Digital India के 10 साल: अब असली परीक्षा भरोसे और समावेशन की

'पहले दस साल तकनीक के थे, अगले दस साल भरोसे के होंगे'
दस साल पहले डिजिटल इंडिया ने देश को तकनीक से जोडने का सपना दिखाया था. आज डिजिटल भुगतान से लेकर सरकारी सेवाओं तक तस्वीर बदल चुकी है. लेकिन अगले दशक की असली चुनौती लोगों का भरोसा जीतने, साइबर सुरक्षा मजबूत करने और तकनीक को सभी के लिए सुरक्षित व समावेशी बनाने की होगी.
जोहार. आज है अगस्त. क्या भारत ने डिजिटल क्रांति पूरी कर ली है?
अगर आपका जवाब UPI, Online Banking, Aadhar, Digi Locker और मोबाइल से मिलने वाली सरकारी सेवाओं को देखकर हां है, तो शायद तस्वीर का केवल एक हिस्सा आपके सामने है.
सवाल यह नहीं है कि भारत डिजिटल हुआ या नहीं. सवाल यह है कि क्या हर भारतीय डिजिटल व्यवस्था पर भरोसा भी करता है?
डिजिटल इंडिया के 10 साल पूरे होने पर यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल उभरकर सामने आया है.
Standard Chartered के Executive Director और Global Head of Transaction Monitoring किशलय कुंतल मानते हैं कि पिछले दस वर्षों में भारत ने दुनिया के सामने डिजिटल बदलाव का एक अनोखा मॉडल पेश किया है. लेकिन अब अगले दशक की सफलता केवल नई तकनीक से नहीं, बल्कि भरोसे, साइबर सुरक्षा और समावेशी विकास से तय होगी.

एक दशक जिसने भारत की तस्वीर बदल दी
साल 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया अभियान की शुरुआत की थी, तब इसका उद्देश्य था तकनीक को केवल शहरों तक सीमित न रखकर गांव, गरीब और आम नागरिक तक पहुंचाना.
आज दस साल बाद तस्वीर काफी बदल चुकी है.
कभी बैंक खाता खुलवाने, पहचान सत्यापित कराने, सरकारी योजना का लाभ लेने या टैक्स भरने में कई दिन लग जाते थे. अब इनमें से अधिकांश काम मोबाइल फोन से कुछ मिनटों में पूरे हो जाते हैं.
UPI ने भुगतान की पूरी संस्कृति बदल दी है. आज सब्जी बेचने वाला हो या छोटी किराना दुकान, हर कोई QR Code से भुगतान स्वीकार कर रहा है. डिजिटल भुगतान अब सुविधा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.
यही वजह है कि भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया के कई देशों के लिए अध्ययन का विषय बन गया है.
सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही?
किशलय का मानना है कि डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि इसने तकनीक को लोकतांत्रिक बनाया.
पहले डिजिटल सेवाएं सीमित लोगों तक थीं. अब छोटे व्यापारी भी देशभर के ग्राहकों तक पहुंच पा रहे हैं.
सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुंच रहा है.
पहचान सत्यापन आसान हुआ है.
डिजिटल भुगतान ने नकदी पर निर्भरता कम की है.
यानी तकनीक ने अवसरों का दायरा बढ़ाया है.

लेकिन हर सफलता अपने साथ नई चुनौती भी लाती है
डिजिटल व्यवस्था जितनी तेजी से बढ़ी, चुनौतियां भी उतनी ही तेजी से सामने आईं.
आज इंटरनेट लाखों लोगों तक पहुंच चुका है.
लेकिन क्या सभी लोग इंटरनेट का सुरक्षित इस्तेमाल करना जानते हैं?
यही सबसे बड़ा सवाल है.
डिजिटल धोखाधड़ी, फर्जी लिंक, ओटीपी ठगी और साइबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं.
किशलय कहते हैं कि लोगों को ऑनलाइन लाना पहला कदम था. अब उन्हें सुरक्षित महसूस कराना अगला और अधिक कठिन कदम है.
यानी डिजिटल पहुंच और डिजिटल भरोसा दोनों अलग बातें हैं.
छोटे कारोबारियों के सामने नई चुनौती
डिजिटल भुगतान अपनाना आसान था.
लेकिन असली बदलाव अभी बाकी है.
देश के करोड़ों सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम यानी MSME आज डिजिटल लेनदेन तो कर रहे हैं, लेकिन उनके पास मौजूद इस डेटा का पूरा लाभ उन्हें अभी नहीं मिल रहा.
अगर यही डिजिटल डेटा सही तरीके से इस्तेमाल हो तो छोटे कारोबारियों को आसानी से ऋण मिल सकता है.
वे अपने नकदी प्रवाह को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं.
अपने कारोबार का विस्तार कर सकते हैं.
यानी आने वाले वर्षों में डिजिटल भुगतान से आगे बढ़कर डिजिटल वित्तीय सेवाओं पर ध्यान देना होगा.
सरकारी सेवाओं को भी अगले चरण में जाना होगा
आज कई सरकारी सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं.
लेकिन आम नागरिक के सामने एक अलग समस्या है.
हर सेवा के लिए अलग पोर्टल.
अलग मोबाइल एप.
अलग प्रक्रिया.
किशलय का मानना है कि भविष्य की डिजिटल व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जहां नागरिक को अलग अलग प्लेटफॉर्म के बीच भटकना न पड़े.
उसे एकीकृत और सरल अनुभव मिले. यही डिजिटल शासन का अगला चरण होगा.

