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विकास की बाट जोहता स्वतंत्रता सेनानी जीतराम बेदिया का गांव

Updated at : 18 Oct 2019 8:40 AM (IST)
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विकास की बाट जोहता स्वतंत्रता सेनानी जीतराम बेदिया का गांव

सुरेंद्र कुमार बेदिया जिस प्रकार झारखंड राज्य प्राकृतिक खनिज संपदा के लिए बेहद प्रसिद्ध है उसी प्रकार झारखंड की धरती अनेकों वीर शहीदों के त्याग और बलिदान से भरी पड़ी है. उन्हीं में से एक नाम स्वतंत्रता सेनानी शहीद जीतराम बेदिया का है, जिन्हें सरकार ने वर्ष 2016 में विधान सभा स्थापना के दिन झारखंड […]

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सुरेंद्र कुमार बेदिया

जिस प्रकार झारखंड राज्य प्राकृतिक खनिज संपदा के लिए बेहद प्रसिद्ध है उसी प्रकार झारखंड की धरती अनेकों वीर शहीदों के त्याग और बलिदान से भरी पड़ी है.

उन्हीं में से एक नाम स्वतंत्रता सेनानी शहीद जीतराम बेदिया का है, जिन्हें सरकार ने वर्ष 2016 में विधान सभा स्थापना के दिन झारखंड के शहीदों की सूची में जोडने का काम किया. शहीद जीतराम बेदिया ऐसे योद्धा रहे हैं, जिन्होंने अपने नेतृत्व में अत्याचारी अंगरेजों, उनके दलालों, जमींदारों, साहूकारों, और सूदखोर-महाजनों के अंतहीन शोषण के विरुद्ध आवाज उठायी थी.

शहीद जीतराम बेदिया का जन्म 30 दिसंबर,1802 को रांची के ओरमांझी प्रखंड अंतर्गत पहाड़ के तलहटी में अवस्थित गगारी गांव के आदिवासी समुदाय में हुआ था. वह अत्यंत गरीब परिवार से थे. माता महेश्वरी देवी थी.

पिता जगतनाथ बेदिया ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लडाई में सक्रिय भूमिका निभायी थी. बचपन से ही जीतराम बेदिया के जेहन में देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा हुआ था. जब टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी को आठ जनवरी, 1858 को चुटूपालू घाटी में बरगद के पेड पर फांसी दी गई तो उस क्षेत्र के लोगों में काफी आक्रोश फूट पड़ा था.

अपने वीर योद्धाओं को देखने के लिए हजारों की संख्या में हिंदू-मुस्लिम सभी समुदाय के लोग जन सैलाब बनकर चुटूपालू घाटी में उमड़ पड़े थे. उस समय तक जीतराम बेदिया अंग्रेजों के चंगुल से बाहर थे. नेतृत्व की सारी जिम्मेवारी अब उनके कंधों पर आ गया था.

उसने वहीं पर हाथ में तलवार उठाकर लोगों को जोशपूर्ण संबोधन करते हुए मेजर मैक्डोनाल्ड और उनके सेना को झारखंड की धरती से मार भगाने का आहवान किया. छापामार युद्ध में काफी निपुण होने के कारण कई दिनों तक अंग्रेज सैनिकों के साथ लुका-छिपी का युद्ध चलता रहा.

इस विद्रोह को दबाने के लिए एक तरफ ब्रिटिश कंपनी की सुसज्जित सेना थी, जिसके पास आधुनिक हथियार, रायफल, बंदूक, गोला-बारूद थे, वहीं जीतराम बेदिया और उनके लड़ाकू साथियों के पास परंपरागत हथियार तीर-धनुष, गुलेल, तलवार, बरछा और गंडासा थे.

इसके बावजूद जीतराम बेदिया और उनके लडाकू साथीअदम्य साहस, एकजुटता, एवं कुशल नेतृत्व के साथ बड़ी मुस्तैदी से लड़ते रहे. अंतत: 23 अप्रैल,1858 को गगारी और खटंगा गांव के समीप मेजर मेक्डोनाल्ड के मद्रासी फौज और जीतराम बेदिया के लडाकू योद्धाओं के साथ एकाएक मुठभेड़ में दोनों ओर से भयंकर लड़ाई हुई. कई मद्रासी फौजी मारे गये.

जीतराम बेदिया को घोड़ा सहित गोली मारी गयी. गगारी और खटंगा गांव के बीचोबीच एक गहरी खाई में उनके शव और मृत घोड़े को गिराकर मिट्टी भर दिया. उस स्थान को घोड़ागढ़ा कहा जाता है.

शहीद जीतराम बेदिया के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब उनके विचारों पर दृढता से अमल किया जायगा. उनके संघर्षों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. जीतराम बेदिया जिस समुदाय से आते हैं वह समाज आज भी विकास के दौड़ में हाशिये पर है. जो स्थिति आजादी के पूर्व में थी कमोबेश वही स्थिति आज भी है. समाज में आदिवासी समुदाय उपेक्षित है.

जल, जंगल, जमीन की अवैध लूट, दहेज प्रथा, आरक्षण में मनमानी, नशाखोरी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बेईमानी, पलायन-विस्थापन ने झारखंड को बंधक बना लिया है. प्राकृतिक संसाधनों पर अवैध कब्जा के जरिये प्राकृतिक संतुलन को बिगाडकर यहां के लोगों को बेदखल किया जा रहा है.

माना कि आर्थिक विकास करना समय की जरूरत है. चंद लोगों के हितों को ध्यान में रखकर विकास नीति नहीं बल्कि व्यापक आदिवासियों-मूलवासियों को ध्यान में रखकर विकास को बढ़ावा देने का प्रयास होना चाहिए, जिससे आदिवासियों को अपने ही देश में परायेपन का बोध महसूस न हो और उनका अस्तित्व भी बचा रहे.

वर्तमान में ओरमांझी प्रखंड का गगारी पहाड़ जीतराम बेदिया के आंदोलन की कहानी बयां कर रहा है. इस पहाड के आसपास कई आदिवासी-मूलवासी गांव–चुटूपालू, खीराबेडा, बाहमण्काटा, पेसराटांड, सागा टोला, हलबादी, गणेशपुर, तिरला, जावाबेड़ा, करमाजारा, डुमरडीहा, पिस्का, उरबा, हरचण्डा और गगारी गांव आदि बसे हुए हैं. उनके वंशजों में धनराज बेदिया, धर्मनाथ बेदिया, मोतीलाल बेदिया, सधन बेदिया,अकलू बेदिया,पारसनाथ बेदिया, गगारी गांव में अपने बाल-बच्चों के साथ रहते है.

वे कहते हैं कि शहीद जीतराम बेदिया को ऐतिहासिक सम्मान तो मिल गया, लेकिन आज वीर सपूत का गांव विकास की बाट जोह रहा है. जीतराम बेदिया से संबंधित एेतिहासिक स्थलों को संरक्षित करने की आवश्यकता है. उनकी जीवनी को स्कूली शिक्षा के पाठयक्रमों में शामिल करने हेतु सरकार को ध्यान देना चाहिए ताकि भावी युवा पीढ़ी जीतराम बेदिया को स्मरण कर प्रेरणा ग्रहण करे.

(संपादक, बेदिया जनजाति पत्रिका

बरकाकाना, रामगढ़)

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