शरीर में कहीं भी दर्दवाली गांठ को न करें इग्नोर

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 22 Oct 2019 9:09 AM

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डॉ रणदीप सिंह डायरेक्टर एंड सीनियर कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, नारायणा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम सॉफ्ट टिशु कैंसर या सॉफ्ट टिशु सार्कोमा कैंसर का एक प्रकार है, जो शरीर में कहीं भी विकसित हो सकता है, विशेष रूप से मांसपेशियों, रक्त नलिकाओं, तंत्रिकाओं, वसा, जोड़ों और उत्तकों में. यह 50 से अधिक प्रकार का होता है […]

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डॉ रणदीप सिंह
डायरेक्टर एंड सीनियर कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, नारायणा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, गुरुग्राम
सॉफ्ट टिशु कैंसर या सॉफ्ट टिशु सार्कोमा कैंसर का एक प्रकार है, जो शरीर में कहीं भी विकसित हो सकता है, विशेष रूप से मांसपेशियों, रक्त नलिकाओं, तंत्रिकाओं, वसा, जोड़ों और उत्तकों में. यह 50 से अधिक प्रकार का होता है और इनके नाम उन उत्तकों के नाम पर होते हैं, जिनमें यह विकसित होते हैं. जैसे वसा में जो ट्यूमर विकसित होता है, उसे लिपोसार्कोमास कहते हैं
मांसपेशियों में विकसित होने वाले ट्यूमर को रैबडोमायोसार्कोमास, रक्त नलिकाओं का ट्यूमर एंजियोसार्कोमास, हड्डियों में विकसित होने वाला ट्यूमर ऑस्टियोसार्कोमास आदि. यह वही रोग है, जिससे पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली लंबे समय से पीड़ित थे और इस वर्ष उनका निधन हुआ. उनके बायें पैर में इस कैंसर का ट्यूमर था.
सॉफ्ट टिशुज में ट्यूमर विकसित होने के मामले तो बहुत देखे जाते हैं, लेकिन जब ये ट्यूमर कैंसर युक्त होता है, तो उसे सार्कोमा कहते हैं. कुल कैंसर के मामलों में से 2 प्रतिशत मामले सॉफ्ट टिशु सार्कोमा के होते हैं. कैंसर युक्त ट्यूमर तब विकसित होता है जब कोशिकाओं के डीएनए में खराबी आ जाती है. इससे कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से विभाजित और विकसित होने लगती हैं. ये असामान्य कोशिकाएं एकत्र होकर ट्यूमर बना लेती हैं. आमतौर पर यह पैरों, हाथों, पेट और छाती में विकसित होता है.
डायग्नोसिस के प्रकार : सॉफ्ट टिशु कैंसर कई तरह का होता है, इसलिए इसकी सही प्रकृति के बारे में पता लगाना बहुत जरूरी है, ताकि उचित उपचार किया जा सके.
प्राइमरी डायग्नोसिस : किस भाग में ट्यूमर विकसित हो रहा है, इसका पता लगाने के लिए डॉक्टर इमेजिंग टेस्टिंग कराने की सलाह देते हैं. इसके तहत एक्स-रे, कंप्यूटराइज्ड टोमोग्रॉफी स्कैन्स, मेग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग, पोजीट्रॉन इमिशन टोमोग्रॉफी आदि टेस्ट किये जाते हैं.
सेकेंडरी डायग्नोसिस : बायोप्सी की जाती है, जिसके लिए लेबोरेटरी में जांचने के लिए ट्यूमर के उत्तकों का सैंपल लिया जाता है.
एडवांस डायग्नोसिस : पीइटी स्कैन, छाती का सीटी स्कैन और ग्लैंड्स की अल्ट्रासोनोग्रॉफी आदि.
सभी सॉफ्ट टिशु ट्यूमर कैंसरस नहीं
वैसे तो हमारे शरीर में कई तरह के सॉफ्ट टिशु ट्यूमर होते हैं, लेकिन सभी कैंसरस नहीं होते. सॉफ्ट टिशू में कई मामूली ट्यूमर भी होते हैं, जिनमें कैंसर नहीं होता और वे शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल नहीं सकते. लेकिन जब इस तरह की बीमारी के साथ ‘सार्कोमा’ शब्द जुड़ जाता है, तो इसका मतलब है कि उस ट्यूमर में कैंसर विकसित हो गया है और वह घातक है.
कितना घातक है : अगर सॉफ्ट टिशु का ट्यूमर लो ग्रेड का है यानी दूसरे भागों में नहीं फैला है तब 90 प्रतिशत मामलों में पूरी तरह उपचार संभव है. लेकिन जैसे-जैसे यह गंभीर होता जाता है, इसका उपचार मुश्किल होता जाता है. वैसे बहुत ही कम मामलों में इसका प्रथम चरण में डायग्नोसिस हो पाता है, क्योंकि इसमें जो ट्यूमर बनता है, वह बहुत गहराई में स्थित होता है, इसलिए इसका पता तीसरे या चौथे चरण में चलता है, जिस कारण उपचार बहुत कठिन हो जाता है.
चेतावनी भरे संकेत
