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'Bhavai' film review: रामायण और रावण पर अलग और नया दृष्टिकोण रखने से चूकती है फिल्म

फ़िल्म भवई (रावण लीला) अपने ट्रेलर लॉन्च के साथ ही विवादों में पड़ गयी थी. विवाद बढ़ते देख फ़िल्म का नाम रावण लीला हटा दिया गया और फ़िल्म ने थिएटर में भवई शीर्षक के साथ दस्तक दी है. फिल्म अपने ट्रेलर में रावण के किरदार को एंटी हीरो के तौर पर परिभाषित करने की कोशिश करती है.

By उर्मिला कोरी
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Bhavai film review
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फ़िल्म : भवई

निर्माता : जयंती लाल गाड़ा

निर्देशक : हार्दिक गज्जर

कलाकार : प्रतीक गांधी,ऐन्द्रिता रे, राजेश शर्मा,अभिमन्यु, फ़्लोरा सैनी और अन्य

रेटिंग : दो

फ़िल्म भवई (रावण लीला) अपने ट्रेलर लॉन्च के साथ ही विवादों में पड़ गयी थी. विवाद बढ़ते देख फ़िल्म का नाम रावण लीला हटा दिया गया और फ़िल्म ने थिएटर में भवई शीर्षक के साथ दस्तक दी है. फिल्म अपने ट्रेलर में रावण के किरदार को एंटी हीरो के तौर पर परिभाषित करने की कोशिश करती है जिस वजह से उम्मीद थी कि यह फिल्म रामायण और रावण पर एक नया दृष्टिकोण रखेगी लेकिन यह फिल्म इस उम्मीद पर खरी नहीं उतरती है.

फ़िल्म की कहानी गुजरात के छोटे से गांव खाखर के रहने वाले राजराम (प्रतीक गांधी)की है जो अपनी पिता की खुशी के लिए छोटे मोटे काम कर रहा है लेकिन उसका असल सपना एक्टर बनने का है।खाखर गांव में रामलीला मंडली आती है तो उसका यह सपना सच हो जाता है. उसे रावण की भूमिका भी मिल जाती है. जिससे उसके पिता को ऐतराज है. उनकी सोच है कि इंसान जो करता है वो वही बन जाता है.

राजाराम अपने पिता को समझाता है कि वह रावण की भूमिका निभा रहा है लेकिन दिल से वो राम है. दिल से राम लेकिन अभिनय में रावण का किरदार निभा रहे राजाराम को नाटक मण्डली की सीता यानी रानी (एन्द्रिता राय) से प्यार हो जाता है. दोनों गांव से दूर बम्बई जाने की योजना बनाते हैं. अब प्रेमकहानी है नायक नायिका हैं तो तो खलनायक भी होंगे ही.

निर्देशक हार्दिक गज्जर अपनी इस कहानी में लोगों की अंध भक्ति को भी केंद्रित करते हैं. जो एक्टर्स को भगवान राम सीता समझ पूजा करने लगते हैं और रावण के किरदार करने वाले से घृणा. ऐसे में इस भीड़ को वो लोग आसानी से गुमराह कर सकते हैं जो आस्था का कारोबार कर अपनी राजनीति चमकाते हैं। निर्देशक हार्दिक गज्जर अपनी इस दो घंटे की फिल्म में धर्म से राजनीति के जुड़ जाने की भयावहता को भी दिखाने की कोशिश करते हैं.

फिल्म की कहानी का मूल कांसेप्ट बहुत ही विचारोत्तेजक है लेकिन पर्दे पर जो कहानी आयी है. वह बहुत ही सपाट है .आगे क्या होगा. यह आपको पता होता है. जिस वजह से फिल्म का अंत भी आपको चौंकाता नहीं है क्यूंकि आपको मालूम होता है कि यही अंत इस फिल्म का निश्चित है. कहानी में ट्विस्ट एंड टर्न की बहुत ज़रूरत थी. फिल्म के शीर्षक और संवाद पर बढ़ते विवाद को देखकर विवाद से बचने के लिए अगर फिल्म के साथ बहुत ज़्यादा कांट छांट की गयी है तो यह फिल्म का ही नुकसान क्रर गयी है.

अभिनय की बात करें अपने इस बॉलीवुड डेब्यू फिल्म में प्रतीक गांधी ने अपनी छाप छोड़ते हैं. वह रावण के किरदार में अलग रंग भरते हैं. ऐन्द्रिता राय ,राजेश शर्मा ,अभिमन्यु सिंह,फ़्लोरा सैनी अपनी भूमिकाओं में न्याय करते हैं.

फिल्म के गीत संगीत की बात करें तो रामलीला को जिस तरह से स्टेज में गद्य के तरीके से प्रस्तुत किया गया है.वह अच्छा बन पड़ा है लेकिन फिल्म में लव सांग्स की भरमार है. एक खत्म नहीं होता है कि दूसरा शुरू हो जाता है, फिल्म के संवाद और सिनेमेटोग्राफी कहानी के अनुरूप है. कुलमिलाकर फिल्म अपने मूल विषय के साथ न्याय नहीं कर पायी है.

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