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टेक्नोलॉजी चाहिए परंतु सही टेक्नोलॉजी

Updated at : 02 Nov 2016 6:51 AM (IST)
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टेक्नोलॉजी चाहिए परंतु सही टेक्नोलॉजी

मुद्दा : भगवान की बनायी राजमार्ग हैं नदियां-2 श्रीश चौधरी यदि नदियां अविरल बहीं, तो पेयजल का संकट समाप्त हो जायेगा, कृषि एक बार फिर भारत का मुख्य उद्योग एवं धन संग्राहक बनेगा. हजारों वर्षों से भारत कृषि उत्पाद का मुख्य निर्यातक रहा है, कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है. आज भी ऐसा हो सकता […]

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मुद्दा : भगवान की बनायी राजमार्ग हैं नदियां-2
श्रीश चौधरी
यदि नदियां अविरल बहीं, तो पेयजल का संकट समाप्त हो जायेगा, कृषि एक बार फिर भारत का मुख्य उद्योग एवं धन संग्राहक बनेगा. हजारों वर्षों से भारत कृषि उत्पाद का मुख्य निर्यातक रहा है, कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है. आज भी ऐसा हो सकता है. आज पढ़ें
दूसरी कड़ी.
फरक्का बैराज की इंजीनियरिंग तो गलत इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है. फरक्का से मात्र 40 किमी दूरी तक ले जाकर गंगा जी के जल को हुगली नदी में गिराना था.
परंतु, बैराज बनानेवाले इंजीनियरों की डिजाइन टीम ने यह सोचा ही नहीं कि उनके द्वारा बनाया जा रहा 110 से अधिक फाटकों वाला यह बैराज गंगा जैसी लंबी, लगभग तीन हजार किलोमीटर लंबी, नदी में बह रहे धूलकणों एवं अन्य अघुलनशील मल के कितने बड़े भाग को आगे जाने से रोक देगा, और रुके हुए ये मलकण क्या करेंगे. आज इस बैराज की वजह से जितना पानी कलकत्ता के बंदरगाह को मिलता है, उससे कहीं अधिक कीमत फरक्का बैराज को बनाये रखने में लगती है.
चौबीसों घंटे, सातों दिन चलते अनवरत ड्रेजिंग के बाद भी फरक्का बैराज के पीछे पानी के अंदर इतनी मिट्टी जम गयी है और उस पर इतने अधिक जलपौधे उग आये हैं कि बैराज के आधे से अधिक फाटक, लगभग 60 फाटक, हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं. जो खुले हैं, वे इतना अधिक धूलकण लेने के लिए बने नहीं हैं, इसलिए उन पर दबाव बढ़ता है, एवं उन्हें भी बंद करना पड़ता है.
इस बैराज की बजह से बिहार, झारखंड-बंगाल-बांग्ला देश के गांव एवं कृषि तथा उन पर निर्भर लोग तबाह हो चुके हैं. स्वयं बंगाल के अनेक गांव रातों-रात जलमग्न हो चुके हैं. फिर भी हम इन महान चिरस्मरणीय इंजीनियरिंग भूलों को सहेजे संजोये बैठे हुए हैं. हम कब तक देखते हुए अंधे बने रहेंगे. हम कब तक नदियों को जोड़ने जैसी अनर्गल बातें करते-सुनते एवं सीमित राष्ट्रीय संसाधनों की बरबादी कर्जे ले लेकर करते रहेंगे. हम कब कहेंगे कि राजा ने कोई नया वस्त्र नहीं पहना है, वह नंगा है. कब?
भारत में सौ के लगभग छोटे-बड़े हाइडल प्रोजेक्ट हैं. ये अधिकतर बहुउद्देशीय हैं. इन बांधों को नदियों की धारा को रोक कर इन बांधों/बैराजों के पीछे बनी झील या सागर से ये परियोजनाएं बिजली, पीने तथा सिंचाई का पानी आदि निकालती हैं. परंतु, इनकी अनुमानित क्षमता यदि 500 मेगावाट बिजली निकालने की थी, तो ये ज्यादा से ज्यादा 200-250 मेगावाट बिजली ही निकाल पाते हैं.
