बीजिंग : भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पड़ोसी देश श्री लंका की यात्रा को लेकर चीन की तरफ से आपत्तिपूर्ण प्रतिक्रिया सामने आई है. मोदी श्री लंका की यह यात्रा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है. भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी 28 साल बाद श्री लंका की यात्रा पर गए हैं. इसको लेकर चीन के एक आधिकारिक थिंकटैंक ने तमिल बहुल जाफना में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्र को श्रीलंकाई मामलों में हस्तक्षेप करार देते हुए आज कहा कि चीन और श्रीलंका के संबंधों से जुडी हालिया घटनाएं बीजिंग का ध्यान खींचने के लिए पर्याप्त हैं.
शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज के सहायक अनुसंधानकर्ता लियू जोंगयी ने एक लेख में लिखा, मोदी की श्रीलंका की यात्रा ने चीन समेत कई देशों के मीडिया का ध्यान खींचा है. इनमें से अधिकतर का यह मानना है कि कोलंबो द्वारा चीन के निवेश वाली परियोजनाओं को रोकने से नयी दिल्ली बेहतर स्थिति में पहुंच गई है.
सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में छपे इस लेख में कहा गहा है, मोदी ने श्रीलंका की अपनी यात्रा में तमिल बहुल जाफना शहर को भी शामिल किया जो दरअसल देश के आंतरिक मामलों में भारत का हस्तक्षेप दिखाता है. लेख में एक अरब 50 करोड डॉलर की कोलंबो पोर्ट सिटी परियोजना समेत पांच अरब डॉलर के चीनी निवेश की समीक्षा करने संबंधी श्रीलंका की नयी सरकार के निर्णय का स्पष्ट रुप से जिक्र करते हुए कहा गया है, हर छोटा देश विभिन्न शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहता है.
लेख में कहा गया, इनमें से कुछ देश बडी शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता का लाभ उठाकर अपने राष्ट्रीय हितों को अधिकतम करने की कोशिश भी करते हैं. इसमें कहा गया कि हालिया गतिविधियां बीजिंग का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए पर्याप्त हैं. हालांकि लेख में यह भी लिखा है, तमिल लोगों और मत्स्य संसाधनों पर भारत और श्रीलंका के बीच ऐतिहासिक विवाद के कारण दोनों देशों को फिलहाल अच्छे संबंध स्थापित करने में मुश्किल होगी.
इसमें लिखा है, यदि श्रीलंकाई सरकार विशेष शक्तियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की कोशिश में चीन की साख को नजरअंदाज करती है तो उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सम्मान नहीं मिलेगा. चीन ने अपनी धीमी पडती अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए एक रणनीतिक पहल के तौर पर रेशम मार्ग परियोजना का प्रस्ताव रखा है. लेख में कहा गया है कि चीन को योजना को बढावा देते समय क्षेत्रीय शक्तियों और छोटे देशों की प्रतिक्रियाओं पर नजदीक से नजर रखनी चाहिए.
इसमें कहा गया है, भारत के हिंद महासागर के द्वीप राष्ट्रों के साथ असंख्य ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंध हैं. नयी दिल्ली की भी इस क्षेत्र में एक अग्रणी भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा है. लेख के अनुसार अधिकतर दक्षिण एशियाई और हिंद महासागर के देशों ने इस पहल की सराहना की है लेकिन भारत को लगता है कि इसके पीछे कुछ गुप्त भू राजनीतिक मकसद अवश्य होंगे.
इसमें कहा गया है, नयी दिल्ली नहीं चाहती कि दक्षिण एशिया एवं हिंद महासागर के देश इसमें भाग लें लेकिन वह इसके स्थान पर कोई अन्य योजना प्रस्तावित करने में अक्षम है. लेख में कहा गया है, अब मोदी हिंद महासागर के द्वीप राष्ट्रों तक पहुंचे हैं, तो ऐसा लगता है कि भारत उनके साथ सैन्य एवं सुरक्षा मामलों में सहयोग बढाकर क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है.
आइये, जानें चीन की खीझ के क्या कारण हो सकते हैं.
नरेंद्र मोदी सरकार की असरदार विदेश नीति
नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारत में सत्ता सम्हालने के तुरंत बाद ही अपनी विदेश नीति पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया था. यही कारण है कि नरेंद्र मोदी सबसे पहले अपने पड़ोसी देश भूटान और नेपाल की यात्रा पर गए थे. इन सबके पीछे संकेत साफ़ था. मोदी समूचे दक्षिण एशिया में चीन के दबदबे का असर कम करने के लिए सबसे पहले अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में मजबूती कायम करना चाहते थे. चीन तेजी से दक्षिण एशिया के देशों में आर्थिक निवेश करके उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगा हुआ था. भारत की पहले की सरकारें चीन की इस कूटनीति का समुचित जवाब नहीं दे पाईं, जिसकी वजह से चीन का दबदबा बढ़ता चला गया. चीन इसके सहारे भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में लगा हुआ था. नरेंद्र मोदी की सरकार ने कूटनीतिक पहल करते हुए अपनी सरकार के कामकाज में विदेश नीति पर इन्हीं कारणों से विशेष जोर दिखाया है.
भारत – अमेरिका के रिश्तों से चिढ़ा चीन
इस साल 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा प्रमुख अतिथि के रूप में भारत आये थे. किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ओबामा पहले ऐसे नेता बने, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का दौरा किया. इस दौरे के दौरान मोदी और ओबामा के बीच बहुत ज्यादा गर्मजोशी दिखाई दी. अमेरिका ने भारत के साथ कई स्तरों पर सहयोग की बात की और भारत को अपना प्रमुख सहयोगी देश बताया. इन बातों से भी चीन में बेचैनी बढ़ गयी और चीन को लगने लगा कि भारत और अमेरिका मिलकर इस क्षेत्र में चीन के दबदबे को कम करना चाहेंगे.
श्री लंका में नई सरकार और भारत का रिश्ता
श्री लंका में हाल ही में राष्ट्रपति चुनाव संपन्न हुए हैं, जिसमें महिंद्रा राजपक्षे की हार हुई और मैत्रिपाला सिरीसेना श्री लंका के नए राष्ट्रपति बने. राजपक्षे पर बड़ी तादाद पर श्री लंकाई तमिलों के जनसंहार का आरोप था, इसकी वजह से भारत के तमिल दलों का देश की सरकार पर दबाव था. श्री लंका के चुनाव में भारत की भी रूचि थी. हाल ही में ये बात सामने आई थी कि महिंद्रा राजपक्षे को चुनाव में हरवाने की कोशिश के आरोप में
श्री लंका से भारतीय खुफिया विभाग (रॉ) के एक प्रमुख अधिकारी को श्री लंका से चले जाने को कहा गया था. राष्ट्रपति बनने के बाद सिरीसेना ने भी अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना. यह बात ये साबित करती है कि कूटनीतिक स्तर पर भारत की पहल ने रंग दिखाया है और इसकी वजह से बरसों से भारत-श्री लंका के रिश्तों पर पड़ी हुई धूल अब साफ़ होने लगी है. सिरीसेना की पहल के जवाब में ही मोदी भी श्री लंका की यात्रा पर गए हैं. चीन इन्हीं बातों से खीझ में है और शायद यही कारण है कि अलग-अलग बहानों से अपनी आपत्ति दर्ज कर रहा है.