आप्रवासी कृषि मजदूरों के दुख-दर्द

– हरिवंश- 28.09.94 सितंबर को पहली मुलाकात थी, ‘नेशनल प्रिजन प्रोजेक्ट’ के कार्यकारी निदेशक एल्विन जे ब्रोंस्टाइन से. स्वयंसेवी संस्था के कार्यकारी निदेशक हैं. जेलों के कैदियों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए पिछले 22 वर्षों से लगे हैं. गोरे हैं. धुन के पक्के. अमेरिका के बारे में दिलचस्प जानकारी देते हैं. कहते हैं कि […]
– हरिवंश-
कहते हैं कि हमारा स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) इराक, क्यूबा, हैती वगैरह के लिए चिंतित होता है. मानवाधिकार के सवाल उठता है, पर अपने कैदियों के बारे में नहीं सोचता. 22 वर्ष पहले जब जेलों के सुधार के लिए ब्रोंस्टाइन सक्रिय हुए, तब जलों की हालत खराब थी. 19वीं शताब्दी के जेल थे. अब काफी सुधर गये हैं. नये अंडरग्रांउड जेल बने हैं. उससे नया संकट पैदा हो गया है. भूमिगत जेलों में कैदी बिल्कुल अलग-थलग रखे जाते हैं. बिल्कुल एकांत के अलग संकट हैं.
बंदूक आसानी से उपलब्ध है. बातचीत हुई. गुस्सा आया. बंदूक का इस्तेमाल हो गया. इसलिए वह बंदूक पर पाबंदी के पक्षधर हैं. इस पाइप गन के खिलाफ जनमत तैयार हो रहा है. पर पाइप गन उद्योग में लगे लोग भी सक्रिय हैं. वे नहीं चाहते कि इस पर पाबंदी लगे.
उसका कहना है कि जनसंख्या वृद्धि दर यही रही और अपराध वृद्धि दर यही रही तो 2025 में आधा अमेरिका जेल में होगा. 25-50 वर्षें बाद अमेरिका कहां होगा, इसका शोध-निष्कर्ष हो रहा है. स्वैच्छिक संस्थाएं, जागरूक लोग सरकार पर उस अनुसार परिवर्तन के लिए दबाव (प्रेशर ग्रुप) के रूप में काम कर रहे हैं.
दोपहर में मुलाकात तय है अमेरिकी सरकार के हेलिंस्की के सम्मेलन के तहत गठित ‘ कमीशन ऑन सिक्यूरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप’ (सीएससीइ) के वरिष्ठ अधिकारियों से सीएससीइ से यूगोस्लाविया हटाया गया है. 52 देश सदस्य हैं. सरकार में काम करते हुए भी सरकारी अधिकारी खुल कर अपनी बात कहते हैं. अमेरिका के कृषि फार्मों में काम करनेवाले मजदूरों-श्रमिकों की दुर्दशा बताते हैं. बड़े-बड़े अमेरिकी कृषि फार्मों में काम करने के लिए आप्रवासी (माइग्रेट लेबर) मजदूर आते हैं. किसानों के फार्मवर्कर्स कहा जाता है.
यह कुछ-कुछ वैसा ही कि ठेकेदार, ग्रुप लीडर या बिचौलिया, आदिवासी मजदूरों को छोटानागपुर से असम, पंजाब या दूसरे राज्यों में ले जाते हैं. खूब खटाते हैं. दवा, भोजन पानी की व्यवस्था नहीं होती. रहने को प्रबंध नहीं होता. यौन अत्याचार होता है. यही कहानी अमेरिकी फार्महाऊस में काम करने आये बाहरी मजदूरों की भी है. शायद दुनिया में शारीरिक श्रम या मजदूरी करनेवालों की यही हालत है. देश, काल या परिस्थिति से मामूली फर्क हो सकता है. पर दुनिया में मजदूरी करके खानेवाले दिहाड़ी मजदूर दुख में ही हैं. पर हेलिंस्की सम्मेलन के तहत गठित आयोग ने विभिन्न अमेरिकी राज्यों में जाकर इसकी सुनवाई की.
आयोग को जो शिकायतें मिलीं, वे थीं-मजदूरी कम देना, मानसिक, शारीरिक और यौन अत्याचार, खतरनाक उर्वरकों के बीच रहना, जहरीले रासायनिक पदार्थों को लेकर कार्य करना, रहने की दुर्दशा, रंगभेद, नियंत्रित जीवन कानूनी सहायता लेने पर प्रतिबंध, बाल मजदूरों की पीड़ा, खराब स्वास्थ्य प्रबंध, असुरक्षित और मौत को निमंत्रित करते आवागमन के साधन, अपर्याप्त कानूनी प्रावधान. आयोग ने इन पर सुनवाई की और तत्काल सुधार के निर्देश दिये. बहस में आये आप्रवासी कृषि मजदूरों का औसत जीवन 49 वर्षों का है.
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