पुराने संयत्र, सागर तल में जमती मिट्टी एवं उसकी अपर्याप्त ड्रेजिंग, यहां से निकलने वाली बिजली को महंगी एवं मात्र एक जिद के बदौलत करदाताओं के खर्चे से चलती हुए परियोजना बना देती है. झारखंड में बहती स्वर्णरेखा एवं दामोदर नदी एवं पास की बस्तियों की दुर्दशा हो गयी, परंतु तिलैया, मैथन, बोकारो आदि दामोदर घाटी परियोजना के बिजलीघर कलकत्ता को प्रकाशित करने के लिए स्थानीय साधनों का अपव्यय करते रहे. इससे भी अधिक दु:ख की बात सार्वजनिक रूप से अघोषित वह सत्य है, जहां इन्हें स्वीकार करना पड़ेगा कि ये परियोजनाएं अनुमानित क्षमता से काफी कम उत्पादन कर रही हैं. यही स्थिति नागार्जुन सागर, सरदार सरोवर, टिहरी एवं अन्य सभी जल विद्युत परियोजनाओं की है. इन परियोजनाओं को अब बंद होना चाहिए. हमें यह मान लेना चाहिए कि हमसे भूल हुई.
अंगरेजों के जमाने के पुल मुख्यत: ईटें जोड़-जोड़ कर बनाये जाते थे. वे ईटों वाले पिलर या स्तंभों पर खड़े होते थे. इन स्तंभों की नींव काफी गहरी होती थी एवं इन्हें अधिकतर खंभों की तरह गोलाकार बनाया जाता था. काफी तेजी से लेकर धीमी गति के बहाव का भी पानी इन पिलरों के चारों किनारों से निकल जाता था. पिलर भी काफी दिन चलते थे. नये पुल सीमेंट कंक्रीट एवं लोहे के हजारों टनों के महंगे मिश्रण के काफी महंगे विकल्प हैं.
इन पिलरों को खड़ा करने रखने के लिए नदी के ऊपर बड़े एवं काफी ऊंचे चबूतरे भी सीमेंट कंक्रीट के ही बनाये जाते हैं. सीमेंट के ये मजबूत, ऊंचे, लंबे-चौड़े चबूतरे नदी की गति को मंद कर देते हैं एवं इन चबूतरों के किनारे नदी द्वारा लायी गयी मिट्टी धूल कण बैठने लगती है. फिर वहां घास-पेड़ पौधे पैदा होने लगते हैं एवं नदी का दम घुटना शुरू हो जाता है. हम कहीं भी नये पुराने रेल सड़क पुल को देख कर यह तथ्य जान सकते हैं. तथापि हम गलत एवं महंगी इंजीनियरिंग की मार को खुली आंखों से बरदाश्त करते रहते हैं.
टेक्नोलॉजी चाहिए, परंतु सही टेक्नोलॉजी चाहिए. अब ड्राइ टॉयलेट बने हैं, जहां बिजली की करेंट पल में मल को जला कर धूल एवं जल को वाष्प बना कर कहीं किनारे मिट्टी में मिला देती है.
विकसित देशों में अधिकतर अंतरिक्षगामी रॉकेटों से आयी इसी टेक्नोलॉजी का उपयोग हो रहा है. परंतु इस टेक्नोलॉजी के लिये बिजली चाहिए. आज विश्व में हर जगह धूप एवं वायु से बिजली निकालने के प्रयास चल रहे हैं एवं उन्हें सस्ती एवं साफ ऊर्जा मिल रही है. जर्मनी की ऊर्जा आवश्यकता का 60 प्रतिशत सोलर पावर से पूरा होता है. भारत में गुजरात, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु में वायु ऊर्जा में उत्साहवर्धक प्रयोग हुए हैं. इनमें महंगा पार्ट सिर्फ सिलिकन चिप्स होता है, जहां ऊर्जा एकत्रित की जाती है. हम क्यों नहीं इस दिशा में शोध करते हैं?
देश में 20 से अधिक एनआइटी, एवं 15 आइआइटी में कहीं भी इस दिशा में कुछ भी नहीं हो रहा है. क्यों हम बी ग्रेड की मिसाइलों, सी ग्रेड के संदिग्ध अंतरिक्ष अभियानों में हजारों करोड़ खर्च करते हैं एवं पहले आवश्यक इंजीनियरिंग, मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास नहीं करते हैं.
