9 अगस्त की भारत की वो डील, जिसकी बदौलत अमेरिका को पटका और बदल दिया दुनिया का नक्शा
रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर और बीच में USSR के नेता बेजनेव के साथ इंदिरा गांधी, फोटो पीके
इतिहास में कुछ घटनाएं इतनी अहम होती हैं, जिससे बड़े-बड़े बदलाव सामने आते हैं. इन घटनाओं की तारीख भी अहम होती है. जैसे 15 अगस्त को ही लीजिए. इस दिन क्या हुआ था? भारत आजाद हुआ... अक्सर हमारे मुंह से तपाक से यही निकलता है. ऐसी ही तारीख है 9 अगस्त की. इस दिन भारत ने अमेरिका जैसी महाशक्ति को दक्षिण एशिया में धराशाई करने की नींव डाली थी. यह वह तारीख भी थी, जिसने भारत और रूस की दोस्ती का एक नया मुकाम भी सेट कर दिया.
9 अगस्त 1971 को भारत और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच हुई एक ऐतिहासिक संधि का असर केवल भारत-सोवियत रिश्तों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस दौर के दक्षिण एशियाई और वैश्विक रणनीतिक समीकरणों पर पड़ा.
अमेरिका, पाकिस्तान और चीन के करीब आने से भारत की चिंता और चुनौती दोनों बढ़ती जा रही थी. दक्षिण एशिया में राजनीतिक और सैन्य तनाव को अब टाला नहीं जा सकता था. पाकिस्तान के अमेरिका और चीन के साथ संबंध मजबूत हो रहे थे और भारत को आशंका थी कि क्षेत्रीय परिस्थितियां उसके खिलाफ जा सकती हैं. इसी दौरान पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में राजनीतिक संकट और हिंसा बढ़ रही थी. लाखों लोग भारत की ओर पलायन कर रहे थे. ऐसे समय में भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत रणनीतिक साझेदार की जरूरत महसूस हो रही थी.
9 अगस्त 1971 को हुआ ऐतिहासिक समझौता
इसी पृष्ठभूमि में तत्कालीन सोवियत विदेश मंत्री आंद्रेई ग्रोमिको भारत पहुंचे. 9 अगस्त 1971 को उन्होंने भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह के साथ भारत-सोवियत शांति, मैत्री और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते ने दोनों देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक विश्वास को नई मजबूती दी. हालांकि यह औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं था, लेकिन बदलते वैश्विक हालात में इसने भारत को महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक समर्थन दिया.
बांग्लादेश युद्ध से पहले बनी रणनीतिक जमीन
इस संधि के कुछ ही महीनों बाद दक्षिण एशिया की तस्वीर ही बदल गई. संधि पर हस्ताक्षर के कुछ ही महीनों बाद दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. इस युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ. उस समय भारत को सोवियत संघ से मिला राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन बेहद महत्वपूर्ण माना गया. खासकर तब, जब अमेरिका और चीन पाकिस्तान के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे थे.
यही वजह है कि 9 अगस्त 1971 की संधि को भारत की विदेश नीति और दक्षिण एशिया के रणनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है. इसी संधि ने दुनिया का नक्शा नए तरीके से बनाने में अपना अहम रोल अदा किया.
अमेरिका का पाकिस्तान को समर्थन
1971 के युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया. राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान के साथ करीबी संबंध रखते थे. अमेरिका पाकिस्तान के साथ तो खड़ा था ही, किसिंजर ने जुलाई 1971 में गुप्त रूप से चीन की यात्रा भी की थी. निक्सन और किसिंजर ने भारत पर युद्ध रोकने का कूटनीतिक दबाव बनाया.
युद्ध के अंतिम चरण में अमेरिका ने यूएसएस एंटरप्राइज के नेतृत्व में अपना नौसैनिक बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा. इसका मकसद भारत को दबाव में लाना और पाकिस्तान को यह संकेत देना था कि अमेरिका उसके साथ खड़ा है. अमेरिका ने प्रचारित किया कि उसका मकसद संघर्ष वाले इलाके से अमेरिकी नागरिकों को बाहर निकालना है, जबकि वह एक दिन पहले ही अपने लोगों को बाहर निकाल चुका था. हालांकि अमेरिकी बेड़े ने भारत के खिलाफ कोई सीधा सैन्य हमला नहीं किया.
ये भी पढ़ें: चीन के खिलाफ अमेरिका का नया प्लान, तैयार कर रहा ऐसी 19 खतरनाक मिसाइल पनडुब्बियां
सोवियत संघ ने कैसे दिया जवाब?
इसी परिप्रेक्ष्य में भारत के साथ 9 अगस्त 1971 की संधि के बाद सोवियत संघ भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक सहारा बन गया. जब अमेरिकी नौसैनिक ताकत बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ी, तब सोवियत नौसेना ने भी हिंद महासागर क्षेत्र में एक विध्वंसक जहाज और माइनस्वीपर के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाई. इससे अमेरिका के लिए सीधे हस्तक्षेप का जोखिम बढ़ गया.
इसके साथ ही सोवियत संघ ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का समर्थन किया और भारत पर युद्ध रोकने के दबाव का विरोध किया. इस तरह सोवियत संघ ने अमेरिका के कदम का सीधा युद्ध किए बिना कूटनीतिक, रणनीतिक और नौसैनिक संतुलन के जरिए जवाब दिया. अंततः भारतीय सेना ने पूर्वी मोर्चे पर निर्णायक जीत हासिल की और 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया.
सोवियत संघ के बाद भी कायम रहा रिश्ता
भारत-सोवियत संधि 20 वर्षों के लिए की गई थी. सोवियत संघ के विघटन के बाद भी भारत ने नए रूस के साथ अपने संबंधों को नए आधार पर आगे बढ़ाया. दोनों देशों ने 2000 में स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप की शुरुआत की. इसके बाद रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, ऊर्जा और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ता गया.
ये भी पढ़ें: भारत में अवैध रास्ते से घुसे बांग्लादेशी तस्कर, BSF ने मारी गोली; एक की मौत
2026 में फिर चर्चा में भारत-रूस सैन्य सहयोग
भारत और रूस के रक्षा संबंधों में अब एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है. दोनों देशों के बीच RELOS (रेसीप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिटिक्स सपोर्ट) समझौता जनवरी 2026 से पूरी तरह लागू हो चुका है. इस समझौते के तहत दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल करने की सुविधा मिलती है. इनमें सैन्य अड्डे, बंदरगाह और एयरफील्ड जैसी सुविधाएं शामिल हैं.
हजारों किलोमीटर दूर सेनाओं के लिए लॉजिस्टिक सहयोग
RELOS का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत और रूस जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं. इससे लंबी दूरी के सैन्य अभियानों के दौरान ईंधन, मरम्मत, रखरखाव और अन्य लॉजिस्टिक जरूरतों को पूरा करना आसान हो सकता है.
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि रूसी नौसेना और वायुसेना की मौजूदगी भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्रों से लेकर आर्कटिक और यूरेशियाई क्षेत्र तक रहती है. इसी तरह रूस को भी भारत की रणनीतिक स्थिति से लाभ मिल सकता है.
ये भी पढ़ें: पाकिस्तान में पेट्रोल पर भारी टैक्स के खिलाफ फूटा लोगों का गुस्सा, कहा- तुम और IMF भाड़ में जाओ
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Anant Narayan Shukla
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