प्रारंभिक स्तर पर कोई लक्षण दिखाई नहीं देते, क्योंकि ट्यूमर शरीर में बहुत गहराई में स्थित होता है. ट्यूमर विकसित हो जाने पर शरीर के किसी भी हिस्से में गांठ या उभार के रूप में दिखाई देता है. अगर ट्यूमर के कारण तंत्रिकाओं और मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है, तो दर्द होता है. इसके कुछ अन्य लक्षण हैं –
नयी गांठे विकसित होना या पहले वाली गांठों का आकार बढ़ जाना. इनमें असहनीय दर्द रहना.
सामान्य गतिविधियां करने में परेशानी आना.
थकान, अचानक व तेजी से वजन कम होना.
पेट में तेज दर्द, जो लगातार गंभीर होता जाये.
उल्टी या मल में खून आना.
अगर पैर में सार्कोमा है, तो चलने में लचक आना.
रिस्क फैक्टर्स
अधिकतर मरीजों में जिनमें यह विकसित होता है, कोई रिस्क फैक्टर नहीं होता. हालांकि कुछ फैक्टर्स हैं, जो इसका खतरा बढ़ा देते हैं, जैसे-
विरासत में मिले जेनेटिक सिंड्रोम जैसे न्यूरोफायब्रोमैटोसिस, गार्डनर सिंड्रोम, ट्यूबरस स्क्लेरोसिस और वर्नर सिंड्रोम.
अधिक मात्रा में रेडिएशन का एक्सपोज़र, जैसे दूसरे कैंसर के उपचार के लिए दी जाने वाली रेडिएशन थेरेपी.
कुछ निश्चित रसायनों का एक्सपोजर, जैसे विनाइल क्लोराइड, हर्बिसाइड आर्सेनिक और डायॉक्सिन.
विकास/प्रोग्रेशन
स्टेज 1 : ट्यूमर अधिक विकसित नहीं (लो ग्रेड) होता है और किसी लिम्फनोड या शरीर के दूसरे भागों में नहीं फैलता.
स्टेज 2 : ट्यूमर मध्यम आकार से विकसित रूप (इंटरमीडिएट से हाइ ग्रेड) का होता है, लेकिन कहीं और नहीं फैलता.
स्टेज 3 : ट्यूमर लिम्फनोड्स तक फैल जाता है, लेकिन दूसरे अंगों तक नहीं फैलता है.
स्टेज 4 : ट्यूमर दूसरे अंगों, जैसे- फेफड़ों, लिवर, हड्डियों आदि तक फैल जाता है.
उपचार के प्रमुख तरीके
प्रारंभिक स्तर पर पता चलने पर इसे सर्जरी द्वारा निकाला जा सकता है और ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है, लेकिन तीसरे या चौथे चरण में शरीर के दूसरे भागों तक फैल जाने पर केवल मैनेज किया जा सकता है. उपचार के विकल्प कैंसर प्रकार, ग्रेड और स्तर पर निर्भर करते हैं.
सर्जरी : यह सबसे मुख्य उपचार है. सर्जरी द्वारा ट्यूमर के आसपास के 1-2 सेमी क्षेत्र के स्वस्थ उत्तकों को भी निकाला जाता है, ताकि इसके पुनः विकसित होने के खतरे को कम किया जा सके.
रेडिएशन थेरेपी : इसमें ट्यूमर के उपचार के लिए रेडिएशन की हाइ पावर बीम का प्रयोग होता है. इसे तीन प्रकार से इस्तेमाल किया जाता है –
सर्जरी के पहले : सर्जरी के पहले रेडिएशन का इस्तेमाल ट्यूमर को शिरिंक करने के लिए किया जाता है, ताकि इसे निकालना आसान हो जाये.
सर्जरी के दौरान : सर्जरी के दौरान रेडिएशन के हायर डोज (इंट्रा ऑपरेटिव रेडिएशन) का इस्तेमाल टारगेट एरिया पर सीधे किया जाता है.
सर्जरी के पश्चात : सर्जरी के पश्चात रेडिएशन (पोस्ट ऑपरेटिव रेडिएशन) का इस्तेमाल बची हुई कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए.
कीमोथेरेपी : इस ड्रग ट्रीटमेंट में रसायनों का प्रयोग कैंसरस सेल को मारने के लिए किया जाता है. दवाइयां गोलियों के रूप में दी जाती हैं या नसों में इन्जेक्शंस द्वारा. रैबडोमायोसार्कोमा के उपचार के लिए अक्सर इसका प्रयोग किया जाता है.
टारगेटेड ड्रग ट्रीटमेंट : इसका परिणाम ड्रग्स कीमोथेरेपी से बेहतर आता है और यह उतनी टॉक्सिक भी नहीं होती.
कैसे बचें
सॉफ्ट टिशु कैंसर से बचने का केवल एक ही उपाय है कि सभी रिस्क फैक्टर्स से बचा जाए. हालांकि अधिकतर सार्कोमा उन लोगों में विकसित होते हैं, जिनमें इसका कोई रिस्क फैक्टर नहीं होता. इसलिए अभी वर्तमान में ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे इससे बचा जा सके. जो लोग रेडिएशन थेरेपी ले रहे हैं, उनके लिए तो खतरा बहुत बढ़ जाता है, लेकिन अगर आपको कोई रिस्क फैक्टर है, तो इस बारे में डॉक्टर से बिना देर किये चर्चा जरूर करें.
गांठ जो मांसपेशी के भीतर गहरी स्थित हो और छूने पर पता चले, सूजन या गांठ दोबारा निकल आयी हो, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें.
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