तुरंत उपचार से स्ट्रोक में रिकवरी संभव
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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पूरे विश्व में हृदय रोग के बाद मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण ब्रेन स्ट्रोक है. इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों के अपाहिज होने का एक बड़ा कारण भी यह रोग है. भारत में इसके मामले अन्य विकासशील देशों के मुकाबले काफी अधिक हैं. एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में हर साल 18 […]
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पूरे विश्व में हृदय रोग के बाद मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण ब्रेन स्ट्रोक है. इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों के अपाहिज होने का एक बड़ा कारण भी यह रोग है. भारत में इसके मामले अन्य विकासशील देशों के मुकाबले काफी अधिक हैं. एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में हर साल 18 लाख लोग इसके शिकार होते हैं. स्ट्रोक पड़ने के बाद यदि इसका जल्द से जल्द उपचार न हो, तो हर सेकेंड दिमाग की 32 हजार कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं. जबकि तुरंत उपचार से रोगी को अपाहिज होने से बचाया जा सकता है. वर्ल्ड स्ट्रोक डे के अवसर पर जानकारी दे रहे हैं हमारे एक्सपर्ट.
हाल में एक 52 साल के मरीज को इलाज के लिए लाया गया. उसे स्ट्रोक हुआ था, जिसके कारण लकवा मार गया था. यहां लाने से पहले उसे एक अन्य हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां तत्काल सर्जरी कराने की सलाह दी गयी. उसके बाद मरीज उसे यहां लेकर आये. तुरंत मरीज की सीटी स्कैन व एमआरआइ जांच करायी गयी. इससे पता चला कि उसके दिमाग में ब्लड क्लॉट बन गया था.
हालांकि, मरीज अभी होश में था. मरीज को ब्लड प्रेशर की भी शिकायत थी. चूंकि मरीज को स्ट्रोक के तीन घंटे के अंदर अस्पताल ले जाया गया था, इसलिए तुरंत उसे क्लॉट को दूर करने की दवाई दी गयी. इससे मरीज को काफी लाभ हुआ. यदि क्लॉट छोटा हो, तो सर्जरी की जरूरत नहीं होती है, ऐसा ही इस मरीज के मामले में भी हुआ. उसे कुछ दवाइयां दे दी गयीं, जिससे एक सप्ताह के अंदर काफी लाभ हुआ और काफी हद तक रिकवरी हो गयी. हाइ ब्लड प्रेशर के लिए नियमित दवाएं लेते रहने की सलाह दी गयी.
इस तरह के मामलों में समय का काफी महत्व होता है. यदि ब्लड क्लॉट से हुई रुकावट को दूर नहीं किया जाता है, तो ब्रेन में रक्त का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है और दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है, जो स्थायी होता है. इसलिए मरीज को दो से तीन घंटे के अंदर उपचार मिलना जरूरी होता है, ताकि खून के थक्के को दूर किया जा सके और मरीज की रिकवरी हो सकती है.
डायबिटीज से होता है स्ट्रोक का खतरा
डायबिटीज स्ट्रोक के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं होता है, बल्कि यह अप्रत्यक्ष रूप से इसके लिए जिम्मेदार होता है. दरअसल डायबिटीज एक ऐसा रोग है, जिससे पूरा शरीर प्रभावित होता है. इसके कारण दिमाग की खून की नलियों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. नसों पर एक पतली परत होती है, जो नष्ट हो जाती है. इस कारण यदि कोलेस्ट्रॉल भी बढ़ता है, तो वह उस डैमेज स्थान पर अटक जाता है.
धीरे-धीरे यह रुकावट बड़ी हो जाती है और एक दिन अचानक दिमाग के उस हिस्से में खून का प्रवाह रुक जाता है और शरीर के किसी में लकवा मार देता है. इस स्थिति में भी मरीज को दो-तीन घंटे के भीतर ले आया जाये, तो उसे खून पतला करने की दवाएं दी जाती हैं. इससे रिकवरी का चांस अधिक होता है. कोलेस्ट्रॉल व शूगर कम करने की भी दवाएं दी जाती हैं. ऐसे में यदि मरीज की रिकवरी हो जाती है, तो उसे डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल की दवाएं लगातार लेनी होती है, ताकि दोबारा स्ट्रोक का खतरा न हो.
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