हम क्यों आज भी सोलर चिप्स का आयात करते हैं? हमारे आइआइटी, एनआइटी आदि क्यों इस दिशा मेंं प्रयास नहीं करते हैं, नहीं तो हम क्यों नहीं महंगे दिखावे के इन सफेद हाथियों को बंद कर देते हैं और इन पर हो रहे हजारों-करोड़ों रुपये के व्यय को कहीं और लगाते हैं? आवश्यकता सही सोच एवं सही पहल करने की है. नदियों को अविरल बढ़ने देना इस सही सोच का पहला सही कदम होगा और इसके परिणाम सुखद होंगे.
और यदि इतनी बड़ी संख्या में इन्हीं शहरों में लोग यहीं रहेंगे, तो फिर इन्हें जल का पुनर्चक्रण(रिसाइक्लिंग) करना चाहिए, मल वाले जल को भी रिवर्स-ऑस्मोसिस पद्वति से स्वच्छ एवं पीने योग्य बना कर उसका फिर से व्यवहार करना चाहिए. आरओ की टेक्नोलॉजी अब भारत के लिए भी बहुत नयी नहीं हैं.
अब तो सामान्य मध्यवर्गीय परिवारों में भी आरओ के उपकरण लगे होते हैं, जिनसे पीने योग्य पानी तैयार हो जाता है, सिवाय एक पूर्वाग्रह के इस काम में और कोई भी बाधा नहीं है. 60-70 लाख की आबादी वाला शहर सिंगापुर इसी क्रिया से अपनी आवश्यकता का 60 प्रतिशत पानी निकालता है. छोटे-बड़े सभी नागरिक, सिंगापुर के मंत्रीगण एवं बड़े राजनयिक भी, इसी आरओ किये हुए पानी का उपयोग हर काम के लिए करते है. दिल्ली में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है?
दिल्ली में एवं भारत के अन्य भागों में भी, सामान्यतया ऐसा नहीं हो सकता है. लोगों की सांस्कृतिक मान्यताएं एवं अन्य अनेक प्रकार के पूर्वाग्रह आड़े आयेंगे. फिर यदि दिल्ली का पानी पूरी तरह साफ नहीं हो पायेगा, कर्मचारी-पदाधिकारी पूरी निष्ठा के साथ यह काम नहींं कर पायेंगे. कभी इनसे नेता कमीशन या रिश्वत मांगेंगे, कभी खुद इनकी मजबूरियां इस काम में बाधक बनेंगी. पानी कागज पर साफ भले ही हो जाये, वस्तुत: न यह साफ था और न पीने योग्य ही हो पायेगा. हो पाता तो बड़ा ही अच्छा होता.
यदि नदियां अविरल बहीं, तो पेयजल का संकट समाप्त हो जायेगा, कृषि एक बार फिर भारत का मुख्य उद्योग एवं धन संग्राहक बनेगा. हजारों वर्षो से भारत कृषि उत्पाद का मुख्य निर्यातक रहा है, कृषि इसके अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है. आज भी ऐसा हो सकता है.
आप कल्पना करें कि यदि एक हरी मिर्च दस रुपये की बिकती हो, एक औसत वजन की फूल गोभी पांच सौ रुपये की बिकती हो तथा एक रोहू मछली एक हजार रुपये की बिकती हो तो खर्चा काट कर भी इन्हें उगाने एवं बेचने वाले किसानों की कितनी आय होगी. यूरोप के बाजारों में इन वस्तुओं की यही कीमत है. परंतु, अभी तो ये वस्तुएं दरभंगा से दिल्ली भी नहीं जा सकती हैं.
दरभंगा में बड़े वायुयानों के उतरने एवं चढ़ने योग्य एक बड़ा हवाई अड्डा है, परंतु उत्तर बिहार, बेतिया से पूर्णिया तक, अभी भी विश्व के वायुमार्ग से नहीं जुड़ा है! क्यों, यह एक अलग प्रश्न है. शायद इसमें खर्चा लगेगा. परंतु जहां कुछ भी खर्चा नहीं हैं, जैसे नदियों के रास्ते, वे विकल्प भी अभी नदियों की गति में बाधा पड़ने से बंद हो गये हैं. (जारी)
(लेखक आइआइटी मद्रास के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं और संप्रति जीएलए यूनिवर्सिटी मथुरा में डिश्टिंग्विश्ड प्रोफेसर हैं)
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