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पटना से बस पर होकर सवार, चलें सरहद के पार

Updated at : 23 Sep 2018 1:17 PM (IST)
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पटना से बस पर होकर सवार, चलें सरहद के पार

बस से बिहार की राजधानी पटना से नेपाल. 650 किमी की दूरी और 17 घंटे का सफर. रक्सौल बार्डर होते हुए आप जब बस से जाने की कल्पना करते हैं तो आपकी कल्पना को हकीकत का रूप बिहार राज्य पथ परिवहन निगम द्वारा इसी महीने शुरू की गयी भारत नेपाल बस सेवा कर देती है. […]

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बस से बिहार की राजधानी पटना से नेपाल. 650 किमी की दूरी और 17 घंटे का सफर. रक्सौल बार्डर होते हुए आप जब बस से जाने की कल्पना करते हैं तो आपकी कल्पना को हकीकत का रूप बिहार राज्य पथ परिवहन निगम द्वारा इसी महीने शुरू की गयी भारत नेपाल बस सेवा कर देती है. 11 सितंबर से शुरू हुई इस बस सेवा के पांच दिन बाद हम तीन दोस्तों ने नेपाल जाने का प्लान बनाया. गांधी मैदान से चलने वाली नेपाल बस सेवा के लिए हमने सीटें बुक करायी और उसके बाद हमारी यात्रा रविवार को दिन में दो बजे से तय हो गयी.

