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9 साल से बंद पड़ी है 73 साल पुरानी झारखंड की ये ग्लास फैक्ट्री, कभी एशिया में बजता था डंका

Updated at : 13 Aug 2025 6:37 PM (IST)
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Independence Day Special

Independence Day Special

Independence Day Special: झारखंड के रामगढ़ जिले के भदानीनगर में स्थित 73 साल पुरानी इंडो असाही ग्लास फैक्ट्री कभी एशिया की शीर्ष ग्लास निर्माता थी, अब पिछले 9 साल से बंद है. 1952 में लाला गुरुशरण लाल भदानी द्वारा स्थापित और बाद में जापानी असाही कंपनी द्वारा अधिग्रहित इस फैक्ट्री ने हजारों लोगों को रोजगार दिया था. प्रतिस्पर्धा, प्रबंधन की गलतियां और गुणवत्ता में गिरावट के कारण इसका पतन हुआ. आज भी स्थानीय लोग इसके दोबारा शुरू होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

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Independence Day Special: देश 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है. 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले के प्राचीर से ध्वजारोहण करने के बाद राष्ट्र को संबोधित करेंगे, जिसमें देश की आर्थिक स्थिति और उद्योग धंधों की भी चर्चा होगी. उनके इस संबोधन से पहले देश-विदेश के अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ आर्थिक स्थिति के मूल्यांकन में जुट गए हैं. देश के विकास में उन कंपनियों की भी चर्चा आम है, जो लाभ कमा रही है. लेकिन, उन कंपनियों और फैक्ट्रियों की चर्चाएं बंद हैं, जो किसी विषम परिस्थिति की वजह से सालों से बंद हैं. हालांकि, देश की उन्नति में उनका अहम योगदान रहा है. ऐसी ही बंद पड़ी फैक्ट्रियों में से एक झारखंड के रामगढ़ जिले के भदानीनगर (भुरकुंडा) की ग्लास फैक्ट्री भी है, जो पिछले 9 सालों से बंद है. एक समय था, जब 73 साल पुरानी इस ग्लास फैक्ट्री की पूरी एशिया में डंका बजता था.

1952 में हुई थी ग्लास फैक्ट्री की स्थापना

झारखंड के रामगढ़ जिले में भदानीनगर का नाम प्रसिद्ध उद्योगपति लाला गुरुशरण लाल भदानी के नाम पर पड़ा. यह कभी एशिया की सबसे उम्दा ग्लास फैक्ट्रियों में से एक का गवाह था. इसकी कहानी समृद्धि, तकनीकी प्रगति, और आर्थिक चुनौतियों का एक अनूठा मिश्रण है. लाला गुरुशरण लाल भदानी एक प्रसिद्ध उद्योगपति और कोयला खनन व्यवसायी थे. उन्होंने वर्ष 1952 में भदानीनगर में एक ग्लास फैक्ट्री की नींव रखी. यह क्षेत्र कोयला और चूना पत्थर की प्रचुरता के लिए जाना जाता था, जो ग्लास यानी शीशा बनाने के लिए आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति में सहायक था. सिलिका सैंड इलाहाबाद से मंगाया जाता था. रेलवे लाइन की निकटता ने माल की ढुलाई को सुगम बनाया. इस फैक्ट्री ने उच्च गुणवत्ता वाले ग्लास का उत्पादन शुरू किया, जिसकी मांग देश-विदेश में बढ़ने लगी. इसकी शुरुआत एक दूरदर्शी सोच के साथ हुई थी, जिसने भदानीनगर को औद्योगिक नक्शे पर एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया.

