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Assi Movie Review:सिस्टम पर सवाल उठाती यह फिल्म झकझोरती है

Updated at : 20 Feb 2026 6:00 AM (IST)
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assi movie review

assi movie review

सिनेमाघरों में आज रिलीज हुई फिल्म अस्सी देखने की प्लानिंग है तो इससे पहले पढ़ लें यह रिव्यु

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फिल्म -अस्सी 

निर्माता और निर्देशक -अनुभव सिन्हा 

कलाकार -तापसी पन्नू,कनी कुश्रुती ,कुमुद मिश्रा,जीशान अयूब,नसीरुद्दीन शाह,सीमा पाहवा ,मनोज पाहवा ,रेवती और अन्य 

प्लेटफार्म -सिनेमाघर 

रेटिंग – तीन 


assi movie review :मुल्क और थप्पड़ जैसी हार्ड हीटिंग फिल्में देने वाले  निर्देशक अनुभव सिन्हा और अभिनेत्री तापसी पन्नू की जोड़ी सिनेमाघरों में आज रिलीज हुई फिल्म “अस्सी “से एक बार फिर साथ आयी है.एक बार फिर यह जोड़ी जरुरी और मार्मिक मुद्दे को सामने लेकर आयी है. यह फिल्म रेप सर्वाइवर की कहानी है.उसके न्याय पाने के जद्दोजहद और सिस्टम के नाकामी की कहानी है. स्क्रिप्ट की कुछ कमियों के बावजूद यह फिल्म समाज को आईना दिखा जाती है. यह फिल्म आपको सिर्फ हैरान ही नहीं बल्कि परेशान भी करती है. फिल्म देखते हुए कई तरह की बातें आपके दिमाग में आती है.कुछ दृश्य चुभते नहीं बल्कि रोंगटे खड़े कर देते हैं. मेकर्स ऐसा चाहते हैं ताकि दर्शक भी वह दर्द महसूस करे.

 ये है कहानी

 फिल्म का पहला दृश्य ही विचलित करने वाला है. जब स्क्रीन पर बुरी तरह से क्षत विछित हालत में एक महिला दिखती है. अगले ही सीन में फिल्म अतीत में जाती है और दिखाया जाता है कि वह महिला परीमा (कनी कुश्रुती ) है. जो एक टीचर है.वह अपने पति विनय (जीशान अयूब )और बेटे ध्रुव (अद्विक जायसवाल )के साथ दिल्ली में रहती है. उनकी जिंदगी खुशियों से भरी है. एक दिन स्कूल की  एक फेयरवेल पार्टी की वजह से परीमा को घर के लिए निकलने में देर हो जाती है. रास्ते में पांच युवा उसका अपहरण कार में उसका बारी बारी से बलात्कार करते हैं और फिर उसे रेलवे ट्रैक पर छोड़कर भाग जाते हैं.परीमा अस्पताल पहुंचती है और दिल्ली पुलिस आरोपियों को पकड़ लेती है.उसके बाद अदालत की जंग शुरू होती है.परीमा  का केस रावी (तापसी पन्नू )लड़ती है. शुरुआत में कोई भी सबूत दोषियों को गुनहगार साबित नहीं करता है. डीएनए रिपोर्ट मेल नहीं खाती है.परीमा आरोपियों को पहचान नहीं कर पा रही है.क्या दोषियों को सजा मिलेगी. यह कहानी इतने भर की नहीं है बल्कि एक अम्ब्रेला मैन भी है. जो सिस्टम से निराश लोगों के लिए ख़ुशी बनकर आता है और  कोर्ट के सजा सुनाने से पहले वह दोषियों को सजा देना शुरू कर देता है. क्या परीमा को न्याय अम्ब्रेला मैन दिलाता है या भारतीय कानून. इसके लिए आपको सिनेमाघर का रुख करना पड़ेगा. 

