ग्लूकोमा से बचने के लिए सतर्कता है जरूरी, जानें बचाव के उपाय
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 22 Mar 2019 6:53 AM
डॉ रामेंद्र बख्शी, नेत्र रोग विशेषज्ञ, नेत्र विजन क्लीनिक, नयी दिल्ली आंखों की गंभीर बीमारी है ग्लूकोमा. अक्सर इसके शुरुआती लक्षण पकड़ में नहीं आते. समुचित उपचार न होने से यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है. यह आंखों की ऊपरी सतह को तो प्रभावित करता ही है, कई बार यह आंखों की रोशनी भी छीन लेता […]
डॉ रामेंद्र बख्शी,
नेत्र रोग विशेषज्ञ, नेत्र विजन क्लीनिक, नयी दिल्ली
आंखों की गंभीर बीमारी है ग्लूकोमा. अक्सर इसके शुरुआती लक्षण पकड़ में नहीं आते. समुचित उपचार न होने से यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है. यह आंखों की ऊपरी सतह को तो प्रभावित करता ही है, कई बार यह आंखों की रोशनी भी छीन लेता है. ग्लूकोमा अंधेपन का दूसरा बड़ा कारण माना जाता है.
दरअसल, आंख के काॅर्निया के पीछे सीलियरी टिशूज होते हैं, जिनसे एक्वेस ह्यूमर तरल पदार्थ बनता रहता है और बाहर निकल कर पुतलियों से होता हुआ आंख के भीतरी हिस्से में जाता है. इस प्रक्रिया से आंखें स्वस्थ रहती हैं. इसी से आंखों में नमी बनी रहती है. लेकिन, जब यह प्रक्रिया ढंग से काम नहीं करती है, तो आंखों पर इंट्राओक्यूलर प्रेशर बढ़ने लगता है. आंख के सीलियरी टिशूज भी डैमेज होने लगते हैं, जिससे एक्वेस ह्यूमर का प्रवाह कम होता जाता है. इससे मस्तिष्क को विजुअल सिग्नल भेजने वाली आंखों की आॅप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है और दृष्टि क्षमता कमजोर होने लगती है. इसे ओपन एंगल ग्लूकोमा कहते हैं. ध्यान न देने पर आंखों में प्रेशर बढ़ जाता है. एक्वेस ह्यूमर तरल पदार्थ का प्रवाह बंद हो जाता है. शुरुआत में धुंधला दिखाई देता है और ध्यान न देने पर अंधापन आ जाता है. इसे क्लोज एंगल ग्लूकोमा कहते हैं.
ग्लूकोमा के सेकेंड्री कारण : आनुवंशिक कारण के अंतर्गत परिवार में किसी को यह बीमारी हो, तो परिवार का कोई भी व्यक्ति उसका शिकार हो सकता है. प्रेग्नेंसी के दौरान आंखों की बनावट की गड़बड़ी से जन्मजात ग्लूकोमा के मामले देखे जाते हैं, जिनका समय पर इलाज जरूरी है. लंबे समय से स्टेराॅइड लेने, अस्थमा, आर्थराइटिस जैसी बीमारियों के मरीजों को भी यह बीमारी सताती है. चोट, सर्जरी, डायबिटीज, हार्ट डिजीज और ब्लडप्रेशर के मरीजों को भी यह बीमारी होने का खतरा रहता है.
जानें ग्लूकोमा से बचाव के उपाय
35 की उम्र के बाद साल दो बार, 40-54 साल में 3 बार, 55-64 साल में 2 बार और 65 साल के बाद हर 6 माह में आरएनएफएल जांच कराएं. आनुवंशिक कारण होने पर बच्चों के आंखों का चेकअप जरूर समय से कराएं. चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदले, तो डाॅक्टर से संपर्क करें. – आंखों में चोट लगने या कोई भी सर्जरी होने नियमित चेेकअप कराएं. आहार का विशेष ध्यान रखें, विटामिन ए, बी, सी और ई से युक्त आहार लें. आहार में हरी सब्जियां, फल, दूध, ड्राई फ्रूट्स आदि लें.
जांच : रेटिनल नर्व फाइबर लेयर एनालिसिस (आरएनएफएल) और विजुअल फील्ड टेस्ट से ग्लूकोमा की स्थिति का पता लगाया जाता है. आई प्रेशर मैनेजमेंट के लिए टोनोमेटरी टेस्ट, आॅप्टिक नर्व माॅनिटरिंग व पेरीमेट्री टेस्ट भी किये जाते हैं.
इलाज : इलाज के लिए प्रारंभिक अवस्था में पहचान व जांच जरूरी है. देर होने पर पूर्ण इलाज संभव नहीं हो पाता है. आंखों में बढ़े प्रेशर को कम करने के लिए मेडिसिन व आई ड्रॉप दी जाती है.
साथ में नियमित जांच जरूरी है. दवा से ठीक नहीं होने पर लेजर सर्जरी से आंखों की आॅप्टिकल नर्व ठीक कर ग्लूकोमा को नियंत्रित किया जा सकता है. सर्जरी के बाद आंखों को धूल-मिट्टी से बचाना चाहिए और आंखों को न रगड़ें. आंखों की सफाई का विशेष ध्यान रखें.
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