इंडो असाही का अधिग्रहण और स्वर्णिम युग

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1952 में स्थापित इस फैक्ट्री को पांच साल बाद 1957 में जापान की असाही ग्लास कंपनी ने खरीद लिया और इसका नाम इंडो असाही ग्लास कंपनी लिमिटेड (आईएजी) रखा गया. इस अधिग्रहण ने फैक्ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. जापानी कंपनी ने उन्नत तकनीकों का उपयोग शुरू किया, जिससे ग्लास की गुणवत्ता में और सुधार हुआ. 1987 में एक अत्याधुनिक प्लांट की स्थापना ने इसे एशिया की टॉप ग्लास उत्पादक कंपनियों में शामिल कर दिया. इस दौरान, फैक्ट्री में 1,600 स्थायी और 400 अस्थायी कर्मचारी काम करते थे, जो कुल मिलाकर लगभग 2,000 लोगों को रोजगार प्रदान करते थे. कंपनी के उत्पाद, विशेष रूप से 1.1 मिमी से 5 मिमी मोटाई वाले शीट ग्लास और नौ अद्वितीय डिजाइनों में फिगर्ड ग्लास, सात समंदर पार तक निर्यात किए जाते थे. कर्मचारियों के लिए क्वार्टर, सस्ती कैंटीन (जहां 50 पैसे में भरपेट भोजन मिलता था) और उनके बच्चों को नौकरी की सुविधा ने कंपनी को एक आदर्श नियोक्ता बनाया.

ग्लास फैक्ट्री की चुनौतियां और पतन

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि 21वीं सदी के पहले दशक साल 2000 से पहले ग्लास उद्योग में प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी. त्रिवेणी ग्लास और गुजरात गार्जियन जैसी नई कंपनियों ने सस्ते ग्लास की आपूर्ति शुरू की, जिससे इंडो असाही के महंगे उत्पादों की मांग प्रभावित हुई. लागत कम करने के लिए कंपनी ने कीमतें घटाईं. इसके परिणामस्वरूप उसे भारी नुकसान हुआ. जापानी मालिकों ने घाटे को सहन करने से इनकार कर दिया और 1999 में फैक्ट्री को दिल्ली के शीशा व्यापारी राधेश्याम और लक्ष्मी खेमका को बेच दिया. खेमका बंधुओं ने गुणवत्ता के बजाय मुनाफे पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके कारण निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद बाजार में आए. इससे कंपनी की साख और बिक्री दोनों प्रभावित हुईं. अंततः साल 2004 में फैक्ट्री को बंद कर दिया गया, जिससे 1,300 से अधिक कर्मचारियों का रोजगार छिन गया.

बार-बार खुलना और अंतिम बंदी

रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2004 के बाद फैक्ट्री को दोबारा शुरू करने की कई कोशिशें की गईं. साल 2008 में छत्तीसगढ़ के व्यापारी विजय जोशी ने इसे फिर से शुरू किया, लेकिन यह केवल एक साल तक चली और 2009 में बंद हो गई. यसल 2011, 2012, 2014, और 2015 में भी फैक्ट्री को कुछ समय के लिए खोला गया, लेकिन यह स्थायी रूप से चल नहीं सकी. अक्टूबर 2016 में यह फैक्ट्री अंतिम बार बंद हुई और तब से यह पूरी तरह से ठप है. कर्मचारियों, कच्चे माल के आपूर्तिकर्ताओं और ट्रांसपोर्टरों के बकाया भुगतान को लेकर कोलकाता हाईकोर्ट में मुकदमा भी दायर हुआ, लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला.

रोजगार और सामाजिक प्रभाव

इंडो असाही ग्लास फैक्ट्री ने अपने चरम काल में न केवल 2,000 प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान किए, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को आजीविका दी. इसके बंद होने से भदानीनगर और आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक स्थिरता पर गहरा असर पड़ा. कर्मचारियों के लिए बने क्वार्टर और अन्य सुविधाएं अब खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं. स्थानीय लोग और कर्मचारी आज भी इस फैक्ट्री के दोबारा शुरू होने की उम्मीद कर रहे हैं.

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झारखंड के औद्योगिक गौरव का प्रतीक थी ग्लास फैक्ट्री

भदानीनगर की इंडो असाही ग्लास फैक्ट्री कभी झारखंड के औद्योगिक गौरव का प्रतीक थी. गुरुशरण लाल भदानी की दूरदर्शिता और जापानी तकनीक ने इसे एशिया की शीर्ष ग्लास उत्पादक कंपनी बनाया, लेकिन बढ़ती प्रतिस्पर्धा, प्रबंधन की गलतियां और गुणवत्ता में कमी ने इसके पतन को सुनिश्चित किया. विजय जोशी जैसे उद्योगपतियों ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की, लेकिन आधुनिक तकनीक और बड़े निवेश की कमी ने इसे स्थायी रूप से बंद कर दिया. यह कहानी हमें औद्योगिक विकास में निरंतर नवाचार और गुणवत्ता के महत्व को सिखाती है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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