200 सालों से है बुढ़िया माई मंदिर का अस्तित्व, नवरात्र में जुटते हैं हजारों श्रद्धालु

Edited by AMLESH PRASAD
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नवरात्र में छपरा रेलवे जंक्शन से सटे बुढ़िया माई के मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है. यहां सच्चे मन से मांगी हर मुरादें पूरी हो जाती हैं.

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छपरा. नवरात्र में छपरा रेलवे जंक्शन से सटे बुढ़िया माई के मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है. यहां सच्चे मन से मांगी हर मुरादें पूरी हो जाती हैं. वैसे तो अभी यह मंदिर व्यापक स्तर पर जीर्णोद्धार की बांट जोह रहा है. हालांकि अभी इस मंदिर के बगल में ही छपरा जंक्शन का सेकेंड इंट्री गेट बना है. जिससे आने वाले दिनों में यहां और अधिक चहल-पहल रहेगी. मंदिर से जुड़ी मान्यताओं से प्रभावित होकर मुश्किल परिस्थितियों में भी भक्त यहां अपनी हाजिरी लगाने जरूर आते हैं. नवरात्र में यहां नवदुर्गा की पूजा पूरे भक्ति भाव से की जाती है. सप्तमी व अष्टमी को विशेष भोग लगता है. वहीं नवमी के दिन कुंवारी भोज के साथ भंडार भी लगता है. शहर के साथ जिले के अलग-अलग प्रखंडों समेत दूसरे जिले से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. 200 वर्ष पुराना है मंदिर : मंदिर की स्थापना कब हुई इसका कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है लेकिन स्थानीय लोग व मंदिर विकास समिति से जुड़े लोगों ने बताया कि लगभग 200 वर्षों से यहां पूजा हो रही है. मंदिर में कुछ वर्षों पूर्व निर्माण का कार्य हुआ था. उस समय खुदाई करते हुए वर्ष 1911, 1918, 1925 व 1931 की ईंट मिली. जिसके बाद यह प्रमाणित हुआ कि यहां मंदिर रेलवे की स्थापना से पूर्व से है. बुढ़िया माई मंदिर विकास समिति से जुड़े सदस्य बताते हैं कि जिले के प्रबुद्धजनों व स्थानीय नागरिकों के सहयोग से मंदिर के जीर्णोद्धार की कवायद हुई है.

बुढ़िया माई से मांगने वाला नहीं जाता खाली हाथ : यहां वर्षों से नवदुर्गा का स्थान रहा है. इस स्थान पर एक सेविका रहती थीं. जो तकरीबन 150 वर्षों तक जीवित रहीं. आजीवन मां दुर्गा की आराधना में लीन रहीं. भक्त उन्हें बुढ़िया माई के नाम से पुकारते थे. उनके एक वक्त का भोजन रामाकांत प्रसाद के घर से आता था. जिस पेड़ के नीचे वह तपस्या करती थीं वहीं उनका स्थान मंदिर के रूप में बनाया गया है. श्रद्धालुओं का कहना है कि इस मंदिर से कोई खाली हाथ नहीं लौटा. जिसने भी सच्चे हृदय से कामना की उसकी मन्नत जरूर पूरी हुई है. मंदिर समिति के सदस्य बताते हैं कि रेलवे द्वारा साल में दो बार ट्रैफिक व कैरेज के अंतर्गत पूजा होती है. एक बार पूजा में बिना बुढ़िया माई का ध्यान किये ट्रेनों को चलाया जा रहा था. जो भी ट्रेन मंदिर के पास से गुजरती वह डिरेल हो जाती. बाद में जब अधिकारियों को इस बात का ध्यान आया तब मां की पूजा की गयी. तब जाकर परिचालन सामान्य हुआ.

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