Mardaani 3 ott release:रानी मुखर्जी ने कहा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देती है मेरी फिल्मोग्राफी

Updated at : 27 Mar 2026 6:10 AM (IST)
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Mardaani 3 OTT Release

मर्दानी 3 OTT रिलीज, फोटो- इंस्टाग्राम

अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने ओटीटी पर रिलीज हो रही फिल्म मर्दानी 3 के बारे में इस इंटरव्यू में बात की है

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mardaani 3 ott release :यशराज फिल्म्स की रानी मुखर्जी अभिनीत फ्रेंचाइजी फिल्म ‘मर्दानी 3’ आज से ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है में है. सात साल बाद इस फ्रेंचाइजी में रानी इंस्पेक्टर शिवानी शिवाजी रॉय के रूप में अपनी भूमिका को दोहरा रही हैं. रानी ने इस फिल्म के साथ इंडस्ट्री में अपने 30 साल पूरे कर लिये हैं. उन्होंने तीन दशक लंबे करियर का श्रेय अपने पेरेंट्स और फैंस के प्यार को दिया है. रानी मुखर्जी ने उर्मिला कोरी से इस फिल्म के अलावा अपने 30 साल के सफर पर कई दिलचस्प बातें शेयर कीं.

बॉलीवुड की एकमात्र सुपरहिट महिला प्रधान फ्रेंचाइजी ‘मर्दानी’ है. उसका चेहरा होना आपको कितना जिम्मेदार बनाता है?

मुझे लगता है कि मर्दानी को फीमेल फ्रेंचाइजी बोलना गलत होगा. फिल्म की एक ही परिभाषा होती है.अच्छी या औसत फिल्म. इसी के अनुसार किसी फिल्म को देखना चाहिए. जहां तक जिम्मेदारी की बात है, एक महिला पुलिस ऑफिसर का रोल करना बहुत जिम्मेदारी भरा काम है. मुझे लगता है कि यह फिल्म इस बात को मजबूती से रखती है कि महिला ऑफिसर उतने ही परिश्रम से उस मुकाम तक पहुंची हैं. जितना एक पुरुष ऑफिसर कर सकता है, उसमें भी उतनी ही सहनशीलता और शक्ति होती है.

शिवानी के किरदार में जाते हुए क्या आप पिछली फिल्मों को देखती हैं?

उम्र बढ़ती है. हम अलग-अलग दौर से गुजरते हैं. हमारे शरीर में हार्मोनल चेंज होता है, जिससे काफी बदलाव आता है. यही पहलू शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार में भी जोड़ा गया है.
शिवानी अपने ओहदे में बढ़ी है. शिवानी के किरदार की हिम्मत वही है, लेकिन कहानी हर बार अलग होती है, तो उसे उसी ढंग से परफॉर्म किया जाता है.

मर्दानी एक इंटेस फिल्म है. आप खुद भी एक मां हैं. क्या बेटी आदिरा को लेकर परेशान होती हैं ?

एक मां हमेशा मां ही होती है, फिर चाहे वह जब बच्चा बड़ा होता है और अपने आप स्कूल जाने लगता है. काफी वक्त पेरेंट्स से अलग रहता है, तो लगता ही है कि कलेजे का टुकड़ा निकल कर जा रहा है. वो चिंता और डर लगा ही रहता है. मेरे साथ भी वही होता है.

करियर के इस मुकाम में क्या बॉक्स ऑफिस का प्रेशर होता है?

कोई भी एक्टर बॉक्स ऑफिस से परे नहीं हो सकता है. अगर आप अदाकारा हैं, तो आपको बॉक्स ऑफिस की जरूरत होगी. बॉक्स ऑफिस का मतलब सिर्फ ये नहीं होता है कि कितने पैसे कमाये, बल्कि ये होता है कि कितने सारे लोगों ने आपका काम देखा है. एक एक्टर हमेशा चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उसका काम देखें. इंस्पायर हों और फीडबैक दें. यह बॉक्स ऑफिस ही होता है, जो शूटिंग के वक्त एक्टर्स को उनका बेस्ट देने के लिए मोटिवेट करता है कि लोगों को पिक्चर और पसंद आये.


पीछे मुड़कर देखती हैं, तो पहली फिल्म ‘राजा की आयेगी बारात’ की जर्नी को कैसे देखती हैं ?

