झारखंड के केदला जंगल में शेर ! आधा दर्जन मवेशियों की मौत से दहशत, डर से जंगल नहीं जा रहे ग्रामीण
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Feb 2022 3:16 PM
Jharkhand News: चार दशक बाद यहां के जंगलों में शेर दिखने की बात सामने आने के बाद ग्रामीण दहशत में हैं. दहशत का आलम यह है कि लोग दिन में भी जंगल की ओर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं और न अपने मवेशियों को चरने के लिए जंगल में भेज रहे हैं.
Jharkhand News: झारखंड के बोकारो जिले के कसमार प्रखंड के हिसीम पहाड़ पर बसे गांवों हिसीम, केदला, त्रियोनाला व गुमनजारा के ग्रामीण पिछले 10 दिनों से हिंसक पशुओं द्वारा आधा दर्जन से अधिक मवेशियों व बकरियों को मारने व घायल करने से भयभीत हैं. हालांकि ग्रामीण जंगली शेर के द्वारा मवेशियों को मारे जाने की बात कह रहे हैं. लगभग चार दशक बाद यहां के जंगलों में शेर दिखने की बात सामने आने के बाद ग्रामीण दहशत में हैं. दहशत का आलम यह है कि लोग दिन में भी जंगल की ओर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं और न अपने मवेशियों को चरने के लिए जंगल में भेज रहे हैं.
पिछले दस दिनों के दौरान अलग-अलग घटनाओं में करीब आधा दर्जन मवेशियों पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतारा जा चुका है. प्रायः सभी घटनाएं जंगल में हुई हैं. हमला शेर के द्वारा ही हो रहा, ग्रामीणों के इस दावे की सत्यता को जानने के उद्देश्य से प्रभात खबर संवाददाता घटनास्थल पर पहुंचे, जो केदला गांव से करीब साढ़े पांच किमी दूर घने जंगलों के बीच अवस्थित है. घटनास्थल पर जाने से अधिकतर ग्रामीण घबराए. हमारा साथ दिया केदला के युवा समाजसेवी जगेश्वर हेंब्रम, मनोज हेंब्रम, श्रीकांत सोरेन एवं भूपेंद्र हेंब्रम ने. घटनास्थल तक चार पहिया वाहन से जाना संभवः नहीं था. घने जंगल के दुर्गम रास्तों पर युवाओं के साथ कुछ दूर बाइक और फिर पैदल चलकर घटनास्थल पहुंचना संभव हुआ. युवाओं ने प्रमाण के तौर पर घटनास्थल पर बिखरे कथित शेर के बाल दिखाए.
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बताया कि घटनास्थल केदला और पेटरवार के रुकाम जंगल के बीचोबीच अवस्थित है. यहां केदला के हड़साली निवासी कांदु मांझी के बैल पर बीते रविवार को हमला कर उसकी जान ले ली थी. पीड़ित श्री मांझी के अनुसार, दो दिन तक घर नहीं लौटने पर जब बैल की खोजबीन की गई तो उसे यहां मृत पाया गया. उसके अधिकतर हिस्से को शेर खा चुका था. रुकाम गांव के कुछ ग्रामीणों ने शेर के हमले में बैल के मारे जाने की बात बतायी. उसके बाद घटनास्थल पर बिखरे बालों से भी शेर द्वारा हमले की की बात पर बल मिला है.
कांदु मांझी के अलावा पिछले एक सप्ताह के दौरान त्रियोनाला निवासी महेश्वर किस्कू की गाय तथा त्रियोनाला के सीमावर्ती गांव गोला प्रखंड के खखड़ा निवासी एक ग्रामीण के एक मवेशी भी हमले में मारा जा चुका है, जबकि शनिवार को अपराह्न करीब चार बजे हिसीम गांव से सटे जंगल (हेंठजारा) में गोंठ पर हमला हुआ. इस दौरान हिसीम निवासी रंजू देवी (पति जिबु महतो) के खस्सी और चरकु महतो के बछड़ा को मार कर खा गया. अन्य ग्रामीणों के बैल-बकरा भी थे, जो हमला के बाद इधर-उधर भाग खड़े हुए. बताया गया कि एक सप्ताह पहले पेटरवार के चरगी पंचायत स्थित दांदूबांध में भी गोंठ पर हमला हुआ था, पर उसमें कोई क्षति नहीं हुई थी. मालूम हो कि हिसीम केदला की पहाड़ी से श्रृंखला गोमिया के झुमरा पहाड़ और उससे आगे हजारीबाग की पहाड़ियों से लेकर बंगाल के अयोध्या पहाड़ से जुड़ी हुई है. संभावना जताई जा रही है कि उसी पहाड़ी श्रृंखला से किसी जंगल से यह शेर हिसीम केदला के जंगल में आया होगा.
