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पेरिस में 12 पत्रकारों की हत्या के बाद भी क्यों चुप रही सेकुलर टोलियां: संघ

Updated at : 21 Feb 2015 8:18 PM (IST)
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पेरिस में 12 पत्रकारों की हत्या के बाद भी क्यों चुप रही सेकुलर टोलियां: संघ

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहना है कि समय के दर्पण में भारतीय सेकुलर गिरोहबंदी का विद्रूप चेहरा दिख रहा है और यह वक्त विचारों की उदारता को बंधक बनाने वालों से छुटकारा पाने का है. उसने कहा कि यह देश की ऐसी स्वतंत्र पहचान कायम करने का वक्त है जो देश की […]

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नयी दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहना है कि समय के दर्पण में भारतीय सेकुलर गिरोहबंदी का विद्रूप चेहरा दिख रहा है और यह वक्त विचारों की उदारता को बंधक बनाने वालों से छुटकारा पाने का है. उसने कहा कि यह देश की ऐसी स्वतंत्र पहचान कायम करने का वक्त है जो देश की संस्कृति के अनुरुप हो, अन्याय के विरुद्ध हो.

संघ ने सवाल उठाया है कि ‘‘सेकुलर टोलियां’’ शार्ली एब्दो के मुखपृष्ठ को अपने अखबार में छापने के लिए नौकरी गंवाने वाली शीरीन दलवी के मामले में चुप क्यों हैं और शार्ली एब्दो पर आतंकी हमले को ‘‘अपने तौर पर सही ठहराने वाली नंदिता हक्सर’’ तथा गुजरात दंगों के नाम पर करोडों रुपयों के चंदे में कथित ‘‘गबन की आरोपी तीस्ता सीतलवाड’’ का बचाव क्यों कर रही हैं.
संघ के मुखपत्र पांचजन्य के ताजा अंक के संपादकीय में कहा गया है कि पिछले दिनों पेरिस स्थित शार्ली एब्दो के कार्यालय पर हमला बोल कर 12 पत्रकारों की जान ले ली गई. भारत के सेकुलर बुद्धिजीवी चुप्पी मारकर बैठ गए. कोई चर्चा, कोई सोमिनार, मोमबत्ती ब्रिगेड का कोई प्रदर्शन नहीं हुआ.
इसमें कहा गया है कि शीरीन दलवी ‘मुम्बई अवधनामा’ अखबार की संपादक थीं और उन्होंने आतंकी हमले के बाद छपे शार्ली एब्दो के पहले अंक के मुख्यपृष्ठ को अपने अखबार में जगह दी. इसके लिए उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. वह भी महिला थीं लेकिन सेकुलर ब्रिगेड ने उनके मामले में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का मामला नहीं उठाया.
संपादकीय में कहा गया एक अन्य लेखिका नंदिता हक्सर ने अपने लेख में शार्ली एब्दो के पत्रकारों की हत्या को अपने तौर पर सही ठहराया था. ‘‘लेकिन नंदिता के विचार सेकुलर बिरादरी को अस्वीकार्य हों, ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. दूसरी ओर कट्टरपंथियों को खलने वाला शीरीन का पत्रकारीय प्रयास उन्हें ठीक लगा हो, ऐसी भी कोई प्रतिक्रिया नहीं सामने आई.’’
पांचजन्य में कहा गया है कि एक तीसरी महिला गुजरात दंगा पीडितों के नाम पर जुटाए गए चंदे में गबन के गंभीर आरोप का सामना कर रही तीस्ता सीतलवाड हैं. लेकिन ‘‘सेकुलर टोलियां गबन के दागियों को बचाने निकलीं.’’संघ ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हक की बात करने वाली टोलियां शीरीन दलवी की पत्रकारिता और अभिव्यक्ति के पक्ष में नहीं हैं. वे शीरीन के निर्वासन पर मौन हैं.
संपादकीय में कहा गया है,‘‘कई बार घटनाओं की कौंध दर्पण साबित होती है. सब दिखने लगता है. शार्ली और शीरीन से जुडी घटनाएं ऐसी ही हैं. समय के दर्पण में भारतीय सेकुलर गिरोहबंदी का विद्रूप चेहरा दिख रहा है. यह वक्त विचारों की उदारता को बंधक बनाने वालों से छुटकारा पाने का भी है. नाम और दाम पर लुढकते वाम की राय से बहकने की बजाय एक लोकतांत्रिक देश की स्वतंत्र पहचान कायम करने का वक्त है. ऐसी पहचान जो देश की संस्कृति के अनुरुप हो, अन्याय के विरुद्ध हो.’’
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