''राजनीतिक नौटंकी है किसानों को 6000 रुपये देने का प्रस्ताव आैर राहुल गांधी की न्यूनतम आय गारंटी की घोषणा''

Updated at : 05 Feb 2019 6:29 PM (IST)
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''राजनीतिक नौटंकी है किसानों को 6000 रुपये देने का प्रस्ताव आैर राहुल गांधी की न्यूनतम आय गारंटी की घोषणा''

वाशिंगटन : अमेरिकी थिंक टैंक के एक विशेषज्ञ ने अंतरिम बजट में भू-स्वामित्व के आधार पर किसानों को सालाना 6,000 रुपये प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ देने के प्रस्ताव आैर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आेर से किसानों को न्यूनतम आमदनी गारंटी की घोषणा को राजनीतिक नौटंकी करार दिया है. विशेषज्ञ ने कहा कि किसानों को लाभ […]

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वाशिंगटन : अमेरिकी थिंक टैंक के एक विशेषज्ञ ने अंतरिम बजट में भू-स्वामित्व के आधार पर किसानों को सालाना 6,000 रुपये प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ देने के प्रस्ताव आैर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आेर से किसानों को न्यूनतम आमदनी गारंटी की घोषणा को राजनीतिक नौटंकी करार दिया है. विशेषज्ञ ने कहा कि किसानों को लाभ देने के लिए भू-स्वामित्व को आधार बनाने से भारत में ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से को लाभ मिलने की संभावना नहीं है और यह वास्तविक समस्या को हल नहीं करेगा, बल्कि राजकोषीय बोझ बढ़ायेगा.

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सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट थिंक-टैंक के एक पॉलिसी नीतिगत मामलों के फेलो अनित मुखर्जी ने भारत के करीब 12 करोड़ लघु एवं सीमांत किसानों को 6,000 रुपये प्रति साल का प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ प्रदान करने के लिए सरकार के बजटीय प्रस्ताव पर पूछे गये सवालों और विपक्षी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा न्यूनतम आय गारंटी देने की घोषणा के बारे में पूछे जाने पर इन पहलकदमियों को चुनाव से पहले की राजनीतिक नौटंकी बताया.

उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया कि कुछ सबूत हैं कि भू-स्वामित्व के आधार पर लाभ देने के लिए किसानों का चुनाव करने से ग्रामीण आबादी के एक बड़े हिस्से को लाभ नहीं होगा. यदि सरकार पहले से ही बेहतर जीवन बिता रहे किसानों का पक्ष लेती दिखाई देती है, तो यह राजनीतिक रूप से उल्टा भी पड़ सकता है. प्रशासन के मुद्दों, लोक वित्त और विकासशील देशों में सेवाएं पहुंचाने के मामले में अपने काम के लिये जाने जाने वाले मुखर्जी ने राहुल गांधी की न्यूनतम आय गारंटी और सरकार की सर्वजनीन आय समर्थन योजनाओं को भ्रामक बताया.

उन्होंने कहा कि इन दोनों मामलों में शहरी गरीब को एकदम भुला दिया गया है. शहरी गरीबों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन राजनीतिक दल उन्हें प्रभावी वोट बैंक की तरह नहीं देखते हैं. इसलिए इन योजनाओं का आर्थिक आधार बहुत कम है.

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