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''फंसे कर्ज में गिरावट से बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, सितंबर 2018 से नकदी संकट बरकरार''

Updated at : 04 Jul 2019 5:28 PM (IST)
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''फंसे कर्ज में गिरावट से बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, सितंबर 2018 से नकदी संकट बरकरार''

नयी दिल्ली : गुरुवार को संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश की गयी आर्थिक समीक्षा में इस बात का दावा किया गया है कि फंसे कर्ज में गिरावट की वजह से 2018-19 में बैंकिंग क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार आया है. हालांकि, पूंजी बाजार से जुटायी गयी पूंजी में गिरावट और गैर-बैंकिंग वित्तीय […]

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नयी दिल्ली : गुरुवार को संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश की गयी आर्थिक समीक्षा में इस बात का दावा किया गया है कि फंसे कर्ज में गिरावट की वजह से 2018-19 में बैंकिंग क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार आया है. हालांकि, पूंजी बाजार से जुटायी गयी पूंजी में गिरावट और गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र के संकट के कारण पूंजी प्रवाह में रुकावट आयी है.

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आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि पिछले वर्ष के बाद मौद्रिक नीति की दिशा में बदलाव देखने को मिला. नीतिगत दर (रिजर्व बैंक की रपो दर) में पिछले साल 0.5 फीसदी की वृद्धि की गयी थी और बाद में मुद्रास्फीति में नरमी, अर्थव्यवस्था में सुस्ती और वैश्विक मौद्रिक परिदृश्य में नरमी की वजह से इस साल तीन बार की समीक्षा में कुल मिलाकर 0.75 फीसदी की कटौती की गयी है.

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सीतारमण ने कहा कि गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) अनुपात में कमी और बैंक की ओर से कर्ज देने में तेजी से बैंकिंग प्रणाली के प्रदर्शन में सुधार हुआ है. हालांकि, पूंजी बाजार से जुटायी गयी राशि में कमी और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के संकट ने अर्थव्यवस्था में पूंजी प्रवाह में रुकावट खड़ी की. उन्होंने कहा कि दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता के लिए तंत्र व्यवस्थित रूप से तैयार हो रहा है. इस व्यवस्था से बैंकों के फंसे कर्ज की वसूली में तेजी आयी है और कारोबारी संस्कृति में सुधार हुआ है. हालांकि, सितंबर, 2018 के बाद नकदी की स्थिति तंग बनी हुई है.

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आर्थिक समीक्षा में नकदी की स्थिति (तरलता) के विषय में कहा गया है कि 2018-19 के अंतिम दो तिमाहियों तथा 2019-20 की पहली तिमाही में औसत नकदी स्थिति तंगी की ओर बढ़ी है. वित्त मंत्री ने कहा कि 2018-19 में बैंकिंग क्षेत्र विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रदर्शन में सुधार हुआ. सरकारी बैंकों का सकल एनपीए अनुपात मार्च से दिसंबर, 2018 के बीच 11.5 फीसदी से घटकर 10.1 फीसदी पर आ गया.

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