रविशंकर उपाध्याय
पटना : अपने पहचान पत्र के फोटो कॉपी को जमा कराने के बाद दोपहर दो बजे जब बस स्टैंड में आसमान से सूरज आग बरसा रहा था उसी वक्त हम 19 डिग्री सेल्सियस की ठंडक वाले एयरकंडिशन वाली बस में सवार हो जाते हैं. ट्रैफिक मैनेजर आशीष हमें हमारी सीट 1, 2 और 3 दिखाते हैं और इसके बाद गाड़ी अपने गंतव्य की ओर चल देती है. मुजफ्फरपुर, मोतिहारी और रक्सौल में अल्पविराम के बाद ठीक साढ़े नौ बजे बार्डर पर पहुंचती है जहां इमिग्रेशन वाले अपनी चेकिंग करते हैं. यहां ड्राइवर मनोज श्रीवास्तव हमें जानकारी देते हैं कि दस बजे के बाद बार्डर पार नहीं करने दिया जाता है, इस कारण हमलोग हर हाल में साढ़े नौ तक पहुंचने की काेशिश करते हैं. इसके बाद नेपाल के अधिकारी आकर लोगों की गिनती का मिलान करते हैं.
रक्सौल से काठमांडू की सड़क के हिचकोले रहेंगे याद
रक्सौल के ठीक पहले की बदहाल सड़क के बारे में हमें पहले से ही रक्सौल के साथी अभिषेक कुमार पांडे ने जानकारी दे दी थी. उन्होंने कहा था कि आपको रक्सौल के पहले पांच किमी की सड़क परेशान करेगी. यहां की सड़क में काफी गड्ढे हैं. जैसे ही हम उसमें झूल रहे होते हैं, कंडक्टर सतीश बताता है कि सर अभी नेपाल की सड़क देखियेगा काफी बुरा हाल है. हम परेशान होकर एक दूसरे को निहारने लग जाते हैं, अरे भाई इससे खराब हाल क्या होगा? खैर बार्डर से लेकर बीरगंज तक की सड़क कुछ ठीक होती है, रात के 11 बजे एक पेट्रोल पंप पर रुक कर बस में डीजल भरा जाता है क्योंकि 96 नेपाली रुपये प्रति लीटर की दर महज 60 भारतीय रुपये प्रति लीटर आती है. इस प्रकार हर लीटर में 18 रुपये की बचत हो जाती है. ड्राइवर मनोज श्रीवास्तव मुस्कुराते हुए कहते हैं कि सर देखिये हमारा देश ही नेपाल को तेल मुहैया कराता है और वही तेल यहां कितना सस्ता पड़ता है. हम सोचने लग जाते हैं कि तेल का गणित इन्हें कितना पता होता है.
मोहने लगी हरी भरी वादियां
बहरहाल बस में सवार 32 यात्रियों की तरह किसी प्रकार हम भी हिचकोले के बीच सोने की कोशिश करते हैं लेकिन सब नाकाम. हमारे मित्र नीरज कहते हैं कि आइए केबिन में ही बातचीत करते चलते हैं. यहां हमें सड़क का असल दृश्य दिखाई दे जाता है जिससे यह स्पष्ट होता है कि नींद क्यों नहीं आ रही थी. तड़के चार बजे पौ फटने के पहले हरी भरी वादियां और घाटियां दिखायी देने लगती है. काठमांडू शहर के ठीक पहले घाटियों के बारे में हमारे ड्राइवर का कहना था कि जाम नहीं मिला तो हम आठ साढ़े आठ बजे तक नेपाल की राजधानी में होंगे.
बुद्ध के जन्मे को देश मेरो नेपाल
राजधानी काठमांडू में हमें कुछ बोर्ड आकर्षित करते हैं जिसमें बुद्ध के जन्मेको देश मेरो नेपाल का टैगलाइन आपको बताता है कि आप नेपाल में हैं. वह धरती जहां बुद्ध का जन्म हुआ है. हम बुद्ध की ज्ञान भूमि के लोगों को यह पंचलाइन काफी पसंद आती है. खराब सड़कों के कारण धूल और धुएं के प्रदूषण से शहर परेशान हाल दिखता है. लेकिन महिलाओं का हर क्षेत्र में दखल आपको सुकून भी देता है. बहरहाल यह शहर के बारे में शुरुआती अनुभव थे. ठीक साढ़े आठ बजे सुबह आपकी बस काठमांडू के स्वयंभू चौक के स्टैंड पर आकर खड़ी हो जाती है. यहां हमारे ड्राइवर हमें कहते हैं कि आप सब नेपाली सिम कार्ड ले लीजिए ताकि आप संचार सेवाओं से जुड़े रहें. यहां सौ रुपये में आपको सिम कार्ड मिल जायेगा जिसमें आप 200 रुपये का वाऊचर लेकर तीन दिनों के लिए तीन जीबी फोर जी डाटा के साथ टॉकटाइम भी पा जाते हैं. यहीं मनी एक्सचेंज की भी सुविधा मिल जाती है. सौ भारतीय रुपये के बदले में आपको 160 नेपाल रुपये मिलते हैं. हालांकि आप पूरे नेपाल में आप भारतीय रुपये से भी सफर कर सकते हैं.
शहर का किया दीदार
एक होटल में हजार भारतीय रुपये में सभी सुविधाओं से युक्त कमरे में हम फ्रेश होकर अपना पहला पड़ाव पशुपति नाथ मंदिर जाने को तैयार होते हैं. शहर को जानने समझने के लिए सार्वजनिक परिवहन बस सेवा से जाने का निर्णय लिया. पशुपति नाथ मंदिर में व्यवस्थित रूप में पूजा हुई. कहीं भी हमें किसी ने तंग नहीं किया. मंदिर परिसर में मोबाइल कैमरे का प्रयोग प्रतिबंधित है, इस कारण शांति और ज्यादा थी. यहां के बाद बूढ़ा नीलकंठ मंदिर और फिर शहर की सैर. राज दरबार मार्ग, भृकुटि मंडप से लेकर चाइना मार्केट और मेन रोड में किताबों की दुनिया. हमें सबसे ज्यादा प्रभावित पैदल राहगीरों की व्यवस्था ने किया. बेहद साफ सड़क के दोनों तरफ लोहे की बैरिकेडिंग. सभी जेब्रा क्रासिंग का नियमपूर्वक प्रयोग करते हैं .अगले दिन हमने राज दरबार, बौद्ध मंदिरों की सैर की और उसी रात बस से पटना के लिए वापसी के बाद यह यात्रा बेहद यादगार रह गयी.
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