बौद्धिकता के दबाव से मुक्त केदारनाथ सिंह की कविताएं

Updated at : 20 Jun 2014 8:31 PM (IST)
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बौद्धिकता के दबाव से मुक्त केदारनाथ सिंह की कविताएं

-केदारनाथ सिंह को मिले ज्ञानपीठ पर विशेष आलेख- ।। मधुप कुमार।। हिन्दी की आधुनिक पीढी के रचनाकार केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 के लिए देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है. केदारजी को मिला यह सम्मान निराला और त्रिलोचन की परंपरा का सम्मान है. यह विडंबना रही है निराला […]

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-केदारनाथ सिंह को मिले ज्ञानपीठ पर विशेष आलेख-

।। मधुप कुमार।।

हिन्दी की आधुनिक पीढी के रचनाकार केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 के लिए देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है. केदारजी को मिला यह सम्मान निराला और त्रिलोचन की परंपरा का सम्मान है. यह विडंबना रही है निराला और त्रिलोचन पुरस्कारों से लगभग वंचित रहे लेकिन केदारजी को मिलने वाला यह पुरस्कार उसी धरती की परंपरा का सम्मान है.

केदारजी ने शुरुआत गीतों से की लेकिन परवर्ती दौर में प्रबंधात्मक संवेदना का भी पर्याप्त विकास दिखाई देता है. मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित होते हुए भी अपने को किसी भी प्रकार की रुढ़िवादिता से उन्होंने मुक्त रखा. इसलिए उनकी कविताओं में प्रगतिशील चेतना का जीवंत अभिग्रहण मिलता है. अपनी कृति ‘जमीन पक रही है’ में केदारजी प्रौढ होते हैं.

आज की कविताओं में जहां या तो एकांगी बौद्धिकता या गंवई वस्तुओं का फैशन परक प्रयोग मिलता है, वहीं केदारजी की विशिष्टता इस बात में है कि उनके यहां न तो बौद्धिकता का अधिक दबाव है और न हीं किसी काव्य वस्तु का महज फैशन के लिए प्रयोग. उनके यहां रोटी, बैल, पतंग आदि देशी संवेदना से जुड़ी चीजें एक जीवंत वातावरण की सृष्टि करती हैं. कुछ-कुछ वैसा जैसा रेणु की कहानियों में दिखाई पड़ता है. केदारजी का महत्व सिर्फ काव्य वस्तुओं के विश्लेषण में नहीं अपितु शिल्पगत संवेदना में भी है. उनकी कविताओं के शिल्प में मौजूद संवादधर्मिता, नाटकीयता, विंब योजना उपयुक्त परिदृश्य का निर्माण करते हैं.

उनकी प्रमुख कृतियां में ‘अभी बिल्कुल अभी’, ‘जमीन पक रही है’, ‘यहां से देखो’, ‘अकाल में सारस’, ‘बाघ’, ‘सृष्टि पर पहरा’, ‘मेरे समय के शब्द’, ‘कल्पना और छायावाद’ और ‘तालस्ताय और साइकिल’ आदि शामिल हैं.

केदारजी कहते हैं कि भूलना मनुष्य की सबसे बडी शक्ति है. मनुष्य अगर भूले नहीं तो वो जीवित नहीं रहे. उनकी विशेषता है कि वे किसी भी बड़ी घटना से कविता को निकाल लेते हैं. उन्होंने पोखरण परीक्षण के संबंध में भी कविताएं लिखी है.

आलोचक केदारजी पर कलाप्रिय होने का आरोप लगाते हैं. केदारजी ने इसे भी झेला है. उनकी कृति ‘कब्रिस्तान में पंचायत" गध्य की नयी विधा का अन्वेषण करती है. उनके संस्मरण आत्मीय व जीवंत होते हैं. ‘मेरे समय के शब्द’ में उनकी सजग आलोचकीय दृष्टि दिखाई पड़ती है. उन्होंने अपनी जमीन पर खड़े होकर विदेशी कवियों से भी बहुत कुछ ग्रहण किया है. उनकी रचनाओं में एक विशिष्ट ढंग की अंतरराष्ट्रीयता दिखाई पड़ती है. ठीक कुछ-कुछ वैसा ही जैसा रवींद्र नाथ टैगोर की रचनाओं में मिलता है.

कुल मिलाकर केदारजी के यहां कविता की एक मुकम्मल जमीन दिखाई पड़ती है. इनके सम्मान पर सिर्फ हर्ष व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है बल्कि कुछ सीखना ज्यादा जरुरी है.

(मधुप कुमार गणेशराय स्नातकोत्तर महाविधालय, डोभी, जौनपुर से संबंद्ध हैं, यह आलेख उनसे बातचीत पर आधारित है.)

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