Reels Shorts Tiktok : रियल लाइफ पर असर डाल रहा रील का शौक, ऐसे पाएं इस नशे से छुटकारा

Published by : Rajeev Kumar Updated At : 10 Aug 2023 6:36 PM

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Brain Rot: मीम्स और रील्स देखने की लत बना रही ब्रेन रॉट का शिकार

How to Get Rid of Reels Shorts Tiktok Addiction - साइंस डायरेक्ट मैगजीन ने एक आलेख प्रकाशित कर रील्स से युवाओं पर मनोवैज्ञानिक असर के बारे में बताया है. वहीं, हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू ने स्क्रॉलिंग एडिक्शन पर अध्ययन रिपोर्ट जारी की है. दोनों में रील्स से नकारात्मक मानसिकता विकसित होने का जिक्र है.

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How to Get Rid of Reels Shorts Tiktok Addiction – इंस्टाग्राम के रील्स और यूट्यूब के शॉर्ट्स ने इन दिनों लोगों को दीवाना बना रखा है. जहां कई लोग अपने फोन में इन्हें देखने में अपना अच्छा-खासा समय जाया कर दे रहे हैं, वहीं इन शॉर्ट वीडियोज को बनानेवालों की भी कोई कमी नहीं है. हाल ही में कई मनोवैज्ञानिकों ने रील्स बनाने के शौक पर अध्ययन किया है. साइंस डायरेक्ट मैगजीन ने इससे संबंधित एक आलेख हाल ही में प्रकाशित किया है. इसमें रील्स बनाने को लेकर युवाओं पर पड़नेवाले मनोवैज्ञानिक असर का अध्ययन किया गया है. वहीं, हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू ने स्क्रॉलिंग एडिक्शन पर अध्ययन रिपोर्ट जारी की है. दोनों में रील्स के बहुत अधिक देखने या बनाने से नकारात्मक मानसिकता विकसित होने का जिक्र किया गया है. अध्ययन में बताया गया है कि इंस्टाग्राम रील्स देखनेवाले लोग भारत में सबसे अधिक हैं.

रील्स पर कर रहे समय की बर्बादी

रील्स को लेकर किया गया अध्ययन बताता है कि रील्स देखने के चलते लोग समय का दुरुपयोग कर रहे हैं. इसके फेर में घंटों वक्त निकल जाता है और लोगों को पता ही नहीं चलता. इससे उनके काम पर असर पड़ रहा है. लोगों में डिप्रेशन यानी अवसाद की समस्या देखने के लिए मिल रही है. लोग कई बार रील्स देखकर खुद में खामी ढूंढ़ने लगते हैं. खुद की सामनेवाले से तुलना करने लगते हैं. सामने वाले जैसा बनने की कोशिश करने लगते हैं. इसके अलावा लोग खुद भी रील्स बनाना चाहते हैं. जब उनका रील्स वायरल नहीं होता या व्यूज नहीं मिलता है, तो उन्हें गुस्सा और चिड़चिड़ापन महसूस होने लगता है. यह धीरे-धीरे डिप्रेशन में बदल जाता है.

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टिकटॉक के बाद आये हैं रील्स और शॉर्ट्स

रील्स एक तरह का इंस्टाग्राम पर शॉर्ट वीडियो होता है. शुरुआत में यह रील्स 30 सेकेंड का हुआ करता था, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 90 सेकेंड कर दिया गया है. रील्स ऑर शॉर्ट्स का चलन तब से शुरू हुआ, जब भारत में टिकटॉक बंद हुआ. इसके बंद होते ही इंस्टाग्राम पर लोग वीडियो डालने लगे. रील्स में कई तरह के वीडियोज होते हैं, जैसे- इंफॉर्मेशनल, फनी, मोटिवेशनल, डांस आदि.

क्रिएटिविटी भी जगाता है रील्स

रील्स क्रिएटिविटी से भरे होते हैं, जो लोगों को देखने के लिए बार बार प्रेरित करती है. यह नयी-नयी सोच को भी जन्म देता है. अब क्रिएटिव सेक्टर के कई बड़े-बड़े कलाकार भी रील्स और मीम्स बनाने लगे हैं.

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बच्चों की पढ़ाई भी होती है प्रभावित

रील्स के एडिक्शन के चलते बच्चे पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पाते हैं. देर रात रील्स देखने के चक्कर में स्लीपिंग पैटर्न डिस्टर्ब हो जाता है. नींद नहीं पूरी होने से तनाव होने लगता है. आंखें कमजोर होने लगती हैं. फिजिकल एक्टिविटी कम होने से बच्चे मोटापे का शिकार हो जाते हैं.

