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Ikkis Movie Review :वॉर हीरो की यह कहानी भाईचारे की सीख देती है

धर्मेंद्र और अगस्त्य नंदा स्टारर फिल्म इक्कीस देखने की प्लानिंग है तो इससे पहले पढ़ लें यह रिव्यु

फिल्म – इक्कीस 

निर्माता -मैडॉक फिल्म्स 

निर्देशक – श्रीराम राघवन 

कलाकार – धर्मेंद्र ,अगस्त्य नंदा,जयदीप अहलावत,सिमर भाटिया,  असरानी,राहुल देव,सिकंदर खेर और अन्य 

प्लेटफार्म -सिनेमाघर

 रेटिंग – तीन 


ikkis movie review :फिल्म के एक संवाद में पाकिस्तानी बिग्रेडियर नासिर का किरदार कहता है कि अरुण दुश्मन को हराना चाहता था.भारतीय ब्रिगेडियर एमएल खेत्रपाल जवाब में कहते हैं कि कौन दुश्मन है.यही  लाइनें फिल्म को परिभाषित करती है. यह एक वॉर ड्रामा फिल्म है,लेकिन यह फिल्म युद्ध की मानवीय कीमत और हिंसा से होने वाले नुकसान पर बात करती है.फिल्म वॉर हीरो अरुण खेत्रपाल की बहादुरी की कहानी तो कहती है लेकिन पड़ोसी मुल्क के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी नहीं करती है बल्कि माफ कर देने की सीख दे जाती है. कुल मिलाकर इक्कीस हिंदी सिनेमा की पॉपुलर वॉर ड्रामा फिल्म नहीं है. यह संदेश देती है.भारतीय और पाकिस्तानी मूल रूप से एक समान हैं, दोनों तरफ के सैनिक केवल आदेशों का पालन कर रहे हैं, कोई भी दोषी नहीं है. युद्ध से दोनों पक्षों के लिए केवल नुकसान ही होता है.

वॉर हीरो की कहानी के साथ मानवता की भी कहानी 

फिल्म इक्कीस की शुरुआत 71 के भारत पाकिस्तान युद्ध से होती है फिर कहानी 30 साल बाद भारतीय रिटायर्ड ब्रिगेडियर एमएल खेत्रपाल (धर्मेंद्र )पर पहुंच जाती है.जो साल 2001 में  भारत से पाकिस्तान में अपने कॉलेज  रियूनियन के लिए गए हुए हैं.वहां उनकी मुलाक़ात पाकिस्तानी ब्रिगेडियर नासिर (जयदीप अहलावत )से होती है. नासिर की एमएल खेत्रपाल से एक खास बॉन्डिंग बन जाती है. महज कुछ दिनों की इस यात्रा में नासिर के पूरे परिवार से खेत्रपाल का आत्मीय रिश्ता बन जाता है. नासिर पाकिस्तान से जुड़ी खेत्रपाल की जड़ों से भी जोड़ने का काम करता है.जैसे खेत्रपाल का परिवार आज़ादी से पहले पाकिस्तान के जिस पिंड सरगोधा में रहता था.वहां भी नासिर उन्हें ले जाता है. सीनियर खेत्रपाल का एक और नाता पाकिस्तान से है. पाकिस्तान में ही उनके 21 वर्षीय सेकेंड लेफ्टिनेंट बेटे अरुण (अगस्त्य नंदा )को 71 की जंग में  शहादत मिली थी.नासिर क्या उस शहादत से जुड़ा है.फिल्म की कहानी इस सवाल का जवाब देने के साथ -साथ अतीत में जाकर इक्कीस वर्षीय सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की उस जर्नी को भी दर्शाती है.जिसने उन्हें सबसे कम उम्र में सेना के सबसे बड़े बहादुरी सम्मान परम वीर चक्र का हकदार बना दिया था.

फिल्म की खूबियां और खामियां 

फिल्म वॉर ड्रामा है. वो भी भारत और पाकिस्तान के युद्ध पर लेकिन इसका ट्रीटमेंट अलग किया है. फिल्म अमन और भाईचारे की बात करती है. एक दूसरे को माफ़ कर देने की सीख है. फिल्म रियल घटना पर आधारित है इसलिए और ख़ास बन जाती है. ब्रिगेडियर खेत्रपाल उस देश गए हैं, जिसने उससे उनका इक्कीस साल का बेटा छीन लिया लेकिन उनके मन में कोई नफरत नहीं है. जिस इंसान के हाथों उनके बेटे की जान गयी थी.वह उसे भी दिल से गले लगाते हुए उसे अपने घर आने के लिए भी कहते हैं. जिससे इस फिल्म के पीछे का मकसद पूरी तरह से समझा जा सकता है.वॉर ड्रामा फिल्मों में ज्यादातर युद्ध रात के अंधेरे में दिखाया जाता है. दोनों तरफ से लगातार हमला होता रहता है. हिंदी फिल्मों में युद्ध की ऐसी छवि पेश की गयी है.लेकिन इस फिल्म में युद्ध को बहुत ही रियलिस्टिक तरीके से पेश किया गया है.फिल्म के सबसे मार्मिक क्षणों में से वह एक है,जब नसीर अरुण खेत्रपाल की बहादुरी के लिए सच्ची संवेदना और सम्मान के साथ बात करते हैं.फिल्म की खामियों की बात करें तो फिल्म का फर्स्ट हाफ धीमा हो गया है. फिल्म की कहानी असल घटना पर आधारित है लेकिन कालखंड कारगिल युद्ध के तुरंत बाद यानी 2001 का होना अखरता है. कारगिल युद्ध के बाद पाकिस्तान से इस तरह का भाईचारा हजम करना मुश्किल लगता है.नासिर के किरदार ने युद्ध में वही किया जो एक सैनिक करता था। ऐसे में वह अरुण की मौत को लेकर कशमकश में क्यों था.यह बात समझ नहीं आती है. फिल्म फोकस  टैंक युद्ध पर है, लेकिन कहानी में टैंक वॉर को उस तरह से प्रमुखता नहीं मिली है.जितनी जरुरत थी. उसपर थोड़ा और डिटेल में काम होना था. फिल्म 70 का दशक अभिनेत्री के लुक और हेयरस्टाइल में नज़र नहीं आया है.

धर्मेंद्र इमोशनल कर गए हैं

हिंदी सिनेमा के हीमैन स्वर्गीय धर्मेंद्र को परदे पर देखना सुखद अनुभव देने के साथ -साथ इमोशनल भी कर जाता है. वह फिल्म के अहम नायक हैं. यह कहना गलत ना होगा. इस फिल्म से अमिताभ के नाती अगस्त्य नंदा ने बड़े परदे पर अपनी शुरुआत की है.आर्चिज के मुकाबले वह इस फिल्म में एक अलग अभिनेता नज़र आते हैं.किरदार को उन्होंने मेहनत के साथ जिया है.जयदीप एक उम्दा कलाकार एक बार फिर उन्होंने ये बात साबित कर दी है.किरदार से जुडी कश्मकश को वह बखूबी दर्शा गए हैं.सिमर भाटिया अपने किरदार के साथ न्याय करती है. उन्हें अपनी डायलॉग डिलीवरी पर थोड़ा और काम करने की जरुरत है .स्वर्गीय एक्टर असरानी भी इस फिल्म में नज़र आये हैं. उनका और धर्मेंद्र का सीन अच्छा बन पड़ा है सिकंदर खेर,राहुल देव और विवान अपनी -अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करते हैं.

Urmila Kori
Urmila Kori
I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.

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