केदला के वयोवृद्ध समाजसेवी देवशरण हेंब्रम के अनुसार, हिसीम-केदला का जंगल शेरों का बसेरा रहा है, लेकिन यह पांच दशक पुरानी बात है. वे बताते हैं कि संताली भाषा में शेर को तारुव कहते हैं. नकेदला के निकट तारुव डूंगरी नामक एक पहाड़ी है, जो शेरों का मुख्य ठिकाना हुआ करता था. कम से कम दो-तीन शेर उस डूंगरी में हमेशा रहते थे और आसपास के गांवों-जंगलों में विचरण करते थे. श्री हेंब्रम के अनुसार, डूंगरी से जब शेर दहाड़ता था, तो उसकी आवाज गांव तक आती थी. डूंगरी झींक (शाही) का भी बसेरा रहा है. आज भी यहां काफी संख्या में शाही मौजूद है. यहां काफी लंबी गुफा भी है. केदला निवासी झामुमो नेता दिलीप हेंब्रम ने कहा कि इतनी लंबी अवधि के बाद पुनः इस जंगल में शेर कैसे और कहां से आया, फिलहाल यह ग्रामीणों की समझ से परे है. इस पर विभाग को जांच करने तथा उसके संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों की सुरक्षा की दिशा में अविलंब कदम उठाने की जरूरत है.
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प्राचीन काल में हिसीम-केदला के जंगल में बाघ और शेर हुआ करते थे, इसके और भी कई प्रमाण मिलते हैं. ग्रामीणों के अनुसार, करीब 100 साल पहले हिसीम-केदला में शिकार उत्सव की परंपरा थी. बाद के दिनों में उसमें क्षेत्र के कतिपय राजाओं एवं जमींदारों का हस्तक्षेप बढ़ने लगा. वे नाया (पुजारी) की अवहेलना कर शिकार में शामिल होने लगे थे. इससे नाया, जो कसमार प्रखंड के बगदा गांव के निवासी थे, ने रुष्ट होकर वन देवी की पूजा करनी छोड़ दी. आदिवासियों में ऐसी मान्यता है कि जिस जंगल में वन देवी की पूजा नहीं होती, वह जंगल ‘बाघाही’ हो जाता है यानी उसमें बाघ का आतंक बढ़ जाता है और वह हिंसक होकर लोगों को अपना शिकार बना लेता है. केदला श्री हेंब्रम के अनुसार, हिसीम-केदला में नाया के रुष्ट होकर वन देवी की पूजा छोड़ देने के परिणामतः यहां का जंगल भी उस समय ‘बाघाही’ हो गया था. कई ग्रामीण बाघ व शेर के हमले में मारे गए थे. बाद में ग्रामीणों के मान-मनोव्वल पर नाया ने वन देवी की पूजा की, तब जाकर सब-कुछ सामान्य तो हुआ, लेकिन शिकार की परंपरा जो बंद हुई, वह फिर दोबारा चालू नहीं हो सकी. यही कारण है कि हिसीम-केदला के आदिवासी शिकार उत्सव में शामिल होने के लिए बंगाल के अयोध्या पहाड़ जाने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं क्योंकि इस परंपरा को छोड़ देने के कारण उन्हें वहां आक्रोश एवं अपमान का सामना करना पड़ता है.
मालूम हो कि भारत में शेरों के कम होते आंकड़ों को लेकर कई संस्थाएं काम कर रही हैं. साल 2020 के आंकड़ों के मुताबिक देश में फिलहाल शेरों की कुल संख्या 674 हैं, जो साल 2015 में 523 थी. मतलब कि हाल के वर्षों में आंकड़ों में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है. इसी का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय पशु के संरक्षण में देश की सफलता की सराहना भी कर चुके हैं.
पेटरवार वन प्रक्षेत्र के रेंजर अरुण कुमार ने बताया कि हिसीम-केदला के जंगल में शेर आने या हमला करने की कोई सूचना अभी तक ग्रामीणों के द्वारा नहीं मिली है. अगर यह सच है तो वाकई चौंकाने वाली बात है. वन विभाग मामले को संज्ञान में लेगा तथा शेर के संरक्षण व ग्रामीणों की सुरक्षा की दिशा में जल्द कदम उठाएगा. हाल में वहां के जंगल काफी घने हुए हैं. संभव है कि कहीं से शेर आया होगा. पर कहां से और कैसे आया, इसकी भी पड़ताल की जाएगी.
ग्राउंड रिपोर्ट: दीपक सवाल
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