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World Turtle Day: पर्यावरण के सच्चे दोस्त होते हैं कछुए, विशाल कछुए देखना हो तो जाएं गालापागोस द्वीप

Updated at : 22 May 2024 9:11 PM (IST)
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World Turtle Day: पर्यावरण के सच्चे दोस्त होते हैं कछुए, विशाल कछुए देखना हो तो जाएं गालापागोस द्वीप

कछुए को पर्यावरण का सच्चा दोस्त भी माना जाता है. ये वाटर इकोसिस्टम का अभिन्न अंश होते हैं, नदियों को स्वच्छ रखने में कछुए अहम भूमिका निभाते हैं. हर वर्ष 23 मई को विश्व कछुआ दिवस के रूप में मनाया जाता है. जानें कछुओं से जुड़ी रोचक बातें.

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World Turtle Day: कछुए धरती पर पाये जाने वाले पुराने जीवों में से एक हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, पहला जीव करीब 36 करोड़ साल पहले धरती पर आया. कछुओं के पहली बार धरती पर आने के कुछ ही समय बाद धरती से 90 प्रतिशत जीवन का अंत हो गया. कछुए भाग्यशाली थे कि धरती पर रहने के साथ वे जल में भी रह सकते थे. इस तरह वे खुद को धरती पर नयी परिस्थितियों में भी बचाये रखने में सफल हुए.

100 वर्ष से भी ज्यादा जीते

पृथ्वी पर मौजूद जीवों में सबसे लंबा जीवन जीवन जीने वालों में कछुए भी एक हैं. हालांकि, यह कछुओं की अलग-अलग प्रजातियों पर निर्भर करता है, लेकिन इनमें से ज्यादातर लंबा जीवन जीते हैं. पालतू कछुओं की उम्र 10 वर्ष से लेकर 80 वर्ष तक हो सकती है. वहीं, बड़े कछुए 100 वर्ष से भी ज्यादा समय तक जीते हैं.

300 से भी ज्यादा प्रजातियां

दुनियाभर में कछुओं की लगभग 300 से भी ज्यादा प्रजातियां पायी जाती हैं. कछुए रेप्टाइल्स हैं और आमतौर पर उनकी पीठ पर कार्टिलेज का कठोर कवच होता है. इन कवचों के आधार पर ही इनको अलग किया जा सकता है. सी टर्टल यानी समुद्री कछुए, लेदरबैक टर्टल, स्नैपिंग टर्टल, पॉन्ड टर्टल, सॉफ्ट शेल्ड टर्टल और टॉरटॉइज आदि इनके अलग-अलग प्रकार हैं.

सर्वाहारी होते हैं कछुए

पानी में या पानी के आसपास रहने वाले ज्यादातर कछुए सर्वाहारी होते हैं. वहीं, जमीन पर रहने वाले कछुए सब्जी व पत्तों से अपना पेट भरते हैं. उन्हें पत्तेदार सब्जियां और फल पसंद हैं. वहीं, मौका मिलने पर कछुए शैवाल व मछलियां भी खा लेते हैं. कछुओं एक प्रजाति होती है एलिगेटर टर्टल. ये पूरी तरह से मांसाहारी होते हैं.

पानी के बाहर देती हैं अंडे

कछुओं की हर प्रजाति की गर्भवती मादाएं अंडा देने के लिए सूखी धरती पर जाती हैं. अंडा देने से ठीक पहले वे अपने आवास के करीब किनारों पर घोसला बनाती है. सबसे खास बात है कि अंडे से बाहर निकलने के बाद नन्हें कछुओं को अपनी जरूरतें खुद ही पूरी करनी पड़ती हैं.

