंड, डंडे लेकर सड़क पर रहते हैं.

सिर्फ सरस्वती पूजा में चंदा वसूली के लिए ही नहीं, बल्कि हर पर्व, त्योहार या आयोजन को, यह समूह अवसर मानता है. चंदा उगाही का. जो ट्रक, गाड़ी, बस या टेंपो चंदा नहीं देते, उनका चलना मुश्किल. देर रात तक लाउडस्पीकर चलाना, पूजा स्थल पर नाचना और शोर, नयी विधियां हैं ज्ञान की देवी को खुश करने की. माना जाता रहा है कि विद्या अर्जन या तप के लिए मौन चाहिए. तप करने वाले या योगी या विद्या के साधक, नीरव रात में जगते हैं.

पर शोर, हंगामा, सड़क जाम, जबरन चंदा वसूली, विद्या देवी की उपासना के नये विधान हैं. 15 वर्ष पहले की घटना है. पटना से छपरा जा रहा था. बस से. पटना बाइपास पर ही एक झुंड खड़ा था. डंडा लिये. बस वाले ने कोशिश की, बस भगाने की. ईंट के बड़े-बड़े टुकड़े चले. शीशा फूटा.

दो-एक लोगों का सर भी. बस रुक गयी. पीछे से दौड़ कर आये उस उत्पाती समूह ने बस चालक को पीटा. बस के सामने के शीशे तोड़ डाले.

ऐसे आयोजक पूजा कैसे करते हैं, यह नहीं मालूम? पर मूर्ति विसर्जन के दौरान उनके आतंक हम देखते-भुगतते हैं. सड़क जाम है. नृत्य की प्रतियोगिता चलती है. कोई वाहन निकलना चाहे, उसकी खैर नहीं. कुछेक प्रत्यक्षदर्शियों या अनुभव संपन्न लोगों का यह भी मानना है कि नशे में डूबे लोग विसर्जन नृत्य की शोभा बढ़ाते हैं.

क्या यही विद्या या ज्ञान की देवी की पूजा है? आजादी की लड़ाई के दौरान महाकवि निराला ने सरस्वती की आराधना में चर्चित कविता लिखी. इन दिनों भी सरस्वती पूजा में कहीं-कहीं उसकी चर्चा होती है, वर दे, वीणा वादिनि वर दे ! यह अद्भुत कविता है. कवि आराध्य देवी से अपने लिए कोई कामना नहीं करता. महज अपने अंतस के अंधकार को दूर करने की याचना करता है. हिंदी के प्रखर आलोचक रविभूषण जी का मानना है कि इस एक कविता में, आजाद भारत को लेकर कवि की जो प्रार्थना है, वह कल्पना-कामना, आजादी की लड़ाई में अगुआ रहे दिग्गजों की पूरी रचनाओं या बातों में एक जगह नहीं है. निराला इस कविता के एक हिस्से में कामना करते हैं कि विद्या की देवी, नव गति दें. नव लय, ताल-छंद नव ! इतना ही नहीं, नवल कंठ भी दें.

आगे महाकवि ने नव स्वर, नव पर की आराधना की. पर वंदना अधूरी रही. कवि ने मांगा, उसका आशय है कि देवी, सब कुछ नया कर दे. रविभूषण जी का निष्कर्ष है कि महाकवि की कल्पना थी कि आजाद भारत में सब कुछ नया हो. जिस सात्विक आराधना के पीछे यह पवित्र कामना है, उस देवी पूजा से लोग डरने लगे हैं.

अचरज है कि इन कुरीतियों के खिलाफ चौतरफा चुप्पी है. पहले राजनीतिक दल सामाजिक बुराइयों के खिलाफ बोलते थे. अब वोट और सत्ता के गणित ने उन्हें चुप करा दिया है. समाज सुधार के लिए सक्रिय समूहों से भी कुरीतियों, ढोंग या गलत परंपरा के खिलाफ आवाज उठती थी. अब ऐसे समूह नहीं दिखाई देते.

फिर हमारा रास्ता क्या हो?

मराठी (मूलत: कोंकणी भाषा) के मशहूर विचारक और गांधीवादी रवींद्र केलकर की कही बातें याद आती हैं. महाराष्ट्र में कुछ समय पूर्व तक गाडगेबुवा नाम के एक सत्पुरुष लोगों के बीच काम कर रहे थे. किसी गांव में पहुंच जाते, तब सबसे पहले वे झाड़ू से रास्ता साफ करते थे. लोगों को भी झाड़ू लगाने की प्रेरणा देते थे. फिर जब प्रवचन शुरू करते, तब धर्म के नाम पर जो बेवकूफियां समाज में चल रही हैं, उन्हें खोल कर लोगों के सामने रखते. उनका यह अंधविश्वास निर्मूलन का ही काम था. प्रवचन समाप्त होते ही देवकीनंदन गोपाला कीर्तन गाते हुए लोगों को साथ में लेकर नाचने लगते. लोगों को लगता, यह सत्पुरुष है, हमारा आदमी है, जो कुछ कहता है हमारे भले का ही होता है. या तो इस रास्ते पर हमें चलना चाहिए या फ्रांस में वॉल्तेयर ने जो रास्ता अपनाया था, वह रास्ता अपनाना चाहिए.

वॉल्तेयर ने अंधविश्वास का विरोध करने के बदले उनकी हंसी उड़ायी थी. ईसाई चर्च ने जितने भी दंभ, पाखंड, अंधविश्वास यूरोप में चलाये थे, सबका हंसी-मजाक उड़ाकर ही उन्होंने लोगों के दिमाग से उन्हें उखाड़ फेंक दिया. विल ड्युरण्ट ने उनके बारे में लिखा है, इटली में रेनेसां का आंदोलन चला, जर्मनी ने रिफॉर्मेशन पर काम किया. मगर फ्रांस ने सिर्फ वॉल्तेयर पैदा किया. और इस एक आदमी ने रेनेसां रिफॉर्मेशन के साथ-साथ रिवोल्यूशन भी चलाया और देखते-ही-देखते फ्रांस की शक्ल-सूरत बदल डाली. (साभार: पतझर में टूटी पत्तियां)

रवींद्र केलकर की बातों से पहले भी कबीर हमारी परंपरा में हुए. उनसे अधिक साफ, बेखौफ और खरी-खोटी कहने वाला कौन हुआ? अगर आज हमारे बीच कुरीतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठ रही, तो महाराष्ट्र के संत गाडगेबुवा, फ्रांस के वाल्तेयर और कबीर को स्मरण करें, नयी ताकत-राह मिलेगी.

दिनांक : 13.02.2011

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