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एयर इंडिया के टाटा से जाने और वापस लौटने की पूरी कहानी

टाटा समूह के अधिकारी यह शिकायत करते रहते थे कि जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जेआरडी) को टाटा समूह की तुलना में एयर इंडिया की चिंता अधिक रहती थी. हालांकि एयर इंडिया के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व उनके लिए केवल नौकरी नहीं थी, बल्कि यह लगाव का विषय था.

By Prabhat khabar Digital
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tata air india deal
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देर आए दुरुस्त आए. यह उक्ति टाटा समूह के लिए बिल्कुल फिट बैठती है क्योंकि लंबे अर्सें बाद टाटा एयर इंडिया को फिर से अपने पाले में ले आया. एयर इंडिया के निजीकरण में दो दशक से अधिक का समय लग गया हो, लेकिन आखिरकार अंतिम बोली टाटा सन्स ने ही जीती. निजीकरण करने के लिए पहला कदम उठाये जाने के बाद से अब तक टाटा समूह का एयर इंडिया के साथ लगाव कभी कम नहीं हुआ.

ऐसा कहा जाता है कि टाटा समूह के अधिकारी यह शिकायत करते रहते थे कि जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जेआरडी) को टाटा समूह की तुलना में एयर इंडिया की चिंता अधिक रहती थी. हालांकि एयर इंडिया के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व उनके लिए केवल नौकरी नहीं थी, बल्कि यह लगाव का विषय था.

*15 अक्तूबर 1932 को जेआरडी ने पहली बार उड़ाया था विमान

*1933 पहला व्यावसायिक साल था टाटा एयरलाइंस का

*1924 में टाटा स्टील ने खरीदा था अपना विमान

*सिर्फ दो हवाई जहाज से शुरू हुई थी कंपनी

मुंबई के एक कच्चे मकान में ऑफिस शुरू हुई थी. जब भी बरसात होती या मानसून आता, तो मैदान में पानी भर जाता था. उस वक्त टाटा एयरलाइंस के पास दो छोटे सिंगल इंजन वाले हवाई जहाज, दो पायलट और तीन मैकेनिक हुआ करते थे. पानी भर जाने की सूरत में जेआरडी टाटा अपने हवाई जहाज पुणे से संचालित करते थे.

पहली उड़ान में 25 किलो थीं चिट्ठियां

जेआरडी टाटा की पहली उड़ान में सवारियों की जगह 25 किलो चिट्ठियां थीं, जो लंदन से ‘इम्पीरियल एयरवेज’ द्वारा कराची लायी गयी थी. इम्पीरियल एयरवेज ब्रिटेन का राजसी विमान वाहक हुआ करता था.

चार आने मिलते थे हर चिट्ठी पर

टाटा एयरलाइंस को हर चिट्ठी पर चार आने मिलती थी. टाटा एयरलाइंस ने नियमित रूप से डाक लाने ले-जाने का सिलसिला शुरू हुआ. उस दौरान भारत में तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने टाटा एयरलाइंस को कोई आर्थिक मदद नहीं की. हर चिट्ठी पर किराये के तौर पर चार आने दिया. उसके लिए भी डाक टिकट चिपकाना था.

फ्लाइंग नहीं करते, तो मोटर कार रेसिंग में जरूर हिस्सा लेते

जेआरडी टाटा ने 1927 में फ्रांस से बुगाती (कार) मंगायी थी. ड्राइवर भी उन्होंने विदेश से बुलाया था. जेआरडी टाटा कारों के शौकीन थे. स्कूली जीवन में ही वे अपने लिए बुगाती (कार) खरीदना चाहते थे. पिता जमशेदजी टाटा ने 1927 में जेआरडी के लिए फ्रांस से बुगाती (कार) मांगायी. तब इस कार में न मडगार्ड था, न छत. गुलाम भारत में कार लाने वाले पहले इंडियन थे. फ्रांस से कार मंगवाने के साथ ड्राइवर भी बुलाया था. उस वक्त इंडिया में ऐसी महंगी कार चलाना ठीक से कोई नहीं जानता था. इसलिए विदेश से ड्राइवर भी बुलाया गया था.

15 की उम्र में उड़ाया था हवाई जहाज

जेआरडी टाटा ने महज 15 साल की उम्र में शौकिया तौर साल 1919 में हवाई जहाज उड़ाया था. बाद में जेआरडी टाटा ने हवाई जहाज उड़ाने के लिए पायलट का लाइसेंस लिया. लेकिन, पहली व्यावसायिक उड़ान उन्होंने 15 अक्तूबर को भरी, जब वे सिंगल इंजन वाले ‘हैवीलैंड पुस मोथ’ हवाई जहाज को अहमदाबाद से होते हुए कराची से मुंबई ले गये थे.

15 साल की उम्र में जेआरडी ने पायलट बनने का फैसला किया, लेकिन उन्हें नौ साल तक अपने सपने को पूरा करने के लिए इंतजार करना पड़ा. बंबई में जब पहला फ्लाइंग क्लब खुला, तो वह 24 साल के हो चुके थे. जेआरडी टाटा फ्लाइंग लाइसेंस पाने वाले पहले भारतीय थे. पहली व्यावसायिक उड़ान उन्होंने 15 अक्तूबर 1932 को भरी. इस तरह भारत की पहली एयरलाइंस बनने की शुरुआत हुई.

1953 में राष्ट्रीयकरण का किया था विरोध

जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने जब 1953 में एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया, तो जेआरडी ने इसके खिलाफ जोरदार लड़ाई लड़ी. 11 एयरलाइनों का राष्ट्रीयकरण करने का फैसला हुआ था.

25 साल तक एयर इंडिया के अध्यक्ष रहे

एयर इंडिया के राष्ट्रीयकरण के बाद, विमानन क्षेत्र के साथ समूह का जुड़ाव जेआरडी के माध्यम से ही था, जिन्होंने 25 वर्षों तक प्रमुख सरकारी एयरलाइन के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया.जब चेयरमैन पद से हटाये गये थे.तब जेआरडी ने कहा था- मैं खुद को ऐसे व्यक्ति की तरह महसूस कर रहा हूं, जिसका पसंदीदा बच्चा छिन गया.

वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने जेआरडी टाटा को एयर इंडिया के चेयरमैन पद से हटा दिया गया. उनकी जगह पीसी लाल को एयर इंडिया की कमान सौंपी गयी थी. मजदूर यूनियन ने इस पर अपनी नाराज़गी जाहिर की थी. एयर इंडिया के चेयरमैन पद से हटाने से जेआरडी काफी दुखी हुए थे. टाटा स्टील के पूर्व एमडी डॉ जेजे ईरानी बताते हैं कि तब उन्होंने कहा था- मैं अपने आप को एक ऐसे व्यक्ति की तरह महसूस कर रहा हूं, जिसका पसंदीदा बच्चा छीन लिया गया है.’

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