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सार्वजनिक योगदान से हो मंदिर निर्माण, पब्लिक फंड का ना हो इस्‍तेमाल - स्‍वप्‍न दास गुप्‍ता

Updated at : 11 Nov 2019 7:58 AM (IST)
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सार्वजनिक योगदान से हो मंदिर निर्माण, पब्लिक फंड का ना हो इस्‍तेमाल - स्‍वप्‍न दास गुप्‍ता

नयी दिल्‍ली : नयी दिल्‍ली : वरिष्‍ठ पत्रकार और संसद सदस्य स्‍वप्‍न दास गुप्‍ता ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर प्रबंधन को दो सुझाव सौंपे है.पहले सुझाव के तहत उन्‍होंने ट्वीट कर कहा कि पूरी परियोजना सार्वजनिक योगदान से पूरी हो. इसके निर्माण के लिए किसी भी तरह का सार्वजनिक धन का उपयोग […]

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नयी दिल्‍ली : नयी दिल्‍ली : वरिष्‍ठ पत्रकार और संसद सदस्य स्‍वप्‍न दास गुप्‍ता ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर प्रबंधन को दो सुझाव सौंपे है.पहले सुझाव के तहत उन्‍होंने ट्वीट कर कहा कि पूरी परियोजना सार्वजनिक योगदान से पूरी हो. इसके निर्माण के लिए किसी भी तरह का सार्वजनिक धन का उपयोग न हो. दूसरे सुझाव में उन्‍होंने कहा कि बड़ी परियोजना के हिस्से के रूप में अयोध्या में एक उच्‍च श्रेणी का सार्वजनिक अस्पताल बनाया जाना चाहिए. जहां सभी तरह के रोगियों का इलाज हो सके. स्‍वप्‍न दास गुप्‍ता ने ट्वीट कर यह सुझाव दिये हैं.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इससे पहले शनिवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासि‍क फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन पर राम मंदिर बनाने की अनुमति दे दी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर बनेगा. इसके लिए तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट बनाया जाएगा, जो मंदिर बनाने के तौर-तरीके तय करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन दी जाएगी. पांच जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाया.
200 साल पहले विवाद सामने आया
इतिहासकारों की माने तो बाबरी मस्जिद 1528 में बनी थी, 1813 में हिंदू संगठनों ने पहली बार इस जमीन पर अपना दावा किया था. उनका कहना था कि अयोध्या में राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी. इसके 72 साल बाद यह मामला पहली बार किसी अदालत में पहुंचा. महंत रघुबर दास ने 1885 में राम चबूतरे पर छतरी लगाने की याचिका लगाई थी, जिसे फैजाबाद की जिला अदालत ने ठुकरा दिया था. 134 साल से तीन अदालतों में इस विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. जिसमें फैजाबाद जिला अदालत में 102 साल, इलाहाबाद हाईकोर्ट में 23 साल और सुप्रीम कोर्ट में 9 साल पहले मामला पहुंचा था.
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