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ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या, मध्य-पूर्व में अस्थिरता की आशंकाएं, भारत की ‘लुक वेस्ट पॉलिसी’ पर पड़ेगा असर

Updated at : 05 Jan 2020 7:43 AM (IST)
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ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या, मध्य-पूर्व में अस्थिरता की आशंकाएं, भारत की ‘लुक वेस्ट पॉलिसी’ पर पड़ेगा असर

अमेरिका द्वारा ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या से न केवल मध्य-पूर्व की राजनीति में भूचाल आ गया है, बल्कि उस क्षेत्र से दुनिया को मिलनेवाले तेल और गैस की कीमतों व आपूर्ति को लेकर भी संशय खड़ा हो गया है. ऐसे कयास लगाये जा रहे हैं कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव […]

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अमेरिका द्वारा ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या से न केवल मध्य-पूर्व की राजनीति में भूचाल आ गया है, बल्कि उस क्षेत्र से दुनिया को मिलनेवाले तेल और गैस की कीमतों व आपूर्ति को लेकर भी संशय खड़ा हो गया है. ऐसे कयास लगाये जा रहे हैं कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के प्रयास नहीं हुए, तो वह इलाका युद्ध की चपेट में आ सकता है और ऐसा युद्ध विश्व युद्ध का रूप ले सकता है. सुलेमानी के महत्व, हत्या के मध्य-पूर्व और भारत समेत दुनिया पर असर के आकलन के साथ प्रस्तुत है आज का इन-दिनों…

संदीप बामजई

वरिष्ठ स्तंभकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले चार-पांच सालों में पश्चिमी एशिया के शिया-सुन्नी वाले मुस्लिम दुनिया के बीच बहुत अच्छा तालमेल बनाया. एक तरफ सुन्नी बहुल सऊदी अरब, आबुधाबी और दुबई को अपनी तरफ किया, वहीं दूसरी तरफ ईरान, कतर और बहरीन के साथ भी भारत के संबंधों को मजबूत बनाया. बीते कई सालों से मोदी जी अपनी विदेश नीति में पश्चिमी एशिया के देशों को साथ लेकर चलते रहे हैं, क्योंकि यही वह क्षेत्र है, जहां से भारत कच्चा तेल खरीदता है.

ईरान से भारत अच्छा-खासा तेल खरीदता था, लेकिन जब से अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया है, तब से भारत के लिए कई मुश्किलें आयी हैं और तेल महंगा हुआ है. अब जब ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी को अमेरिका ने मार दिया है, तो यह जाहिर है कि इसका असर भारत पर जरूर पड़ेगा. सऊदी अरब, आबुधाबी और दुबई से लेकर ईरान, कतर और बहरैन के साथ भारत के संबंधों पर असर पड़ना तय है, क्योंकि ईरान भी अब चुप नहीं बैठेगा. इस हादसे का असर भारत की ‘लुक वेस्ट पॉलिसी’ पर पड़ेगा.

जनरल कासिम सुलेमानी को ईरान में दूसरे नंबर का नेता माना जाता था. पूरे ईरान में उनकी गहरी पैठ थी और लोग चाहते थे कि ईरान की बागडोर उनके हाथ में हो. ईरान के शक्ति-समीकरण में वह नंबर दो माने जाते थे. उनका प्रभाव सिर्फ ईरान तक ही नहीं था, बल्कि ईरान के बाहर यानी इराक, लेबनान, यमन जैसे देशों तक उनका प्रभाव था. ईरान के पास जो सबसे खतरनाक लड़ाकू सेना है, उसको लीड कर रहे थे, क्योंकि वे ईरान के मिलिट्री इंटेलीजेंस के मुखिया भी थे.

वह हमेशा अमेरिका और उसकी गलत नीतियों के विरोध में खड़े रहते थे. इसका मतलब साफ है कि अमेरिका द्वारा उनकी हत्या के बाद ईरान के सारे सैन्य शक्ति समीकरण बदल जायेंगे. ईरान इस हत्या का बदला अमेरिका से जरूर लेगा, इसकी पूरी संभावना है. यही वह पहलू है, जो भारत के लिए परेशानी का सबब पैदा करनेवाला है.