इनको याद रहता अपना रास्ता

अंडों से निकलने वाले बच्चे जन्म के साथ ही समुद्र की तरफ चल देते हैं और नये जीवन की शुरुआत करते हैं. ये समुद्र में लंबी दूरियां तय करते हैं. कई सालों बाद जब ये जब वयस्क हो जाते हैं, तब वापस उसी जगह पहुंचते हैं जहां इनका जन्म हुआ था. खास चुंबकीय सेंस होने की वजह से ही कछुए लगभग 12 वर्ष बाद भी घर का रास्ता नहीं भूलते. ये अपने जन्म की जगह पर ही ये अंडे देते हैं. दरअसल, कछुए धरती की मैग्नेटिक फील्ड का इस्तेमाल अपने जन्मस्थान तक पहुंचने के लिए करते हैं. जन्म के साथ ही कछुए इसे याद कर लेते हैं और सालों बाद भी इसकी मदद से अपने जन्मस्थान तक पहुंचने में कामयाब रहते हैं. हालांकि, यह इतना आसान भी नहीं है. क्योंकि ये मैग्नेटिक फील्ड बेहद धीमी गति से बदलती भी हैं. यी वजह है कि इन कछुओं का घोसला बिल्कुल उसी जगह नहीं बन पाता, जहां वे अंडे से बाहर आये थे.

शिकार से जीवन पर खतरा

करोड़ों सालों तक धरती पर जीवन जीते रहने के बावजूद आज कम-से-कम सात में से छह प्रजातियों को इंसानी गतिविधियों के कारण जोखिम में या फिर लुप्तप्राय सूची में डाला गया है. हर वर्ष हजारों कछुए मछलियों को पकड़े जानेवाली जाल में फंस जाते हैं. बहुत से कछुओं को खाल, अंडे व मांस के लिए भी मार दिया जाता है.

दो जगहों पर मिलते विशाल कछुए

विशाल कछुए दुनिया में दो ही जगह मिलते हैं. एक गालापागोस पर और दूसरे हिंद महासागर में अलदाबरा द्वीपों पर. ये कछुए 100 से भी ज्यादा साल तक जीवित रह सकते हैं. 16वीं सदी में गालापागोस पर इन कछुओं की तादाद 2.5 लाख हुआ करती थी, लेकिन शिकार के कारण 1970 के दशक में संख्या घटकर सिर्फ तीन हजार रह गयी. हालांकि, संरक्षण के बाद इनकी तादाद में बढ़ोतरी हुई है.

क्यों मनाया जाता है टर्टल डे

हर वर्ष 23 मई को दुनियाभर में टर्टल डे यानी कछुआ दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाये जाने का उद्देश्य जैव विविधता में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले कछुओं एवं उनके आवास के बारे में लोगों को जागरूक करना है. वर्ष 2000 से अमेरिकन टॉरटॉइज रेसक्यू (एटीआर) द्वारा हर वर्ष विश्व कछुआ दिवस उत्सव का आयोजन किया जाता है. एटीआर को वर्ष 1990 में स्थापित किया गया था.

कछुए से जुड़ी अन्य रोचक बातें

  • समुद्री कछुओं को ग्रीन टर्टल भी कहते हैं. यह हिंद महासागर और अटलांटिक महासागरो में पाया जाता है.
  • समुद्री कछुए पानी नहीं पीते, बल्कि आंखों के उपर मौजूद एक जोड़ी ग्रंथियों के द्वारा समुद्र से लवण प्राप्त करते हैं. समुद्री शैवाल और मछलियां इनका खाना है.
  • स्थलीय कछुओं को टेस्टूडो कहते हैं. यह एशिया , अफ्रीका और यूरोप के उष्णकटिबंधीय और शीतोष्ण क्षेत्रो में दूर-दूर तक पाया जाता है. ठंड के मौसम में यह जमीन के भीतर शीतनिष्क्रिय अवस्था में चला जाता है.
  • कछुए का कवच इसे हर तरह के बाहरी खतरों से सुरक्षा की गारंटी देता है. खतरे के समय कछुआ अपने सभी अंगों को समेटकर कवच के अंदर छिप जाता है.
  • कछुआ चाहे पानी में रहता हो या जमीन पर सबको अंडा देने के लिए जमीन पर ही आना पड़ता है. मादा कछुआ रेतीली भूमि में गड्डे बनाकर अंडे देती है.

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Vivekanand Singh

लेखक के बारे में

By Vivekanand Singh

Journalist with over 11 years of experience in both Print and Digital Media. Specializes in Feature Writing. For several years, he has been curating and editing the weekly feature sections Bal Prabhat and Healthy Life for Prabhat Khabar. Vivekanand is a recipient of the prestigious IIMCAA Award for Print Production in 2019. Passionate about Political storytelling that connects power to people.

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