‘संज्ञा’ से ‘विशेषण’ बना पोस्को

-दक्षिण कोरिया से लौट कर हरिवंश- पोस्को का पूरा नाम है ‘पोहांग आइरन एंड स्टील कंपनी’. ओड़िशा में इसी पोस्को द्वारा स्टील कारखाना बैठाने की चर्चा है. यह एक कंपनी का नाम है, इस अर्थ में संज्ञा है. पर यह नाम कैसे ‘कोरियाई संकल्प, सामर्थ्य और असंभव को संभव करने का प्रतीक बन गया, इस […]
-दक्षिण कोरिया से लौट कर हरिवंश-
वैसे ही जैसे ‘सिंगापुर’ को मछुआरों के गांव के रूप में ली यूआन क्यू ने पाया और अपने नेतृत्व में विश्व स्तर का देश बना दिया. व्यक्ति से वह इतिहास बन गये. संज्ञा से विशेषण हो गये. जीते जी किंवदंती. उसी तरह जैसे सोनी की गाथा है. दूसरे विश्वयुद्ध में जापान तबाह-ध्वस्त हो गया था. कुछेक संकल्पवान युवकों ने बम से तबाह-ध्वस्त एक कमरे में सपना देखा. जापान को विश्व बाजार में सर्वश्रेष्ठ बनाने का. उनमें से ही एक थे, अकाई मोरितो, ‘सोनी’ कंपनी को शुरू करनेवाले.
टूटे कमरे में, साधनविहीन मुल्क में, कुछेक बेरोजगार सपना देखते हैं और उसे सच्चाई में बदल डालते हैं, यही है, मनुष्य का अपराजेय पौरुष, असाधारण संकल्प, सृजन की अद्भुत क्षमता. यही ताकतें-ऊर्जा ‘संज्ञा’ से ‘विशेषण’ बनाती हैं.
उस समय कोरियाई अर्थव्यवस्था की बदतर हालत देखते हुए पोस्को जैसा स्टील प्लांट खड़ा कर लेना असंभव था. इसी कारण इस स्टील प्लांट के वित्तीय ऋण प्रस्ताव पर मैंने लिखा कि स्टील कारखाना लगाना अच्छा निवेश नहीं होगा. मैं आज भी मानता हूं कि मेरी अनुशंसाएं-निष्कर्ष सही थे. पर मैं एक बड़ी चीज को नजरअंदाज कर गया. वह थी कि इस स्टील कंपनी के चेयरमैन पार्क और उनके सहकर्मियों में ‘असंभव’ को ‘संभव’ बनाने की क्षमता-कला.
चेयरमैन पार्क जहां भी पूंजी या तकनीक की मदद के लिए जाते, लोग कमेंट करते, ‘रेत से स्टील बनेगा’. चूंकि पोहांग तटीय इलाका है, इसलिए पानी, रेत और मछली की वहां बहुतायत है. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति उन्हीं दिनों अमेरिका गये. उनके साथ टीम में चेयरमैन पार्क भी गये. कोरिया के राष्ट्रपति ने अमेरिकी राष्ट्रपति से इस स्टील प्लांट को बैठाने में वित्तीय मदद की चर्चा की.
तब अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस प्रस्ताव की छानबीन के लिए एक सिंडीकेट बनाया, जिसके प्रेसीडेंट फाय बनाये गये. पर यह प्रोजेक्ट धुन की तरह चेयरमैन पार्क व उनकी टीम पर सवार था. पुन: अमेरिका से मिले आश्वासन पर चेयरमैन पार्क एक अंतिम कोशिश करने वहां गये. चेयरमैन पार्क ने ‘उस दिन’ को याद करते हुए लिखा है, ‘अप्रैल 1969 में मैं प्रेसीडेंट फाय से मिलने गया. हमने पूरी रात बात की, पर निष्कर्ष था, नो टेक्नोलॉजी, नो मनी (न तकनीक मिलेगी, न पूंजी) पोस्को ने अनेक प्रतिभाशाली लोगों को नियुक्त कर लिया था, चूंकि कोई काम शुरू नहीं हो पा रहा था. इसलिए लोग अब छोड़ कर जाना चाहते थे. हम अत्यंत गंभीर संकटों-चुनौतियों से घिरे थे. यह मेरे लिए सबसे कठिन चुनौती-संघर्ष और संकट के क्षण थे.’
1991 में वही अफसर वर्ल्ड बैंक के ‘एशिया’ कार्यालय से बदल कर, प्रोन्नति पाते हुए विश्व बैंक के मुख्यालय अमेरिका पहुंच गये थे. तब वह बहुत बड़े पद पर थे. चेयरमैन पार्क के निमंत्रण पर विश्व बैंक के वह अफसर पोहांग पहुंचे, तो दंग रह गये. उसी अफसर की टिप्पणी ऊपर में दर्ज है, जिसमें कहा गया है कि इस प्रस्ताव पर विचार करते समय मैं यह भूल गया कि इस स्टील कंपनी के चेयरमैन पार्क और उनके सहकर्मियों में ‘असंभव’ को ‘संभव’ बनाने की क्षमता-कला है. पोस्को की सफलता के बारे में एक बार चेयरमैन पार्क से पूछा गया. उनका उत्तर था, ‘मैंने सिर्फ यही किया कि बुनियादी उसूलों पर टिका रहा. ईमानदारी, काम में पूर्णता (परफेक्शन), काम में बखूबी. चौकस. परफेक्शन यानी एक-एक छोटी चीज की अति सावधानी से प्लानिंग. सोल में पार्क के घर के आगे यह दर्ज था, ‘शॉट लाइफ फॉर इटरनल मदरलैंड’ (मातृभूमि के लिए समर्पित यह अल्प जीवन).
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