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FILM REVIEW: ‘बार बार देखो'' को एक बार भी देखना मुश्किल...

Updated at : 09 Sep 2016 2:52 PM (IST)
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FILM REVIEW: ‘बार बार देखो'' को एक बार भी देखना मुश्किल...

II उर्मिला कोरी II फिल्म: बार बार देखो निर्माता: करन जौहर,रितेश सिधवानी,फरहान अख्तर निर्देशक: नित्या मेहरा कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा,कट्रीना कैफ ,सारिका,राम कपूर रेटिंग: डेढ़ हिंदी फिल्मों की सबसे पुराना और सफल जॉनर लव स्टोरीज रही हैं. इसी की अगली कड़ी ‘बार बार देखो’ है. फिल्म में प्रेम कहानी को आज, कल और आनेवाले कल यानि […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्म: बार बार देखो

निर्माता: करन जौहर,रितेश सिधवानी,फरहान अख्तर

निर्देशक: नित्या मेहरा

कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा,कट्रीना कैफ ,सारिका,राम कपूर

रेटिंग: डेढ़

हिंदी फिल्मों की सबसे पुराना और सफल जॉनर लव स्टोरीज रही हैं. इसी की अगली कड़ी ‘बार बार देखो’ है. फिल्म में प्रेम कहानी को आज, कल और आनेवाले कल यानि टाइम ट्रैवल के सबसे कम बॉलीवुड में आज़माए गए फार्मूले के मद्देनज़र कहने की कोशिश की गयी है. साल 1990 से 2045 तक कहानी का ताना बाना बुना गया है.

फिल्म की कहानी की बात करें तो यह कहानी दिल्ली के रहने वाले मैथ्स के प्रोफेसर जय वर्मा (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है. अब तक की कई बॉलीवुड फिल्मों की कहानी की धुरी यह रही है जब नायक अपने रिश्तों से ज़्यादा कैरियर को महत्व देता है. वह प्यार तो करता है लेकिन शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहता है. शादी को वह अपने सफल करियर में बाधा समझता है. जय की भी ऐसी ही सोच है.

जय दिया कपूर (कटरीना कैफ) का बचपन का प्यार है. दोनों की शादी होने वाली है उसी वक़्त जय को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से भी ऑफर आता है जहाँ पढ़ाना उसका सपना है लेकिन दिया और उसके पिता (राम कपूर) नहीं चाहते की जय विदेश जाए. ऐसे में जय दिया से शादी न करने का फैसला करता है. यहीं से कहानी आगे बढ़ती है और अचानक जय को अपने आनेवाले भविष्य को देखने का मौका मिलता है. उसे रिश्तों की अहमियत मालूम होती है.

कैसे उसे मालूम होता है ज़िन्दगी छोटी छोटी खुशियों में ही रची बसी है. फिल्म की इस साधारण सी कहानी को टाइम ट्रेवल के जरिए बयां करने की कोशिश हुई है. यह बात ही इस फिल्म की यूएसपी है लेकिन परदे पर इस चक्कर में जो कुछ भी नज़र आया है वह निराश करता है. खासकर फिल्म की कहानी. फिल्म का फर्स्ट हाफ औसत है लेकिन सेकंड हाफ बहुत कमज़ोर है. सेकंड हाफ में फिल्म बोर करने लगती है अगर ये कहा जाए तो गलत न होगा.

नवोदित निर्देशिका नित्या बतौर निर्देशक अपनी छाप छोड़ने में असफल रही हैं. अभिनय की बात करें तो यह फिल्म पूरी तरह से सिद्धार्थ के किरदार के मद्देनजर से कही गयी कहानी है. फिल्म में उनके किरदार की 60 सालों की जर्नी को दिखाया गया है. हर उम्र के पड़ाव को सिद्धार्थ मल्होत्रा ने सहजता से जिया है फिर चाहे युवा मन की दुविधा हो या फिर बुढ़ापे का अकेलापन.

कट्रीना अभिनय से फिल्म में भले ही ज़्यादा रंग नहीं भर पायी हैं लेकिन फिल्म में वह बहुत खूबसूरत नज़र आईं हैं. राम कपूर का किरदार औसत था तो सारिका जैसी मंझी हुई अभिनेत्री के लिए करने को कुछ ख़ास नहीं था. बाकी सह कलाकारों का काम ठीक ठाक है.फिल्म के लोकेशन बहुत खूबसूरत हैं.

फिल्म के गीत संगीत की बात करे तो कई नाम इस फिल्म से जुड़े हैं लेकिन काला चश्मा गीत को छोड़ और कोई गीत फिल्म में जंचता नहीं है. कुलमिलाकर अपनी स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले की वजह से बार बार देखो एक बार भी देखनी मुश्किल है.

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