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सट्टा मटका खेल में जेल, इनकम टैक्स की कार्रवाई अलग से

Updated at : 14 Sep 2024 10:08 AM (IST)
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सट्टा मटका खेल में जेल, इनकम टैक्स की कार्रवाई अलग से

सट्टा मटका या जुला खेलने पर जेल, आयकर विभाग वसूलेगा टैक्स

Satta Matka: सट्टा मटका, सट्टा किंग, लॉटरी, गेम शो या ऑनलाइन गेमिंग में पैसे जीत कर हासिल करने वाली प्राइजमनी पर भी टैक्स देना पड़ता है. सरकार इनसे होने वाली कमाई पर एक निश्चित रकम टैक्स के तौर पर वसूल करती है.

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Satta Matka: सट्टा मटका, सट्टा किंग या किसी भी प्रकार का जुआ खेलने की आदत है और इससे कमाई कर रहे हों, तो सावधान हो जाइए. सट्टा मटका या जुआ खेलने के फेर में सारी हेकड़ी निकल जाएगी. पकड़े जाने पर जेल भी जाना पड़ सकता है और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट टैक्स वसूलने के साथ ही जुर्माना ठोक देगा, वो अलग से. आज भी लोग इस देश में सरकार और कानून की आंख में धूल झोंककर सट्टा पटका और जुआ खेल रहे हैं. सट्टा किंग, सट्टा मटका और कल्याण सट्टा जैसे देश में कई ऐसे सट्टे हैं, जिसमें करोड़ों रुपये का दांव रोजाना लगाया जा रहा है. आलम यह है कि अब तो लोग कानून की परवाह किए बगैर सट्टा खेलने के लिए मोबाइल ऐप तक ईजाद कर दिए हैं.

सबसे अधिक खेला जाता है सट्टा मटका

जब सट्टेबाजों के बीच चर्चा होती है, तो सबसे पहला नाम सट्टा मटका का आता है. इसका इतिहास भी काफी पुराना है. यह एक प्रकार के जुए का खेल है, जो भारत में प्रतिबंधित है. आसान शब्दों में कहें, तो सट्टा मटका एक अवैध जुआ ही है. इसे 1950 के दशक में शुरू किया गया था. उस समय इसे ‘आंकड़ा जुगाड़’ के नाम से भी जाना जाता था. समय बीतने के साथ ही सट्टा मटका खेल जुआरियों और सट्टेबाजों के बीच काफी पॉपुलर हो गया. अब यह उस खेल से बिल्कुल अलग है जो पहले हुआ करता था. फिर भी इसका नाम अब भी ‘सट्टा मटका’ ही है.

सट्टा मटका में जीतने वाला सट्टा किंग

आज के जमाने में सट्टे का खेल डिजिट पर आधारित है. इस खेल में संख्या का चयन किया जाता है. पुराने जमाने में 0 से 9 तक की संख्या वाली चिट को मटके में डालते थे और एक चिट को मटके से उठाकर उस पर लिखे नंबर यानी जीतने वाले नंबर की घोषणा करते थे. अब यह खेल ताश के पत्तों से खेला जाता है. ताश के एक पैकेट में से 3 अंक चुने जाते हैं. सट्टा मटका जीतने वाले को ‘मटका किंग’ या सट्टा किंग कहा जाता है.

सट्टा मटका खेलने पर जेल

भारत में सट्टे का खेल और जुआ शुरू से ही अवैध है. ब्रिटिश सरकार की ओर से 1867 में पेश किए गए सार्वजनिक जुआ अधिनियम के तहत सट्टा मटका या सट्टा किंग खेलते समय पकड़े जाने पर जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. 1867 में बने सार्वजनिक गेमिंग अधिनियम के तहत सट्टा खेलने वालों को 200 रुपये तक का जुर्माना या 3 महीने तक के कारावास का प्रावधान है.

सट्टा मटका में 3 साल की सजा के 10 लाख का जुर्माना

मध्य प्रदेश की सरकार ने सट्टे के खेल के खिलाफ साल 2023 में सार्वजनिक द्रुत अधिनियम 2023 लागू कर दिया है. सरकार के इस कानून के तहत ऑनलाइन जुआ, सट्टा या गेम खेलने पर तीन साल की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है. विशेष परिस्थिति में सट्टेबाजों पर दोनों प्रकार के दंड से दंडित किया जा सकता है. बार-बार अपराध करने पर दंड में वृद्धि होगी.

प्राइजमनी पर टैक्स चुकाना जरूरी

सट्टा मटका, सट्टा किंग, लॉटरी, गेम शो या ऑनलाइन गेमिंग में पैसे जीत कर हासिल करने वाली प्राइजमनी पर भी टैक्स देना पड़ता है. सरकार इनसे होने वाली कमाई पर एक निश्चित रकम टैक्स के तौर पर वसूल करती है. नियमों के अनुसार, देश में होनेवाली लगभग हर तरह की आमदनी या इनकम टैक्स के दायरे में आती है और सरकार उस पर एक निर्धारित रकम टैक्स के रूप में वसूलती है.

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सट्टा मटका या जुए से कमाई पर 4 फीसदी टैक्स

लॉटरी या किसी गेम में कोई रकम या पुरस्कार जीतने पर इनकम टैक्स एक्ट 1961 का सेक्शन 194बी लागू होता है. इसके अनुसार, किसी प्रतियोगिता में जीती गई राशि अगर 10 हजार रुपये से ज्यादा है, तो इसपर पहले टीडीएस कटेगा और इससे बची प्राइजमनी जीतनेवाले को मिलेगी. लॉटरी या प्रतियोगिता में जीती गई रकम या वस्तु की कीमत 10 हजार रुपये से अधिक होने की स्थिति में उस पर 30 प्रतिशत टैक्स कटता है. इसके अलावा, इसपर 4 प्रतिशत का सरचार्ज भी कटता है. यह कटौती किसी भी हाल में रिफंडेबल नहीं है. आयकर की धारा 194 बी और 194 बीबी में यह बात बतायी गई है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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