फिल्म की खूबियां 

अनुभव सिन्हा निर्देशित यह फिल्म अपने पहले ही फ्रेम से आपको असहज करने के साथ साथ खुद से जोड़ लेती है. अनुभव सिन्हा की इस फिल्म का शीर्षक 80 है क्योंकि हर दिन 80 रेप केस भारत में दर्ज होते हैं. अनुभव सिन्हा ने  सिर्फ शीर्षक या संवाद तक इस आंकड़े को सीमित नहीं रखा है बल्कि यह भी सुनिश्चित किया है कि आंकड़ों का महत्व दर्शकों के मन में बना रहे. हर 20 मिनट में स्क्रीन लाल हो जाती है और एक टाइमर दिखाई देता है, जो बताता है कि भारत में बलात्कार का एक और मामला दर्ज हो गया है. यह भयावह वास्तविकता को उजागर करता है.इस भयावह वास्तविकता को कोर्ट रूम ड्रामा के ज़रिये पेश किया गया है.कोर्ट रूम ड्रामा वाली यह फिल्म विजिलेंट ड्रामा के भी रंग लिए हुए  है.इसके साथ ही  फिल्म शिक्षा व्यवस्था,सोशल मीडिया, पितृ सत्ता समाज सभी पर चोट करते हुए  हम सभी से यह सवाल पूछती है कि एक समाज के तौर पर हम कहाँ खड़े हैं. अनुभव सिन्हा की यह फिल्म इस पहलू को भी रेखांकित करती है कि  एक बलात्कार कई जिंदगियों को हमेशा के लिए बदल देता है. सर्वाइवर और उससे जुड़े लोग फिर कभी दुनिया को पहले जैसी नजरों से नहीं देख पाते. परिमा के बेटे और पति के किरदारों के जरिये इसे दिखाया गया है. जो दिल को छूता है. फिल्म का ट्रीटमेंट पूरी तरह से रियलिस्टिक रखा गया है. खासकर कुछ दृश्य और संवाद आपको अंदर तक हिला देते हैं. फिल्म का पहला दृश्य हो या फिर कार में रेप की वह भयावह घटना. सीमा पाहवा के साथ कनी का सीन भी असहज करता है. तकनीकी तौर पर फिल्म मजबूत है. प्रोडक्शन डिजाइन वास्तविकता के करीब है.सिनेमेटोग्राफी किरदार के दर्द और घुटन को भी दिल्ली के सड़कों और घरों से बयां कर जाती है. बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म को गहराई देता है.फिल्म के संवाद चीखते हुए नहीं बोले गए हैं लेकिन वह समाज और सिस्टम दोनों की नाकामी को बयां करते हैं. फिसलने की एक सीमा होनी चाहिए , एक खूंटी होनी चाहिए. स्कूल का रिजल्ट बेस्ट आ रहा है लेकिन पूरा स्कूल फेल हो गया है.

 कुछ खामियां भी हैं 

फिल्म के कमजोर पहलुओं में स्किप्ट है. कोर्ट रूम में पसीने से लथपथ जिरह करता वकील स्क्रीन पर पहली बार दिखा हो, लेकिन रेप सर्वाइवर और उनके संघर्ष में यह फिल्म कुछ नया नहीं जोड़ पायी है. यही फिल्म की सबसे बड़ी चूक है. सेकेंड हाफ से कहानी में बिखराव होता गया है.फिल्म का सब प्लॉट्स में बहुत कुछ जोड़ा गया है. करप्शन, विजिलेंटे ड्रामा , बलात्कारी से शादी ,शिक्षा व्यवस्था, बच्चों की परवरिश.सबकुछ समेटने के चक्कर में यह फिल्म किसी भी सब प्लॉट को मजबूती नहीं दे पायी , जो जरुरत थी. कुछ सवालों के जवाब भी स्क्रीनप्ले नहीं दे पाया है.अम्ब्रेला  मैन ने रेप के आरोपियों में से एक की प्रेमिका की हत्या क्यों कर दी थी. इसके बारे में फिल्म में बताया नहीं गया है.मनोज पाहवा ,सुप्रिया पाठक , जीशान के किरदार पर थोड़ा और फोकस होना चाहिए था.

एक्टिंग डिपार्टमेंट बेहद मजबूत 

अभिनय की बात करें तो फिल्म में अभिनय के भरोसेमंद  नाम जुड़े हुए हैं. इन सभी में सबसे प्रभावी कनी कुश्रुती  रही हैं. उनका अभिनय फिल्म की आत्मा है. तापसी पन्नू ने एक बार फिर अपने अभिनय में बेहतरीन रही हैं.मनोज पाहवा,जीशान अयूब ,रेवती ,नसीरुद्दीन शाह ,कुमुद मिश्रा सभी ने अपनी -अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.जतिन गोस्वामी अपनी उपस्थिति दर्शाने में कामयाब रहे हैं. फिल्म की बाकी की सपोर्टिंग कास्ट का काम भी अच्छा है.फिल्म के मजबूत पहलुओं में से इसका एक्टिंग डिपार्टमेंट है.–

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Urmila Kori

लेखक के बारे में

By Urmila Kori

I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.

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