सुलेमानी की हत्या के तुरंत बाद ही चार प्रतिशत वैश्विक तेल के दाम प्रभावित हुए. सोने का दाम भारत में चालीस हजार पर पहुंच गया.इस वक्त भारत की अर्थव्यवस्था जिस मुश्किल दौर से गुजर रही है, सुलेमानी की हत्या इस मुश्किल को और बढ़ा सकती है. भारत कच्चे तेल को सऊदी से, आबुधाबी से और ईरान से खरीदता है. फिलहाल ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध है. सऊदी और आबुधाबी जैसे सुन्नी देश अमेरिका की ओर हैं और वहीं ईरान के साथ कतर भी अमेरिका के खिलाफ है. कतर तो सऊदी के भी खिलाफ है. जबकि भारत का इन सभी देशों से अच्छा संबंध है, जिस पर अब कुछ असर पड़ना तय है, क्योंकि रिश्तों के समीकरण बदल जायेंगे.

ईरान अगर अमेरिका के खिलाफ हमला करता है, तो पश्चिम एशिया में तनाव अब शुरू हुआ समझा जाये. यह तनाव न सिर्फ तेल कारोबार को नुकसान पहुंचायेगा, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगा. कच्चे तेल का दाम बढ़ जायेगा और भारत की अर्थव्यवस्था और भी नीचे चली जायेगी. इधर बीच जिन एयरलाइन कंपनियों का घाटा कम होता दिख रहा था, तेल के दाम बढ़ने से वे कंपनियां मुश्किल में आ जायेंगी. क्योंकि इन कंपनियों के पास भारी मात्रा में तेल पश्चिमी एशिया के देशों से ही आता है.

इस बात की संभावना प्रबल है कि हमारी ऊर्जा जरूरतों में जो पश्चिमी एशिया का योगदान है, उस पर असर से हमारा बड़ा नुकसान होगा. ईरान भले कोई बड़ा बदला न ले पाये, लेकिन अमेरिकी या फिर इस्राइली इस्टेब्लिशमेंट पर बदले की कार्रवाई जरूर करेगा. ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध से पहले ही भारत तनाव झेल रहा है. अब तो यह तनाव और भी बढ़ जायेगा, जिसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर ही पड़ेगा. ट्रंप ने एक तरह से विश्व युद्ध के हालात पैदा कर दिये हैं और इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

क्या हो सकते हैं नतीजे!

कूटनीति को नुकसान

जनरल सुलेमानी की हत्या ने अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी तरह के संवाद की संभावना को फिलहाल समाप्त कर दिया है. परमाणु करार पर बातचीत शुरू करने तथा मध्य-पूर्व में तनाव कम करने की किसी भी कोशिश की अभी उम्मीद नहीं की जा सकती है. सो, इस घटना का पहला खामियाजा कूटनीति को भुगतना पड़ेगा. जाहिर है, इतना बड़ा फैसला लेते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके सलाहकारों ने नतीजों का आकलन किया होगा.

इस लिहाज से अब आगे जो भी होगा, वह अधिक हिंसक और तनातनी को बढ़ानेवाला होगा. जनरल सुलेमानी की हत्या के अगले ही दिन इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेस के एक ठिकाने पर हमला हुआ है, जिसमें छह लड़ाके मारे गये हैं. यह समूह ईरान-समर्थित शिया लड़ाकों का एक साझा मंच है. इसके एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत शुक्रवार के उस हमले में हो गयी थी, जिसके निशाने पर जनरल सुलेमानी थे. हालांकि अमेरिका ने शनिवार के हमले में हाथ होने से इनकार किया है, पर कई जानकारों का मानना है कि यह अमेरिकी कार्रवाई है.

स्वाभाविक रूप से ईरान से इस हत्या का बदला लेने की बात कही है और उसका नेतृत्व कार्रवाई पर विचार कर रहा है. अमेरिकी प्रतिक्रिया कंजरवेटिव और डेमोक्रेटिक पार्टियों के हिसाब से बंटी हुई है, पर कोई भी पक्ष इस हमले पर अफसोस नहीं जता रहा है. लेकिन डेमोक्रेटिक नेताओं ने चेताया है कि इस कार्रवाई से पहले से ही जोखिम भरे मध्य-पूर्व में रह रहे अमेरिकियों की सुरक्षा बढ़ने के बजाय कम ही होगी.

ईरान अभी मध्य-पूर्व में युद्ध की स्थिति नहीं पैदा करना चाहेगा, लेकिन अभी या बाद में वह जो भी कार्रवाई करेगा, उसकी भी प्रतिक्रिया होगी और उस क्षेत्र में यह चक्र चलता रहेगा.

