East Singbhum News : किसानों का प्रकृति को आभार है ‘टुसू’

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<P><H2>घाटशिला. </H2>झारखंड में टुसू पर्व धार्मिक व सामाजिक त्योहार के साथ सांस्कृतिक व पारंपरिक धरोहर भी है. 12 जनवरी को चाउड़ी से टुसू पर्व की शुरुआत हुई. 13 जनवरी को

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घाटशिला.

झारखंड में टुसू पर्व धार्मिक व सामाजिक त्योहार के साथ सांस्कृतिक व पारंपरिक धरोहर भी है. 12 जनवरी को चाउड़ी से टुसू पर्व की शुरुआत हुई. 13 जनवरी को बाउड़ी और 14 को मकर संक्रांति (टुसू) पर्व धूमधाम से मनाया जायेगा. लोक कलाकार सह टुसू गीत रचनाकार कंचन कर बताते हैं कि टुसू पर्व पारंपरिक त्योहार है, जो मुख्य रूप से बंगाल और झारखंड में मनाया जाता है. यह त्योहार किसानों के लिए खुशियां लेकर आता है. विशेषकर महिलाएं ज्यादा से ज्यादा भागीदारी निभाती हैं. टुसू पर्व आमतौर पर शीतकालीन महालया के बाद मनाया जाता है. यह त्योहार किसान की जीवनशैली और प्रकृति से जुड़ा है. नये धान की कटाई, कृषि कार्य की समाप्ति और सर्दियों की शुरुआत के लिए मनाया जाता है. टुसू पर्व मूल रूप से किसानों के लिए विशेष उत्सव है. धान कटाई के बाद किसान प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और आभार व्यक्त करते हैं.

महिलाओं की भागीदारी अहम, टुसू को मानती हैं देवी

टुसू पर्व में महिलाओं की भागीदारी अहम है. महिलाएं टुसू देवी के लिए गाकर व नाच कर त्योहार मनाती हैं. महिलाएं विशेष टुसू गीत गाती हैं. वे गीत आमतौर पर कृषि, पर्यावरण और प्राकृतिक परिवर्तनों की समस्याओं के बारे में बात करती हैं. टुसू पर्व मुख्यत: ग्रामीण क्षेत्र में मनाया जाता है. सभी ग्रामीण एक साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं. पर्व की केंद्र बिंदू टुसू देवी हैं. इन्हें प्रकृति और फसल उत्पादन की देवी के रूप में पूजा की जाती है.

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