सलीम अंकल उस फिल्म के निर्माता और हमारे फैमिली फ्रेंड्स थे. उन्होंने ही मुझे फिल्म ऑफर की थी. मैं फिल्म परिवार से आती थी, लेकिन मेरा परिवार कभी नहीं चाहता था कि मैं फिल्में करूं. मेरे पिता तो हमेशा चाहते थे कि मेरी शादी हो जाये. मेरी मां को ‘राजा की आयेगी बारात’ के लिए मेरा ऑडिशन पसंद नहीं आया था. उन्होंने सलीम अंकल को कहा भी कि रानी को उसमें लेंगे तो फिल्म डूब जायेगी, लेकिन उन्हें मुझ पर भरोसा था. मैंने उस वक्त फिल्म इसलिए की थी, क्योंकि अपने घरवालों को आर्थिक रूप से मदद कर सकूं. हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन मेरे पापा फिर भी मुझे फिल्मों में नहीं भेजना चाहते थे. तब सोच थी कि घर के लड़के की ये जिम्मेदारी होती है. लड़कियां शादी कर लें, वही अच्छा है. मैंने फिल्म पैसों के लिए ही की थी, लेकिन वक्त के साथ वह मेरा पैशन बन गयी.

30 साल की जर्नी का सबसे बड़ा रिवॉर्ड क्या रहा है ?

अपने परिवार के अलावा एक और मेरा बहुत बड़ा परिवार है. वो मेरे दर्शक हैं. इतने सालों से उन्होंने मेरा साथ दिया है. वो एक तरह से मेरे लिए रिवॉर्ड ही है, क्योंकि इतना बड़ा परिवार होना किसी आशीर्वाद की तरह है. इसके अलावा मेरे द्वारा निभाये गये किरदार, मेरी फिल्मोग्राफी महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देती है. ग्लोबल दर्शक मेरी फिल्मों को देखकर यह समझ सकते हैं कि भारतीय महिलाएं कितनी मजबूत हैं. यह पहलू भी मेरे करियर का सबसे बड़ा रिवॉर्ड है.

क्या करियर में सेटबैक भी रहा है ?

बहुत सारे रहे हैं. मेरा करियर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. गुलाम फिल्म में जब मेरी आवाज को डब कर दिया गया था. मेरे लिए वह रिजेक्शन आसान नहीं था. फिल्म ब्लैक के लिए नेशनल अवार्ड नहीं मिलने पर भी हर्ट हुई थी. मुझसे ज्यादा मेरे माता-पिता और मेरे फैंस दुखी थे, लेकिन हर सेटबैक से मैंने और मेहनत करना सीखा. मेरा फोकस बढ़ा और आखिरकार मैंने नेशनल अवार्ड अपने नाम कर ही लिया.

स्टारडम की आपकी क्या परिभाषा है ?

लोग आपको प्यार करें. आपके डायलॉग पर तालियां मारें. आपके इमोशनल सीन्स पर उनकी आंखें भर आयें. यही सब चीजें मुझे स्टारडम लगती हैं और मैं उन लकी एक्टर्स में से हूं, जिनके किरदारों से दर्शकों ने इस तरह से कनेक्ट किया है.

पहली बार स्टारडम का एहसास कब हुआ था ?

मैं गुलाम के प्रीमियर पर गयी थी. वह प्रीमियर मराठा मंदिर हुआ था. फिल्म के इंट्रोडक्शन सीन में मेरा हेलमेट निकलता है. लोग तालियां बजाने लगे. सीटी और हूटिंग करने लगे थे. वह पहला मौका था, जब मैंने अपने लिए उस तरह का शोर सुना था. वैसे मेरी पहली फिल्म ‘राजा की आएगी बारात’ के लिए जब मैं गैटी गैलेक्सी थिएटर गयी थी, तो लोगों को फिल्म के मेरे मोनोलॉग पर तालिया बजाते हुए देखा था. ‘कुछ कुछ होता है’ ने इंडस्ट्री में मुझे स्थापित कर दिया.

क्या निर्माता और निर्देशक की जिम्मेदारी को लेना चाहेंगी ?


मेरी बच्ची, मेरी मम्मी, मेरा घर-संसार है. इनके बीच में मैं अपने शूटिंग के लिए वक्त निकालती हूं. निर्माता-निर्देशक होना खासकर निर्देशक होना, बहुत बड़ा कमिटमेंट है. बेटी बड़ी होने के बाद शायद मैं सोचूं, लेकिन अभी मेरी दूसरी बहुत जिम्मेदारियां हैं.

आपकी बेटी आपकी फिल्मों को देखती है?

सच कहूं तो आदिरा मेरी फिल्में देख नहीं पाती है. वह बहुत इमोशनल है और मेरी फिल्मों में इमोशन भर भर कर होता है. यही वजह है कि वह ‘बंटी बबली’ और ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ जैसे फिल्में ही देख पायी हैं

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Urmila Kori

लेखक के बारे में

By Urmila Kori

I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.

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