संभावित कार्रवाई के तौर पर ईरान के सामने कुछ विकल्प इस प्रकार हैं- बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर हमला कर उसे कब्जे में लेने की कोशिश करना, इराक के अमेरिकी ठिकाने पर हमला करना और देशभर में अमेरिकी सैनिकों से भिड़ना, यमन की सीमा के नजदीक सऊदी अरब के दक्षिण में हालिया तैनात अमेरिकी टुकड़ियों पर रॉकेट से हमला करना तथा सुलेमानी के समकक्ष किसी अमेरिकी अधिकारी की हत्या करना.

ईरान अपने प्रभाव के तहत आनेवाले लेबनॉन के हिजबुल्लाह और यमन के हौदी विद्रोहियों के जरिये भी बदला लेने की कोशिश कर सकता है, पर इसकी संभावना कम है. हिजबुल्लाह लेबनॉन को इस्राइल के साथ लड़ाई में नहीं झोंकना चाहेगा और इससे जनरल सुलेमानी का समुचित बदला भी नहीं ले सकेगा. यमनी विद्रोही सऊदी अरब और उसके साथी देशों के साथ पहले से ही युद्धरत हैं. ऐसे में वे अमेरिकी टुकड़ियों के साथ लड़ाई कर एक और मोर्चा नहीं खोलना चाहेंगे.

इराक में अमेरिकी भूमिका पर खतरा

जनरल सुलेमानी की हत्या से इराक में शांतिपूर्ण ढंग से स्थिरता लाने में अमेरिका की भूमिका को भी बड़ा झटका लगा है. देश में अभी विभिन्न मुद्दों को लेकर कई महीनों से प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनकी वजह से प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी को इस्तीफा देना पड़ा है. अन्य इराकी नेता भी इन आंदोलनों पर बहुत सोच-समझकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं.

सुलेमानी की हत्या के बाद देश की आंतरिक स्थिति अधिक जटिल और विभाजित हो गयी है. ऐसे में ठोस सुधारों पर आधारित किसी योजना की रूप-रेखा तैयार करना बहुत मुश्किल है. इराकी संसद अब देश से अमेरिकी सेना को निकालने की मांग पर गंभीरतापूर्वक विचार कर सकती है. सो, अमेरिका और इराक के संबंध बिगड़ने के भी पूरे आसार हैं.

हिजबुल्लाह का प्रभाव बढ़ेगा

निश्चित ही सुलेमानी एक करिश्माई रणनीतिकार थे, पर ईरानी रक्षा मंत्रालय और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर स्थापित और गंभीर संस्थाएं हैं तथा उन्हें सुलेमानी की जगह योग्य अधिकारी लाने में बहुत मुश्किल नहीं होगी, भले ही वह सुलेमानी जैसा प्रभावशाली नहीं हो.

साल 2000 में दक्षिणी लेबनॉन से इस्राइली दखल को खत्म करने के बाद हिजबुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह एक असरदार नेता के रूप में उभरे हैं. ईरान भी सीरिया, यमन और इराक के मसलों पर उनकी सलाह लेता रहा है. इसके साथ ही इराकी शिया नेता मुक्तदा अल-सद्र और यमन के हौदी विद्रोहियों के नेता अब्देलमलिक अल-हौदी के साथ भी उनके अच्छे संबंध हैं. ऐसे में सुलेमानी की अनुपस्थिति में नसरल्लाह और उनका संगठन हिजबुल्लाह का महत्व बढ़ जायेगा.

कासिम सुलेमानी एक कठोर सैन्य नेता थे और सीरिया में विद्रोहों के दमन और इराक में अमेरिका-विरोधी ताकतों को शह देने में उनकी बड़ी भूमिका रही थी, पर वे व्यावहारिक भी थे और ईरानी ताकत की सीमा और ताकत के आम इस्तेमाल के जोखिम को बखूबी समझते थे. उनकी मौत से न तो आतंक का और न ही अमेरिका-विरोधी हमलों का खतरा कम हुआ है. तनाव बढ़ने के साथ हत्या की आशंकाओं को देखते हुए मध्य-पूर्व में अमेरिकी कूटनीतिकों की स्थिति नाजुक हो गयी है.