रील्स के एडिक्शन से ऐसे पायें छुटकारा

रील्स देखने में जो समय बिता रहे हैं, वह दोस्तों के साथ गुजारें

फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाएं

लगातार रील्स देखने के कारण बच्चे वर्चुअल ऑटिजम के शिकार हो रहे हैं. इससे लर्निंग क्षमता कम होने और बोलना देर से शुरू करने जैसी समस्या हो रही है.

बच्चे को चश्मा लगा है, तो उसके लेंस को मियोस्मार्ट लेंस में बदलवा दें. इस चश्मे के लेंस का नंबर या तो वहीं रुक जाता है या नंबर बढ़ने की स्पीड कम हो जाती है.

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रील्स के नशे पर मनोवैज्ञानिकों की क्या राय है?

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि रील्स भी सोशल मीडिया एडिक्शन का ही एक हिस्सा है. यह 15 से 35 साल तक के युवाओं में ज्यादा होता है. ऐसे लोग रील्स के फॉलोअर्स को ही अपना दोस्त मानने लगते हैं. वर्चुअल दोस्त को ही असली मानने लगते हैं. उनके कमेंट्स को ही दिल से ले लेते हैं. इस कारण कभी-कभी डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं. यह एक प्रकार की लत है और इससे बचने की जरूरत है. वर्चुअल दुनिया आपको शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से बीमार कर रही है. इससे बचने के कई उपाय हैं. इस पर ध्यान देना चाहिए.

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लेखक के बारे में

By Rajeev Kumar

राजीव कुमार हिंदी डिजिटल मीडिया के अनुभवी पत्रकार हैं और वर्तमान में प्रभातखबर.कॉम में सीनियर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. 15 वर्षों से अधिक के पत्रकारिता अनुभव के दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर की हजारों खबरों, एक्सप्लेनर, एनालिसिस और फीचर स्टोरीज पर काम किया है. सरल भाषा, गहरी रिसर्च और यूजर-फर्स्ट अप्रोच उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी पहचान है. राजीव की विशेषज्ञता स्मार्टफोन, गैजेट्स, एआई, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), साइबर सिक्योरिटी, टेलीकॉम, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, ICE और हाइब्रिड कारों, ऑटोनोमस ड्राइविंग तथा डिजिटल ट्रेंड्स जैसे विषयों में रही है. वे लगातार बदलती टेक और ऑटो इंडस्ट्री पर नजर रखते हैं और रिपोर्ट्स, आधिकारिक डेटा, कंपनी अपडेट्स तथा एक्सपर्ट इनसाइट्स के आधार पर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाते हैं. डिजिटल मीडिया में राजीव की खास पहचान SEO-ऑप्टिमाइज्ड और डेटा-ड्रिवेन कंटेंट के लिए भी रही है. गूगल डिस्कवर और यूजर एंगेजमेंट को ध्यान में रखते हुए वे ऐसे आर्टिकल्स तैयार करते हैं, जो न केवल जानकारीपूर्ण होते हैं, बल्कि पाठकों की जरूरत और सर्च ट्रेंड्स से भी मेल खाते हैं. टेक और ऑटो सेक्टर पर उनके रिव्यू, एक्सपर्ट इंटरव्यू, तुलना आधारित लेख और एक्सप्लेनर स्टोरीज को पाठकों द्वारा काफी पसंद किया जाता है. राजीव ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2011 में प्रभात खबर दैनिक से की थी. शुरुआती दौर में उन्होंने देश-विदेश, कारोबार, संपादकीय, साहित्य, मनोरंजन और फीचर लेखन जैसे विभिन्न बीट्स पर काम किया. इसके बाद डिजिटल प्लैटफॉर्म पर उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग, वैल्यू-ऐडेड स्टोरीज और ट्रेंड आधारित कंटेंट के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई. जमशेदपुर में जन्मे राजीव ने प्रारंभिक शिक्षा सीबीएसई स्कूल से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने रांची यूनिवर्सिटी से बॉटनी ऑनर्स और भारतीय विद्या भवन, पुणे से हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया. पत्रकारिता के मूल सिद्धांत 5Ws+1H पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें खबरों की गहराई समझने और उन्हें आसान, स्पष्ट और प्रभावी भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में मदद करती है. राजीव की सबसे बड़ी पहचान है, क्रेडिब्लिटी, क्लैरिटी और ऑडियंस-फर्स्ट अप्रोच. वे सिर्फ टेक ऐंड ऑटो को कवर नहीं करते, बल्कि उसे ऐसे पेश करते हैं कि हर व्यक्ति उसे समझ सके, उससे जुड़ सके और उससे फायदा उठा सके. जुड़िए rajeev.kumar@prabhatkhabar.in पर

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