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बेअसर होते अमेरिकी प्रतिबंध

Updated at : 27 Jul 2022 9:06 AM (IST)
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बेअसर होते अमेरिकी प्रतिबंध

अमेरिका और यूरोप के देशों ने रूस को अपनी भुगतान प्रणाली ‘स्विफ्ट’ से प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन रूस की रणनीति ने अमेरिका की अपेक्षाओं पर पानी फेर दिया. आज अमेरिका और यूरोपीय देश भारी आर्थिक संकट में घिरते दिख रहे हैं.

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रूस-यूक्रेन युद्ध का दुष्परिणाम आज पूरी दुनिया भुगत रही है. युद्ध से उपजी वैश्विक आर्थिक समस्याओं से निजात निकट भविष्य में नहीं दिखता. तेल की बढ़ती कीमतें, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, खाद्यान्न की कमी, आर्थिक विकास में गिरावट और बढ़ती कीमतों ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है. अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाये गये. उनका मानना था कि इससे रूसी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जायेगी, लेकिन रूसी अर्थव्यवस्था तो ध्वस्त नहीं हुई, बल्कि प्रतिबंधों का खासा असर पश्चिम के देशों पर जरूर देखने को मिल रहा है. दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति में रूस का दबदबा है. अमेरिका और यूरोप के देशों ने रूस को अपनी भुगतान प्रणाली ‘स्विफ्ट’ से प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन रूस की रणनीति ने अमेरिका की अपेक्षाओं पर पानी फेर दिया. आज अमेरिका और यूरोपीय देश भारी आर्थिक संकट में घिरते दिख रहे हैं.

एक तरफ रूस ने अपने तेल की आपूर्ति भारत को सस्ते दामों पर और रुपये में करना शुरू कर दिया और भारत ने रुस से तेल आयात 50 गुना बढ़ा दिया. दूसरी तरफ उसे यूरोपीय देशों से तेल भुगतानों में कोई बाधा नहीं आयी. यूरोपीय देश रूस से सस्ते तेल पर निर्भर हो रहे थे, उन्होंने स्वयं के प्रतिबंधों को ही दरकिनार करते हुए रूस से तेल खरीदना जारी रखा. इससे रूस पर प्रतिबंधों का न्यूनतम असर हुआ. वहीं, रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने इन मुल्कों को तेल की आपूर्ति कम करने का निर्णय ले लिया. रूस की रणनीति के चलते जर्मनी भी तेल की कमी की चपेट में आ गया. इससे जर्मनी में बिजली उत्पादन पर असर पड़ा है. यूरोप के अन्य देश भी आज गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति की बाधाओं के चलते संकट में हैं. जर्मनी की सरकार कह रही है कि यह यूरोप पर रूसी राष्ट्रपति पुतिन का आर्थिक आक्रमण है. पुतिन की यह रणनीति है कि यूरोप में कीमतें बढ़ाई जाएं, ऊर्जा असुरक्षा हो और यूरोप के देशों में फूट पड़े.

आज जब अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा रूस के खिलाफ यूक्रेन को आर्थिक और सुरक्षा मदद दी जा रही है और संयुक्त रूप से उनके द्वारा आर्थिक प्रतिबंधों को अंजाम दिया जा रहा है. ऐसे में रूस की कार्रवाई एक स्वाभाविक प्रतिकार के रूप से समझी जा सकती है. यूरोप को नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने स्वयं रूस को वैश्विक वित्तीय नेटवर्क से अलग करने, रूसी उत्पादों पर भारी टैक्स लगाने के साथ-साथ रूसी सामानों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा कर, तेल निर्यातों की श्रृंखला को ध्वस्त करने, रूस के बैंकों, वित्तीय संस्थानों, व्यवसायों और सरकारी उद्यमों पर आक्रमण किया है. ऐसे में वे देश रूसी राष्ट्रपति से कोई सहयोग और सहायता की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? अमेरिका और यूरोप के सभी अनुमान फेल हो गये हैं और पुतिन के प्रतिशोध की आंच को अब वे सह नहीं पा रहे हैं.

