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बाजार में कोल्हापुरी सैंडलों की धूम, प्राडा ने भारतीय कारीगरों से मिलाया हाथ

Updated at : 11 Dec 2025 10:11 PM (IST)
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Prada Kolhapuri Sandals

इटली के ब्रांड प्राडा ने भारतीय कारीगरों से की साझेदारी.

Prada Kolhapuri Sandals: प्राडा ने महाराष्ट्र और कर्नाटक के कारीगरों के साथ मिलकर कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित सैंडल बनाने के लिए लिडकॉम और लिडकार के साथ एमओयू किया है. इस पहल से भारतीय हस्तकला को वैश्विक मंच मिलेगा और कारीगरों को आधुनिक डिजाइन व अंतरराष्ट्रीय मानकों का प्रशिक्षण प्राप्त होगा. जीआई टैग प्राप्त कोल्हापुरी चप्पलों की परंपरागत कारीगरी अब प्राडा की लक्जरी डिजाइन से जुड़ेगी, जिससे भारतीय कला और वैश्विक फैशन उद्योग के बीच नया सहयोग विकसित होगा.

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Prada Kolhapuri Sandals: इटली के प्रतिष्ठित लक्जरी फैशन ब्रांड प्राडा ने भारतीय कारीगरों की अद्भुत हस्तकला को ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर ले जाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है. महाराष्ट्र सरकार के उपक्रम लिडकॉम और कर्नाटक सरकार के लिडकार के साथ प्राडा ने कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित लक्ज़री सैंडल बनाने के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए. यह समझौता मुंबई स्थित इटली के महावाणिज्य दूतावास में हुआ, जिसमें परियोजना के ढांचे, संचालन और क्रियान्वयन की योजना तय की गई.

मेड इन इंडिया से प्रेरित है प्राडा

इस साझेदारी का उद्देश्य भारतीय पारंपरिक कला को प्राडा की आधुनिक डिजाइन फिलॉसफी से जोड़ना है. संयुक्त बयान के अनुसार, यह पहल ‘प्राडा मेड इन इंडिया… इंस्पायर्ड बाय कोल्हापुरी चप्पल्स’ के नाम से चलेगी, जिसके तहत सीमित संस्करण वाली सैंडल वैश्विक स्तर पर पेश की जाएंगी. इन सैंडलों में कोल्हापुरी कारीगरी की परंपरागत शैली को प्राडा की आधुनिक सामग्री, तकनीक और डिजाइन नवाचार के साथ जोड़ा जाएगा.

भारतीय कला को मिलेगा अंतरराष्ट्रीय मंच

लिडकॉम और लिडकार दोनों ही संस्थान वर्षों से भारतीय चमड़ा उद्योग और कोल्हापुरी चप्पल निर्माण परंपरा को बढ़ावा देने का कार्य करते रहे हैं. ये संस्थान न केवल कारीगरों को प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराते हैं, बल्कि उनकी कलात्मक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहचान दिलाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. प्राडा की यह साझेदारी कारीगरों के कौशल को और मजबूत करेगी तथा उन्हें वैश्विक लक्ज़री बाजार में सीधा अवसर प्रदान करेगी.

कोल्हापुरी चप्पल को मिला है जीआई टैग

कोल्हापुरी चप्पलों को 2019 में जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग मिला था, जो उनकी विशिष्टता और क्षेत्रीय पहचान की आधिकारिक पुष्टि करता है. इन चप्पलों का निर्माण महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सांगली, सतारा, सोलापुर और कर्नाटक के बेलगावी, बगलकोट, धारवाड़ और बीजापुर के कारीगरों द्वारा किया जाता है. यह हस्तकला सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है और इसकी पहचान उच्च गुणवत्ता, हाथ से तैयार निर्माण और विशिष्ट डिजाइन में निहित है.

विवाद के बाद साझेदारी

जून 2025 में प्राडा की ‘स्प्रिंग/समर 2026’ कलेक्शन में कुछ डिजाइन ऐसे दिखाई दिए थे, जो कोल्हापुरी चप्पलों से अत्यधिक मेल खाते थे. आलोचकों ने इसे सांस्कृतिक पहचान के अनुचित उपयोग और जीआई टैग उल्लंघन के रूप में देखा. हालांकि, प्राडा ने स्वयं को इन आरोपों से अलग बताया और दावा किया कि यह केवल प्रेरित डिजाइन थे. विवाद खत्म करने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्राडा ने भारतीय कारीगरों के साथ औपचारिक साझेदारी का निर्णय लिया.

कारीगरों को मिलेगा प्रशिक्षण

इस पहल के तहत प्राडा, लिडकॉम और लिडकार संयुक्त रूप से प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाएंगे, जिनमें कारीगर पारंपरिक कारीगरी के साथ आधुनिक डिजाइन, ऑर्गेनिक सामग्री के उपयोग और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों की जानकारी हासिल कर सकेंगे. इससे उनकी आय, कौशल और उत्पादन स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है.

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भारत की कारीगरी और लक्जरी का अनोखा संगम

यह साझेदारी न केवल भारतीय हस्तशिल्प को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने वाला एक ऐतिहासिक कदम है, बल्कि यह लक्ज़री फैशन उद्योग में भारत की बढ़ती भूमिका को भी स्थापित करती है. प्राडा के साथ यह सहयोग आने वाले वर्षों में कोल्हापुरी सैंडलों को एक नई पहचान देते हुए भारतीय कारीगरों की विश्वव्यापी सफलता की राह खोल देगा.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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