विलुप्त होती जा रही है फगुवा गाने की पंरपरा
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :02 Mar 2018 6:42 AM (IST)
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II जयराम मिश्रा II होली गाने वाली मंडलियों का भी घोर अभाव, होली गीतों में फुहड़ता के कारण भी लोग नहीं ले रहे रूचि सरस्वती पूजा के दिन से ही फाग शुरू हो जाता था. गांव-गांव में ढोल, झाल एवं करताल की धुनों पर फगुआ के गीतों की आवाज सुनाई देने लगती थीं जो अब […]
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II जयराम मिश्रा II
होली गाने वाली मंडलियों का भी घोर अभाव, होली गीतों में फुहड़ता के कारण भी लोग नहीं ले रहे रूचि
सरस्वती पूजा के दिन से ही फाग शुरू हो जाता था. गांव-गांव में ढोल, झाल एवं करताल की धुनों पर फगुआ के गीतों की आवाज सुनाई देने लगती थीं जो अब सुनने को नहीं मिलता है. आज की युवा पीढ़ी अपनी परंपरा एवं संस्कृति से दूर होती जा रही है. हालांकि अब भी ऐसे कुछ पुराने लोग हैं जो अपनी इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं. यही पुराने लोग अपनी लोक-संस्कृति की धरोहर को बचाने के लिए युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं. ऐसे ही कुछ लोक कलाकारों से बातचीत पर आधारित है राजमणी िसंह@जमशेदपुर की रिपोर्ट.
अब होली को सिर्फ हुल्लड़बाजी समझते हैं
दाईगुट्टू निवासी जयराम मिश्रा रामचरित मानस सत्संग समिति हनुमान मंदिर, मानगो के नाम से अपनी मंडली चलाते हैं. रामायण पाठ, फगुआ, कीर्तन आदि बड़े शौक से गाते हैं.
मूल रूप से भोजपुर के रहनेवाले जयराम मिश्रा के पिता एक अच्छे ढोलक वादक थे. उनके साथ बैठते-बैठते जयराम गाने में पारंगत हो गये. जयराम बताते हैं कि अब पहले वाली बात नहीं रह गयी है. युवा पीढ़ी अब होली को सिर्फ हुल्लड़बाजी समझती है. मैं तो अब भी कुछ बच्चों को होली के लोक गीतों के लिए प्रेरित करता हूं. जयराम बताते हैं कि होली गाने के लिए लोगों को मंडली नहीं मिलती है. मैं अपनी मंडली में करीब 20 जोड़ी झलवहिया लेकर चलता हूं. ढोलकर, झाल, करताल आदि के साथ होली गाने का मजा ही कुछ और होता है. इसका मजा मॉर्डन म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट नहीं दे सकता है.
पुराने गीतों को भूलते जा रहे हैं लोग
डिमना रोड निवासी सुधीर पांडेय नवयुवक संघ रामायण मंडली चलाते हैं. वे पांचवी क्लास में थे तभी से गाने लगे थे. सुधीर कहते हैं कि होली को लेकर पहले लोगों में एक अलग उत्साह रहता था, जो अब नहीं है. फिर भी हमलोग सरस्वती पूजा के दिन से ही फगुआ का ताल ठोक देते हैं. इसके बाद से शहर के विभिन्न मंदिरों समेत अन्य जगहों पर फाग गीत का सिलसिला शुरू हो जाता है. आज की युवा पीढ़ी इससे कोसों दूर है. अपनी संस्कृति एवं परंपरा से युवा पीढ़ी को जोड़ना जरूरी है. आज खोजने पर भी होली गाने के लिए कलाकार नहीं मिल रहे हैं. पुरानी होली गीतें लोग भूल गये हैं, अश्लीलता चरम पर है.
बढ़ गयी है बेसूरों की तादाद
पहले लोगों में होली गीत या फगुवा सुनने व सुनाने का काफी शौक था. अब लोग पैसा पर अधिक ध्यान दे रहे हैं. जिसके कारण जमशेदपुर अच्छे कलाकारों की कमी हो रही है. बेसूरों की तादाद बढ़ गयी है.
यह कहना है लोक गीत गायक सुनील सहाय का. सहाय कुछ युवाओं को प्रशिक्षण दे रहे हैं, ताकि लोक संस्कृति की परंपरा बची रहे. सहाय ने अपनी बेटी बीके सहाय को भी होली गीत गाने में पारंगत कर दिया है. दस नंबर बस्ती में रहनेवाले सुनील सहाय को गाने की प्रेरणा पिता वृजनंदन सहाय से मिली. वृजनंदन एक अच्छे ढोलकिया थे.
पुराने गीतों में है मिठास
आदित्यपुर निवासी मुन्ना तिवारी मृणाल 13 वर्ष की उम्र से लोक गीतों में रम गये थे. उन्हें लोक गीतों की प्रेरणा नाना सरवानंद शुक्ला से मिली. सरवानंद अपने जमाने के बेहतरीन तबला वादक थे. प्रारंभ में मुन्ना को नाना सरवानंद ही गाने का प्रशिक्षण देते थे. बाद उन्होंने आदित्यपुर निवासी वीरेंद्र उपाध्याय से संगीत की शिक्षा ली. मुन्ना खेसारी लाल जैसे भोजपुरी स्टार के साथ कई स्टेज शो भी परफॉर्म कर चुके हैं. अभी हाल फिलहाल में उनकी दो एलबम भी रिलीज हुई है. उनका मानना है कि समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अकेले में अश्लील गाना सुनने के आदी हैं. ऐसे लोग ही अश्लीलता को बढ़ावा दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि होली के पुराने गीतों में जो मिठास है वह अन्यत्र दुर्लभ है़
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