(अटलांटिक काउंसिल के रफीक हरीरी सेंटर फॉर द मीडिल इस्ट के फेलो नबील खौरी का संपादित/अनुदित लेख )

कौन थे कासिम सुलेमानी

बासठ वर्षीय जनरल सुलेमानी ईरान के बहुचर्चित कुद्स फोर्स के प्रमुख थे. ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर की इस इकाई को अमेरिकी सीआइए और स्पेशल फोर्सेस का समकक्ष माना जाता है.

ईरान के लिए जनरल कासिम सुलेमानी इसलिए महत्वपूर्ण थे क्योंकि यमन, इराक, सीरिया और लेबनॉन में ईरानी और शिया समुदाय के हितों से जुड़े सभी अभियानों में उनकी अग्रणी भूमिका थी. इस कारण वे मध्य-पूर्व में बेहद अहम हस्ती बन गये थे. कहा जाता है कि रणनीति बनाने, खुफिया जानकारी जुटाने तथा सहयोगी बनाने के मामले में उस क्षेत्र में उनके समकक्ष कोई भी अन्य सैन्य अधिकारी नहीं था. वे ईरान-इराक युद्ध के भी बड़े लड़ाकों में थे.

सुलेमानी 1998 में कुद्स इकाई के प्रमुख बने थे और उनके दस्ते की जिम्मेदारी पूरे मध्य-पूर्व में ईरानी हितों की रक्षा करना था. हालांकि इराक के साथ युद्ध में जब वे शामिल हुए, तो उन्हें कोई खास भूमिका नहीं मिली थी, पर युद्ध ने उन्हें नायक के रूप में स्थापित कर दिया. सामान्य सैनिक के रूप में युद्ध में शामिल हुए सुलेमानी को युद्ध के दौरान ही एक दस्ते का प्रमुख बना दिया गया था. तब उनकी उम्र ढाई दशक के आसपास थी.

बाद के वर्षों में उनके असर का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता खोमैनी उन्हें ‘ क्रांति का जीता-जागता शहीद’ कहा करते थे. वैसे खोमैनी केवल शहीद सैनिकों के लिए ही प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए के एक शीर्ष अधिकारी जॉन मैग्यूर ने कुछ साल पहले कहा था कि सुलेमानी मध्य-पूर्व में अभी सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं.

जनरल सुलेमानी और सुलेमानी के बाद

इराक की राजधानी बगदाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिकी हमले में ईरान के शीर्ष कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत से मध्य-पूर्व की हिंसक अस्थिरता के गंभीर होने की आशंका बढ़ गयी है.

इस हमले में पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेस के डिप्टी कमांडर अबु महदी अल-मुहांदिस भी मारे गये हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी सेना ने यह कार्रवाई की है..

पश्चिम एशिया में ईरानी प्रभाव बढ़ाने में भूमिका : पश्चिम एशिया में ईरानी प्रभाव बढ़ाने में सुलेमानी की भूमिका के कारण न सिर्फ अमेरिका, बल्कि उसके समर्थक सऊदी अरब और इस्राइल को भी ईरान से मुकाबला करने में परेशानी होने लगी थी. इससे पहले भी उन्हें मारने की कई बार कोशिशें हो चुकी थीं. बीते बीस सालों से पश्चिमी दुनिया, इस्राइल और अरब देशों की खुफिया एजेंसियां उन पर नजर रख रही थीं.

इराक व सीरिया में शांति स्थापना के लिए सुलेमानी द्वारा किये गये कार्य काफी महत्व रखते हैं. इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट का मुकाबला करने के लिए उन्होंने कुर्द और शिया लड़ाकों को एकजुट किया था. बगदाद को इस आतंकी संगठन से बचाने के लिए सुलेमानी ने पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स का गठन भी किया था, जो ईरान-समर्थित शिया लड़ाकों के विभिन्न समूहों को मिला कर बना था.

लेबनॉन के हिज्बुल्लाह और फिलीस्तीन में हमास को सुलेमानी का समर्थन और संरक्षण प्राप्त था. वर्ष 2011 में जब सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ, तो सबसे पहले उन्हें सुलेमानी का ही साथ मिला था. ऐसे में सुलेमानी जैसी हस्ती का मारा जाना ईरान के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है. इराक में अमेरिकी ठिकानों पर ईरान-समर्थक लड़ाकों का हमला तथा बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर उग्र प्रदर्शन इस हमले का तात्कालिक कारण माने जा रहे हैं.

