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रामायण की शबरी से जुड़ा है सबरीमाला का इतिहास, जानें मंदिर की प्रमुख बातें

Updated at : 13 Oct 2017 1:55 PM (IST)
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रामायण की शबरी से जुड़ा है सबरीमाला का इतिहास, जानें मंदिर की प्रमुख बातें

कोच्चि : केरल राज्य में बसा सबरीमाला मंदिर श्री अयप्पा बड़े तीर्थ स्थान के रूप में माना जाता है. हर साल करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं. मंदिर अचानक चर्चा में आ गया है क्योंकि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इसे संविधान पीठ को ट्रांसफर […]

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कोच्चि : केरल राज्य में बसा सबरीमाला मंदिर श्री अयप्पा बड़े तीर्थ स्थान के रूप में माना जाता है. हर साल करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं. मंदिर अचानक चर्चा में आ गया है क्योंकि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इसे संविधान पीठ को ट्रांसफर कर दिया गया है.

उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला संविधान पीठ को भेजा

सबरीमाला मंदिर प्रबंधन ने उच्चतम न्यायालय को बताया था कि 10 से 50 वर्ष की आयु तक की महिलाओं के प्रवेश पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि मासिक धर्म के समय वे शुद्धता बनाए नहीं रख सकतीं. बराबरी की मांग को लेकर अब आवाजें उठ रही हैं. इसका विरोध करने वाले मंदिर की परंपरा का हवाला दे रहे हैं.

क्या है इतिहास कैसे कई नामों से जुड़ा है मंदिर का नाम
कंब रामायण, महाभारत के अष्टम स्कंध और स्कंदपुराण के असुर कांड में जिस शिशु शास्ता का जिक्र है, अयप्पन उसी के अवतार माने जाते हैं. उन्हीं का मंदिर अयप्पन का मशहूर मंदिर पूणकवन के नाम से विख्यात 18 पहाड़ियों के बीच स्थित है. इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं. माना जाता है परशुराम ने अयप्पन पूजा के लिए सबरीमला में मूर्ति स्थापित की थी. गौर करने वाली बात यह है कि कुछ लोग इसे शबरी से भी जोड़कर देखते हैं. सवाल उठता है कि जिस मंदिर का नाम शबरी के नाम से जुड़ा हो वहां महिलाओं के प्रवेश पर रोक क्यों.
मंदिर जिस तरह 18 पहाडि़यों के बीच है उसी तरह मंदिर के प्रांगण में पहुंचने के लिए 18 सीढि़यां पार करनी पड़ती हैं. मंदिर में अयप्पन के अलावा मालिकापुरत्त अम्मा, गणेश और नागराजा जैसे उप देवताओं की भी मूर्तियां हैं. इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सवाल उठता है तो कुछ मामले को लेकर तारीफ की जाती है. इस मंदिर में ना तो जात-पात का कोई बंधन और ना ही अमीर-गरीब का. यहां प्रवेश करने वाले सभी धर्म, सभी वर्ग के लोग समान हैं. इस मंदिर में कई लोगों ने भगवान अयप्‍पा के होने का अहसास किया है.
प्रमुख उत्सव में होता है अलग उत्साह और रंग
यहां दो प्रमुख उत्सव होते हैं. मकर संक्रांति और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के संयोग के दिन, पंचमी तिथि और वृश्चिक लग्न के संयोग के समय ही श्री अयप्पन का जन्मदिवस मनाया जाता है. उत्सव के दौरान अयप्पन का घी से अभिषेक किया जाता है. मंत्रों का जोर-जोर से उच्चारण होता है. परिसर के एक कोने में सजे-धजे हाथी दिखते हैं तो पूजा के बाद चावल, गुड़ और घी से बना प्रसाद ‘अरावणा’ बांटा जाता है.
यहां आने वाले लोगों को दो महीने मांस-मछली और तामसिक प्रवृत्‍ति वाले खाद्य पदार्थों का त्‍याग करना पड़ता है. मान्यता है कि अगर कोई भक्त तुलसी तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर व्रत रखता है तो उसकी मुराद पूरी हो जाती है. मान्यता है कि मंदिर तक जाने वाली सीढ़ियों का काफी महत्‍व है. 5 सीढ़ियां पांच इंद्रियों को दर्शाती हैं और बाकी की 3 काम, क्रोध, लोभ आदि को.
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