Women’day 2020 : जब पहली बार महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए उठायी थी आवाज…

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Women’day 2020 : जब पहली बार महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए उठायी थी आवाज…

Women’day 2020 महिलाओं को जेंडर इक्वलिटी दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सहित सभी देशों की सरकारें भी काम कर रही हैं. आज जबकि हम लैंगिक भेदभाव मिटाकर स्त्री को एक इंसान का दर्जा दे रहे हैं और विश्व स्तर पर आठ मार्च को एक प्रतीक के रूप में महिलाओं को समर्पित दिवस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं.

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बनावटी चेहरा लिये

मैं एक औरत हूं

असली चेहरा तो

कहीं गुम हो गया है

बचपन से ही बंधनों में

जीने की आदत सी है…

यह चंद पंक्तियां हैं, जो वैश्विक स्तर पर महिलाओं के दोयम दर्जें का सूचक है. इसमें कोई दो राय नहीं कि महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में अभूतपूर्व बदलाव आया है, बावजूद इसके इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि एक इंसान के रूप में आज भी उनके साथ लैंगिक भेदभाव होता है. इसी लैंगिक भेदभाव के कारण महिलाओं के साथ हिंसा होती है, उन्हें काम का उचित मेहनताना नहीं मिलता और सामाजिक स्थिति भी शोचनीय है.

महिलाओं को जेंडर इक्वलिटी दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सहित सभी देशों की सरकारें भी काम कर रही हैं. आज जबकि हम लैंगिक भेदभाव मिटाकर स्त्री को एक इंसान का दर्जा दे रहे हैं और विश्व स्तर पर आठ मार्च को एक प्रतीक के रूप में महिलाओं को समर्पित दिवस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं. हमारे लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि आखिर कब, कहां और किन लोगों ने स्त्री अधिकारों की वकालत की और उनके लिए संघर्ष की शुरुआत की.

महिला दिवस की शुरुआत अधिकारिक रूप से उत्तरी अमेरिका में महिला श्रमिकों के आंदोलन के जरिये हुई. महिलाओं ने काम के घंटों को लेकर आंदोलन किया था और उसकी वक्त से अधिकारिक रूप से काम के घंटों को आठ घंटे का किया गया. पहली बार महिला दिवस का आयोजन 28 फरवरी को किया गया था, लेकिन रूसी क्रांति के बाद महिला दिवस का आयोजन आठ मार्च को होने लगा. संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1977 में महिला दिवस को पहली बार मान्यता दी. इसके बाद महिला अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की गयी और न्यूजीलैंड ने पहली बार महिलाओं को वोटिंग का अधिकार दिया.

यह बस शुरुआत दी, तब से लेकर आज तक महिलाओं को कई तरह की रुढ़ीवादी परंपरा से मुक्ति दी गयी और आज स्थिति यह है कि महिलाएं मंगल मिशन तक का हिस्सा बन चुकी हैं. चंद्रयान-2 के प्रोजेक्ट को हेड कर रही हैं. बावजूद इसके भारत में ही दाउद बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना हो रहा है. कहने का आशय यह है कि संघर्ष जारी है तब तक जबतक कि एक महिला के भी आंखों में आंसू हो.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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