चीन ने शुरू किया ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध निर्माण, भारत के लिए खतरे की घंटी

Updated at : 13 Oct 2015 5:47 PM (IST)
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चीन ने शुरू किया ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध निर्माण, भारत के लिए खतरे की घंटी

बीजिंग: तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनी चीन की सबसे बडी पनबिजली परियोजना – जम हाइड्रोपावर स्टेशन की सभी छह इकाइयों का समावेश आज पावर ग्रिड में कर दिया गया जबकि इस परियोजना से जल आपूर्ति में व्यवधान उत्पन्न होने की आशंका पर भारत की चिंता बढ गई है. चीन के वुहान में स्थित प्रमुख […]

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बीजिंग: तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनी चीन की सबसे बडी पनबिजली परियोजना – जम हाइड्रोपावर स्टेशन की सभी छह इकाइयों का समावेश आज पावर ग्रिड में कर दिया गया जबकि इस परियोजना से जल आपूर्ति में व्यवधान उत्पन्न होने की आशंका पर भारत की चिंता बढ गई है.
चीन के वुहान में स्थित प्रमुख चीनी पनबिजली ठेकेदार ‘चाइना गेझोउबा ग्रुप’ ने सरकारी समाचार एजेंसी ‘शिन्हुआ’ को बताया कि केंद्र की सभी इकाइयों का समावेश पावर ग्रिड में करा दिया गया है और इससे डेढ अरब डालर के केंद्र ने संचालन करना शुरु कर दिया.
शन्नान प्रिफेक्चर के ग्यासा काउंटी में स्थित जम हाइड्रो पावर स्टेशन को जांगमू हाइड्रोपावर स्टेशन के नाम से भी जाना जाता है. यह ब्रह्मपुत्र नदी के पानी का इस्तेमाल करता है. ब्रह्मपुत्र नदी को तिब्बत में यारलुंग जांगबो नदी के नाम से जाना जाता है. यह नदी तिब्बत से भारत आती है और फिर वहां से बांग्लादेश जाती है.
इस बांध को विश्व की सबसे ज्यादा उंचाई पर बने पनबिजली केंद्र के रुप में जाना जाता है. यह अपने किस्म की सबसे बडी परियोजना है जो एक साल में 2.5 अरब किलोवाट-घंटे बिजली उत्पादन करेगी.कंपनी ने कहा, ‘‘यह मध्य तिब्बत की बिजली की किल्लत दूर करेगी और बिजली की कमी वाले क्षेत्र में विकास लाएगी. यह मध्य तिब्बत का एक अहम उर्जा आधार भी है.’ शिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार अधिकारियों ने कहा है कि जब गर्मियों में बिजली प्रचूर होगी तो उसके एक हिस्से का पारेषण पडोस के छिंगहाई प्रांत में किया जाएगा.इस परियोजना की पहली इकाई ने पिछले साल नवंबर में अपना संचालन शुरु कर दिया था.
अतीत की रिपोर्टों में बताया गया था कि जांगमू के अलावा चीन कुछ और बांध बना रहा है. इस बीच, चीन यह कह कर भारत की चिंताएं दूर करने की कोशिश कर रहा है कि ये ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ परियोजनाएं हैं जिनका डिजाइन पानी के भंडारण के लिए नहीं किया गया है. इन बांधों ने भारत की ये चिंताएं भी बढाई हैं कि संघर्ष के समय चीन पानी छोड सकता है जिससे बाढ आने का गंभीर खतरा होगा.
ब्रह्मपुत्र पर भारत के एक अंतर-मंत्रालय विशेषज्ञ समूह (आईएमईजी) ने 2013 में कहा था कि ये बांध उपरी इलाके में बनाए जा रहे हैं. समूह ने निचले इलाकों में जल के प्रवाह पर इनके प्रभाव के मद्देनजर इनपर निगरानी का आह्वान किया था.समूह ने रेखांकित किया था कि तीन बांध – जिएशू, जांगमू और जियाचा एक दूसरे से 25 किलोमीटर के दायरे में और भारतीय सीमा से 550 किलोमीटर की दूरी पर हैं.
वर्ष 2013 में बनी सहमति के अनुसार चीनी पक्ष ब्रह्मपुत्र की बाढ के आंकडे जून से अक्तूबर के बजाय मई से अक्तूबर के दौरान प्रदान करने में सहमत हुआ था . 2008 और 2010 के नदी जल करारों में जून से अक्तूबर के दौरान आंकडे प्रदान करने का प्रावधान था.
भारत को चिंता है कि अगर पानी बाधित किया गया तो ब्रह्मपुत्र नदी की परियोजनाएं, खास तौर पर अरुणाचल प्रदेश की अपर सियांग और लोअर सुहांस्री परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं.
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