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अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने दायर की पुनर्विचार याचिका

Updated at : 02 Dec 2019 6:17 PM (IST)
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अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने दायर की पुनर्विचार याचिका

नयी दिल्ली : अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने वाले उच्चतम न्यायालय के नौ नवंबर के फैसले पर पुनर्विचार के लिए सोमवार को एक मुस्लिम पक्षकार ने याचिका दायर की और कहा कि बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश देने पर ही संपूर्ण न्याय हो सकता है. तत्कालीन प्रधान […]

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नयी दिल्ली : अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने वाले उच्चतम न्यायालय के नौ नवंबर के फैसले पर पुनर्विचार के लिए सोमवार को एक मुस्लिम पक्षकार ने याचिका दायर की और कहा कि बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश देने पर ही संपूर्ण न्याय हो सकता है.

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि राम लला को सौंपने और मस्जिद निर्माण के लिए उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ का भूखंड आवंटित करने का केंद्र को निर्देश दिया था. हालांकि, संविधान पीठ के इस फैसले को उप्र सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने चुनौती नहीं देने का निर्णय लिया, लेकिन इस प्रकरण के मूल वादकारों में शामिल एम सिद्दीक के कानूनी वारिस और उप्र जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अशहाद रशीदी ने 14 बिंदुओं पर शीर्ष अदालत के निर्णय पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की है.

अधिवक्ता एजाज मकबूल के माध्यम से दायर पुनर्विचार याचिका में नौ नवंबर के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध किया गया है. इस फैसले में न्यायालय ने मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट गठित करने का निर्देश केंद्र को दिया है. रशीदी ने अयोध्या में प्रमुख स्थान पर मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ का भूखंड आवंटित करने के लिए केंद्र और उप्र सरकार को न्यायालय के निर्देश पर भी सवाल उठाया है. उनका तर्क है कि मुस्लिम पक्षकारों ने इस तरह का कोई भी अनुरोध कभी नहीं किया. याचिका में दलील दी गयी है कि विवादित स्थल पर मस्जिद गिराने सहित हिंदू पक्षकारों द्वारा अनेक अवैधताओं का संज्ञान लेने के बावजूद शीर्ष अदालत ने उन्हें माफ कर दिया और भूमि भी उनको दे दी.

पुनर्विचार याचिका के अनुसार, इस फैसले के माध्यम से न्यायालय ने बाबरी मस्जिद नष्ट करने और उसके स्थान पर वहां भगवान राम के मंदिर के निर्माण का परमादेश दे दिया है. याचिका में कहा गया है कि यद्यपि फैसले में न्यायालय ने हिंदू पक्षकारों की अनेक अवैधताओं, विशेषकर 1934 में (बाबरी मस्जिद के गुंबदों को नुकसान पहुंचाना) 1949 (बाबरी मस्जिद को अपवित्र करना) और 1992 (बाबरी मस्जिद को गिराना) का संज्ञान लिया, फिर भी उसने इन गैरकानूनी कृत्यों को माफ करने और विवादित स्थल को उसी पक्ष को सौंप दिया जिसने अनेक गैरकानूनी कृत्यों के आधार पर अपना दावा किया था.

हालांकि, रशीदी ने याचिका में कहा है कि वह पूरे फैसले और अनेक नतीजों पर पुनर्विचार का अनुरोध नहीं कर रहे हैं और उनकी याचिका हिंदुओं के नाम भूमि करने जैसी त्रुटियों तक सीमित है क्योंकि यह एक तरह से बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के परमादेश जैसा है और हिंदू पक्षकारों को इसका अधिकार देते समय कोई भी व्यक्ति इस तरह की अवैधता से लाभ हासिल नहीं कर सकता है. याचिका में कहा गया है कि फैसले ने कानून के इस प्रतिपादित सिद्धांत को नजरअंदाज किया कि वादहेतु दागी कार्रवाई के आधार पर दीवानी मामले में डिक्री नहीं की जा सकती या फिर यह टिक नहीं सकती.

रशीदी ने 93 पेज की अपनी पुनर्विचार याचिका में यह भी दलील दी है कि संविधान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 का गलत तरीके से इस्तेमाल करके गलती की है क्योंकि पूर्ण न्याय करने या फिर अवैधता को सही करने के लिए सिर्फ बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश दिया जा सकता है. रशीदी ने कहा कि वह इस प्रकरण की संवेदनशीलता के प्रति सजग हैं और शांति तथा सद्भाव बनाये रखने के लिए इस विवाद को खत्म करने की आवश्यकता भी समझते हैं, लेकिन न्याय के बगैर किसी प्रकार की शांति नहीं हो सकती है. संविधान पीठ ने अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांटने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर नौ नवंबर को अपना सर्वसम्मति का निर्णय सुनाया था.

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