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इस मंदिर में 3 दिनों तक नहीं कर सकता कोई भी पुरुष प्रवेश, जानें इसकी वजह

Updated at : 30 May 2025 10:04 PM (IST)
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Kamakhya Devi Temple History

Kamakhya Devi Temple History, Pic Credit- AI

Assam Tourism: भारत का प्रमुख शक्ति पीठ कामाख्या देवी मंदिर हर साल जून महीने में अंबुबाची मेले के दौरान तीन दिन के लिए बंद रहता है. यह पर्व मां कामाख्या के मासिक धर्म को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है, जहां पुरुषों का प्रवेश भी वर्जित होता है. यह परंपरा स्त्री शक्ति, सृजन और प्राकृतिक चक्र के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है.

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Assam Tourism, Kamakhya Devi Temple: भारत में शक्ति की उपासना के केंद्रों में से एक कामाख्या देवी मंदिर हर साल 22 से 25 जून तक तीन दिन के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाता है. इस दौरान पुरुषों का मंदिर परिसर में प्रवेश पूरी तरह वर्जित रहता है. यह कोई प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक गहन धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता से जुड़ा हुआ है जिसे “अंबुबाची मेला” कहा जाता है.

क्या है अंबुबाची मेला?

कामाख्या मंदिर में हर साल अषाढ़ माह (जून) में आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला एक अद्वितीय धार्मिक पर्व है. मान्यता है कि इसी समय मां कामाख्या को मासिक धर्म (menstruation) होता है. यह पर्व स्त्री शक्ति और सृजन क्षमता को सम्मान देने का प्रतीक माना जाता है. इन तीन दिनों में मंदिर के गर्भगृह के कपाट बंद रहते हैं और पूजा-अर्चना नहीं की जाती है. इसे प्राकृतिक प्रक्रिया के सम्मान के रूप में देखा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी स्त्री को रजस्वला अवस्था में आराम दिया जाता है.

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पुरुषों के प्रवेश पर पाबंदी क्यों ?

इन तीन दिनों के दौरान न केवल मंदिर बंद रहता है, बल्कि पुरुषों को मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता. इसका कारण सिर्फ धार्मिक नहीं, सामाजिक भी है. यह परंपरा स्त्रीत्व की गरिमा और प्राकृतिक चक्र का सम्मान करने के भाव से जुड़ी है. महिला शक्तियों को सर्वोच्च मानने वाले इस पर्व में पुरुषों को प्रतीकात्मक रूप से बाहर रखा जाता है, ताकि वह स्त्री शक्ति के इस विशेष समय का सम्मान कर सकें.

क्या होता है चौथे दिन?

तीन दिन तक मंदिर बंद रहने के बाद, चौथे दिन ‘स्नान’ और ‘शुद्धि’ के बाद मंदिर के कपाट दोबारा खोले जाते हैं. इसे ‘नवविवाह’ की तरह एक पवित्र आरंभ माना जाता है. इस दिन भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और मां कामाख्या के दर्शन के लिए कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं.

सामाजिक संदेश भी देता है ये पर्व

मासिक धर्म को लेकर आज भी समाज में कई प्रकार की गलतफहमियां हैं, वहीं कामाख्या मंदिर का यह उत्सव उस धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है जो रजस्वला स्त्री को अशुद्ध नहीं, बल्कि पूजनीय मानता है.

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Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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