मांस-मछली दुकानों से घिरा सरकारी बस डिपो परिसर, यात्रियों में डर और अफसर खामोश

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<P><H2>सुजीत कुमार सिंह, औरंगाबाद कार्यालय</H2></P>औरंगाबाद शहर का सरकारी बस डिपो इन दिनों अव्यवस्था और अतिक्रमण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है. बिहार राज्य पथ परिवहन निगम के अधीन संचालित
सुजीत कुमार सिंह, औरंगाबाद कार्यालय
औरंगाबाद शहर का सरकारी बस डिपो इन दिनों अव्यवस्था और अतिक्रमण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है. बिहार राज्य पथ परिवहन निगम के अधीन संचालित इस डिपो की जमीन पर मांस-मछली दुकानदारों ने कब्जा जमा लिया है, जिससे न सिर्फ निगम के कामकाज पर असर पड़ रहा है, बल्कि यात्रियों को भी रोजाना भय और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है. स्थिति यह है कि निगम कार्यालय के ठीक सामने तक दुकानें सजी रहती हैं और पूरे परिसर का माहौल असुरक्षित और अस्वच्छ बन गया है.कार्यालय के सामने दुकानें, कामकाज पर असर
बस डिपो के मुख्य गेट और कार्यालय के आसपास मांस और मछली की दुकानें खुलने से कर्मचारियों व अधिकारियों के लिए काम करना मुश्किल हो गया है. बदबू, भीड़ और गंदगी के कारण न सिर्फ वातावरण दूषित हो रहा है, बल्कि यात्रियों के लिए भी यहां रुकना असहज हो गया है. यात्रियों का कहना है कि टिकट लेने या बस का इंतजार करने के दौरान उन्हें हमेशा तनाव बना रहता है.पर्सनल झगड़ा नहीं ले सकते, अधिकारी सुन नहीं रहे
क्या कहते हैं अधिकारी
परिवहन निगम के डिपो सुपरिटेंडेंट रजनीश कुमार सविता ने बताया कि उन्होंने कई बार दुकानदारों को हटने का निर्देश दिया, लेकिन हर बार उन्हें विरोध और विवाद का सामना करना पड़ा. हम लोग पर्सनल झगड़ा, तो ले नहीं सकते. ऊपर से अधिकारी भी सुन नहीं रहे हैं, ऐसे में आखिर क्या करें. अब यह जगह असामाजिक तत्वों का अड्डा बनता जा रहा है.शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं
निगम की ओर से नगर पर्षद, नगर थाना और जिला प्रशासन को कई बार लिखित शिकायत दी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.कभी-कभार नगर पर्षद द्वारा जुर्माना लगाकर खानापूर्ति कर दी जाती है और दुकानें हटायी जाती हैं, लेकिन कुछ ही घंटों बाद दुकानदार फिर से उसी जगह पर दुकान लगा लेते हैं. इससे प्रशासन पर भी सवाल उठ रहे हैं.यात्रियों में डर का माहौल
डिपो परिसर में लगातार तनाव की स्थिति
डिपो परिसर में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है. दुकानदारों और कर्मचारियों के बीच अक्सर कहासुनी होती रहती है. यात्रियों का कहना है कि कभी भी यह विवाद मारपीट में बदल सकता है. खासकर महिला यात्रियों और बुजुर्गों को यहां आने में असुरक्षा महसूस होती है. कई लोग तो इस डिपो से यात्रा करने से बचने लगे है, और समस्या बढ़ रही है. दुकानदारों की भी मजबूरीउनके पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं
दूसरी ओर, मांस-मछली विक्रेताओं का कहना है कि उनके पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है. उनका आरोप है कि नगर पर्षद ने न तो उन्हें स्थायी दुकान उपलब्ध करायी है और न ही कोई निर्धारित स्थान दिया है. पहले सड़क किनारे दुकान लगाते थे, वहां से भी हटा दिया गया. अब जाएं, तो जाएं कहां. हमलोगों की समस्या कोई सुनने वाला नहीं है.
पुरानी व्यवस्था पड़ी कम, बढ़ी दुकानदारों की संख्या
जानकारों के अनुसार, नगर पर्षद ने पहले कुछ दुकानों का बंदोबस्त किया था, लेकिन समय के साथ विक्रेताओं की संख्या बढ़ती गयी और उपलब्ध दुकानें कम पड़ गयीं. इसके कारण कई लोग मजबूरी में खाली पड़ी सरकारी जमीन या सार्वजनिक स्थानों पर दुकान लगाने लगे. धीरे-धीरे यह समस्या विकराल रूप लेती गयी. परेशानी कम नहीं हो रही है.मना करने पर किया था दुर्व्यवहार
बिहार राज्य पथ परिवहन निगम प्रतिष्ठान कार्यालय के अधीक्षक ने नगर पर्षद के कार्यपालक पदाधिकारी को अतिक्रमण से संबंधित ध्यान आकृष्ट कराया था. बताया था कि बस पड़ाव परिसर में मुर्गा व मछली की अवैध दुकानें लगायी जा रही हैं. जब मौखिक रूप से उन व्यवसायियों को व्यवसाय बंद करने का निर्देश दिया गया, तो उपेंद्र पासवान, संजय राम, कपिल पासवान आदि लोगों ने दुर्व्यवहार किया. मारपीट पर उतारू हो गये. आखिर वे करें, तो क्या. जानकारी मिली कि इस मामले में एक-दो बार नहीं, बल्कि नगर पर्षद को कई बार आवेदन दिया गया. क्या कहते है नप के इओफोटो नंबर-11बी- कार्यपालक पदाधिकारी अजीत कुमार.
नगर पर्षद के कार्यपालक पदाधिकारी अजीत कुमार ने बताया कि मांस-मछली दुकानदारों को नगर पर्षद द्वारा दुकान आवंटन कराया गया है. चंद लोग है जिनके लिए भी व्यवस्था बनायी जा रही है. निगम की सूचना पर अतिक्रमण हटाया गया था. बहुत जल्द सब कुछ बेहतर हो जायेगा.समाधान की तलाश, जिम्मेदारी किसकीअब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान कैसे निकले. एक तरफ सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है, तो दूसरी तरफ गरीब दुकानदारों की रोजी-रोटी का सवाल भी जुड़ा हुआ है. ऐसे में प्रशासन को जल्द ही कोई स्थायी समाधान निकालना होगा. अलग मार्केट का निर्माण, लाइसेंस आधारित व्यवस्था या सख्त अतिक्रमण हटाओ अभियान के माध्यम से समाधान निकाला जा सकता है.
कभी भी भड़क सकता है विवादफिलहाल स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है. जिस जगह पर दुकानें लग रही हैं, वहां रोज तनाव का माहौल रहता है. यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो यह विवाद कभी भी हिंसक रूप ले सकता है और मामला थाने-कचहरी तक पहुंच सकता है. वैसे बस डिपो की यह समस्या सिर्फ अतिक्रमण का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही, व्यवस्था की कमी और सामाजिक संतुलन की चुनौती का उदाहरण बन चुकी है.प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
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