अब AI की बारी
डिजिटल इंडिया के पहले दशक में इंटरनेट, मोबाइल और डिजिटल भुगतान केंद्र में रहे.
अगले दशक में यह भूमिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी Artificial Intelligence (AI) निभाएगी.
लेकिन यहां भी संतुलन जरूरी होगा.
यदि AI का उपयोग जिम्मेदारी से नहीं किया गया, तो गोपनीयता (privacy), डेटा सुरक्षा (data security) और गलत सूचनाओं (disinformation) जैसी नई समस्याएं सामने आ सकती हैं.
इसलिए तकनीकी विकास के साथ मजबूत नियम और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी होगी.
साइबर सुरक्षा होगी सबसे बड़ी प्राथमिकता
डिजिटल अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी होगी, साइबर हमलों का खतरा भी उतना ही बढ़ेगा.
बैंकिंग, भुगतान, सरकारी सेवाएं और व्यक्तिगत डेटा अब पूरी तरह डिजिटल व्यवस्था से जुड़े हैं.
ऐसे में साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी विषय नहीं रह गई है.
यह राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और नागरिकों के भरोसे का भी प्रश्न बन चुकी है.
किशलय मानते हैं कि अगले दशक में डिजिटल इंडिया की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि नागरिकों का डेटा कितना सुरक्षित रहता है.
दुनिया भारत की ओर क्यों देख रही है?
भारत ने जिस पैमाने पर डिजिटल सार्वजनिक ढांचा तैयार किया है, वह दुनिया के लिए एक उदाहरण बन चुका है.
आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer) जैसी व्यवस्थाओं ने यह दिखाया है कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि समावेशी विकास के लिए भी किया जा सकता है.
यही कारण है कि कई देश भारत के अनुभवों का अध्ययन कर रहे हैं.
लेकिन किसी भी मॉडल की असली सफलता तभी मानी जाती है जब वह समय की नई चुनौतियों के साथ खुद को बदलता रहे.
अगले दस साल की असली परीक्षा
डिजिटल इंडिया का पहला दशक बुनियादी ढांचा तैयार करने का दशक था.
दूसरा दशक भरोसा बनाने का होगा.
अब केवल इंटरनेट पहुंचाना पर्याप्त नहीं होगा.
जरूरत होगी कि हर नागरिक सुरक्षित महसूस करे.
हर छोटा व्यापारी डिजिटल अर्थव्यवस्था का पूरा लाभ उठा सके.
हर सरकारी सेवा सरल और एकीकृत हो.
हर नई तकनीक के साथ नागरिकों की निजता सुरक्षित रहे.
निष्कर्ष
डिजिटल इंडिया ने पिछले दस वर्षों में भारत की कार्यशैली बदल दी है. भुगतान से लेकर शासन तक और पहचान से लेकर सेवाओं तक, तकनीक ने आम नागरिक के जीवन को पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान बनाया है.
लेकिन जैसा कि किशलय कुंतल कहते हैं, अगले दस वर्षों का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होगा कि हमने कितने नए डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाए, बल्कि इस आधार पर होगा कि लोगों ने उन पर कितना भरोसा किया और उनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा.
डिजिटल क्रांति की पहली मंजिल भारत हासिल कर चुका है. अब अगली मंजिल केवल तकनीक की नहीं, बल्कि भरोसे, सुरक्षा, समावेशन और जिम्मेदार नवाचार की है. यही तय करेगा कि डिजिटल इंडिया केवल एक सरकारी अभियान रहेगा या वास्तव में विकसित भारत की मजबूत नींव बनेगा.

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लेखक के बारे में
By अचल प्रियदर्शी
अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.
उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.
उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.
ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;
Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)
बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)
International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)
ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)
झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)
जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)
Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)
उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)
बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)
International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
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