अमेरिका से बदला लेगा ईरान : खाेमैनी : इस हत्या के बाद दोनों देशों के बीच 1979 के बाद सबसे बड़ा टकराव उत्पन्न हो गया है. सुलेमानी ईरान के सिर्फ सैनिक अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि उन्हें देश के सबसे ताकतवर लोगों में गिना जाता था.

वे उन ईरानियों में भी खासे लोकप्रिय थे, जो आम तौर पर सरकार से असंतुष्ट हैं. वे ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खाेमैनी के बहुत करीबी थे और ऐसा माना जा रहा था कि सुलेमानी देश के भावी राष्ट्रपति भी हो सकते हैं. खाेमैनी समेत ईरानी नेतृत्व ने इस हत्या का जोरदार बदला लेने की बात कही है. ऐसे में पहले से तनाव और हिंसा झेल रहे उस समूचे क्षेत्र में तनातनी बढ़ने की आशंका प्रबल हो गयी है.

तीन हजार अमेरिकी सैनिकों की खाड़ी में होगी तैनाती : ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान द्वारा अपने कमांडर की मौत का बदला लेने की प्रतिज्ञा से दुनिया में युद्ध का खतरा मंडराने लगा है.

इन खतरों को भांपकर अमेरिका भी खाड़ी देशों में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक, तीन हजार अमेरिकी सैनिकों को भेजा जा रहा है. पेंटागन की तरफ इस बारे में अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. अमेरिका ने कुछ दिन पहले ही कुवैत में अपने सात सौ सैनिकों को भेजा है. अमेरिका ने ये तैनाती तब की थी, जब ईरान-समर्थित भीड़ ने बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर प्रदर्शन और हमला किया था. इस हमले में सुलेमानी का हाथ बताया गया था. अमेरिका की इन तैयारियों से ऐसा लगता है कि वह सुलेमानी की मौत की बाद के हालात के लिए तैयार हो रहा है.

युद्ध रोकने के लिए किया हमला : ट्रंप : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि कासिम सुलेमानी काे इसलिए खत्म किया गया क्योंकि वे अमेरिकी राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों पर हमला करने वाले थे. हालांकि उन्होंने यह साफ-साफ कहा है कि उनका इरादा ईरान की मौजूदा सरकार को गिराना नहीं है और न ही वे ईरान के साथ युद्ध चाहते हैं. सुलेमानी को मारने का उनका कदम युद्ध रोकने के लिए था, न कि युद्ध शुरू करने के लिए.

नहीं बिगड़ने चाहिए हालात

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि खाड़ी क्षेत्र में तनाव में वृद्धि ने दुनिया को सशंकित कर दिया है. इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. सुलेमानी की हत्या के बाद मध्य पूर्व की स्थिति और नहीं बिगड़नी चाहिए.

इस्राइल व सुलेमानी की दुश्मनी

सुलेमानी की हत्या के बाद इस्राइल की सेना भी चौकस है, क्योंकि उसे आशंका है कि ईरान हिज्बुल्लाह और हमास के जरिये हमलावर हो सकता है. इन दोनों संगठनों पर सुलेमानी का काफी प्रभाव रहा है. सुलेमानी को लेकर इस्राइल हमेशा से सशंकित रहा है और उसके खिलाफ हमलों के लिए सुलेमानी को जिम्मेदार ठहराता रहा है.

कहीं तृतीय विश्वयुद्ध की सुगबुगाहट तो नहीं!

अमेरिका-ईरान की हालिया टकराटह से बहुत सारे लोग तृतीय विश्वयुद्ध की आशंका जताने लगे हैं. हालांकि दोनों देशों के बीच सीधे युद्ध की आशंका अभी नहीं दिखायी दे रही है, लेकिन हर कार्रवाई के जवाब में होनेवाली कार्रवाई तनाव को बढ़ाती ही है और देर-सबेर इसका नतीजा युद्ध के रूप में हो सकता है, इस संभावना को भी सिरे से नकारा नहीं जा सकता है. मध्य-पूर्व की राजनीति के तार इतने उलझे हुए हैं कि अब कोई भी लड़ाई दो देशों के बीच नहीं होती, उसके कई मोर्चे खुल जाते हैं.

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