शायद अमेरिका और यूरोप को यह लगा था कि पूरी दुनिया रूस के खिलाफ खड़ी हो जायेगी और वे पुतिन को सबक सिखाने के अपने मकसद में कामयाब हो जायेंगे, लेकिन उनके सभी अनुमान गलत सिद्ध हुए और अमेरिका और यूरोप की कार्रवाई का असर यह हुआ कि आज पूरी दुनिया महंगाई, खाद्य संकट, ऊर्जा संकट और आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने से त्रस्त है. उसमें अमेरिका और यूरोप भी शामिल हैं.

भारत समेत दुनिया के मुल्क यह मानते हैं कि दुनिया में शांति पुनः स्थापित होनी चाहिए, रूस को अब इस युद्ध को बंद करना चाहिए. उनकी संवेदनाएं यूक्रेन के लोगों के साथ है, लेकिन दुनिया के देश अमेरिका और यूरोप के देशों द्वारा लगाये जा रहे आर्थिक प्रतिबंधों से भी सशंकित हैं. इससे पहले भी जब भारत ने 1998 में पोखरण में परमाणु विस्फोट किया था, तब भी अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाये थे. उसके बाद भी किसी भी छोटी-बड़ी बात पर अमेरिका भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी देता रहा है. इसके अलावा अमेरिका ने ईरान, वेनेजुएला समेत कई मुल्कों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाये हैं, जिससे इन देशों के आर्थिक संकट और गहरा गये हैं. इन सब कारणों से अमेरिका और यूरोप के साथ शेष दुनिया की कोई सहानुभूति नहीं है. ऐसे में अमेरिका और यूरोप का यह समझना कि उन्हें दुनिया का साथ मिलेगा, कोई समझदारी की बात नहीं है.

आज रूस पर लगाये गये आर्थिक प्रतिबंध अमेरिका और यूरोप समेत समस्त दुनिया को प्रभावित करने लगे हैं. रूस पर इन प्रतिबंधों का प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं दे रहा. इन आर्थिक प्रतिबंधों की रूस तो खिल्ली उड़ा ही रहा है, दुनिया के अन्य देशों द्वारा भी इन्हें वापस लेने की मांग जोर पकड़ रही है. ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोल्सोनरो ने कहा है कि रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध कारगर सिद्ध नहीं हो रहे और ब्राजील ने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए रूस के साथ अपने आर्थिक संबंधों को और प्रगाढ़ करते हुए उससे उर्वरकों की खरीद प्रारंभ कर दी है. उधर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी अमेरिका से आर्थिक प्रतिबंधों को वापस लेने की गुहार लगायी है. उनका कहना है कि इन आर्थिक प्रतिबंधों के कारण आम आदमी पेट्रोलियम तेल और गैस, खाद्य पदार्थ, उर्वरक और अन्य वस्तुओं की महंगाई से त्रस्त है, इसलिए ये आर्थिक प्रतिबंध मानवाधिकारों की अवहेलना कर रहे हैं.

एक तरफ अमेरिकी और यूरोपीय देश आर्थिक प्रतिबंध समेत दुनियाभर पर कहर ढाह रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोपीय देश अपने प्रतिबंधों को न केवल और सख्त कर रहे हैं, बल्कि दूसरे मुल्कों पर भी दबाव बना रहे हैं कि वे भी इनका हिस्सा बनें, लेकिन भारत, ब्राजील और अन्य देश उन्हें धता दिखाते हुए रूस के साथ अपने रिश्तों को न केवल बरकरार रख रहे हैं, बल्कि अधिक प्रगाढ़ भी कर रहे हैं. आज जरूरत इस बात की है कि अमेरिका और यूरोपीय देश वास्तविकता समझें और आर्थिक प्रतिबंधों की बजाय अन्य राजनयिक प्रयासों के माध्यम से इस समस्या का समाधान खोजें. भारत और रूस के रिश्तों की गरमाहट और उनकी आपसी समझ का भी उपयोग इस युद्ध की समाप्ति हेतु किया जा सकता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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डॉ अश्विनी

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By डॉ अश्विनी

डॉ अश्विनी is a contributor at Prabhat Khabar.

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